14 देशों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में तीन दिवसीय संगोष्ठी संपन्न
तारकेश कुमार ओझा, खड़गपुर।करीब 3200 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक ताम्रलिप्त सभ्यता के विकास, विश्व शांति स्थापना में उसकी भूमिका तथा एशिया में व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर आधारित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन तमलुक में किया गया। इस अंतरराष्ट्रीय विमर्श में 14 देशों के बौद्ध भिक्षु, शोधकर्ता, प्रोफेसर और छात्र–छात्राएं शामिल हुए।
सेमिनार का उद्घाटन राज्य के मत्स्य पालन मंत्री बिप्लब राय चौधरी ने किया। उद्घाटन सत्र में रामकृष्ण मिशन के महाराज द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय के पाली विभाग के प्रोफेसर सुमन पाल भिक्षु द्वारा भगवान बुद्ध की वाणी के पाठ के माध्यम से चर्चा का शुभारंभ हुआ।

तीन दिनों तक चली इस संगोष्ठी में दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न देशों से आए लगभग सौ से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। नेपाल के कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजेंद्र उप्रेती एवं जिला प्रशासक प्रेमानंद उप्रेती की विशेष उपस्थिति रही।
आयोजन समिति के संपादक एवं आह्वानकर्ता डॉ. दीपेंद्र नारायण राय, जो ताम्रलिप्त के मयूर राजवंश के 64वें वंशज हैं, ने अपने संबोधन में ताम्रलिप्त सभ्यता के उद्भव, उसके वैश्विक संपर्क, विश्व शांति में योगदान तथा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।
अंतरराष्ट्रीय पुस्तक का लोकार्पण : इस अवसर पर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय पुस्तक ‘Tamralipta: Crossroads of Faith, Trade and Culture in Ancient Asia’ का लोकार्पण किया गया। 11 अध्यायों में विभाजित इस पुस्तक को देश–विदेश के 11 प्रोफेसरों और शोधकर्ताओं ने मिलकर तैयार किया है।
पुस्तक के मुख्य संपादक ढाका इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. अब्दुल्लाह अल मंजूर हुसैन तथा कार्यकारी संपादक सहयोगी प्रोफेसर मिली रहमान रहीं। प्रकाशन की अनुमति एवं विश्लेषण डॉ. दीपेंद्र नारायण राय द्वारा किया गया।
पुस्तक का पहला अध्याय ‘Introduction of Tamralipta Civilization’ सेवा भारती महाविद्यालय के भू-पर्यावरण वैज्ञानिक प्रोफेसर डॉ. प्रणब साहू द्वारा लिखा गया है। अन्य अध्यायों में राजा एनएल खान महिला कॉलेज की प्राचार्या डॉ. स्वप्ना घोराई, राष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिक कांचन कुमार भौमिक, कैनेडियन यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर डॉ. एच. एम. जाहिरुल हक सहित कई विद्वानों के शोध शामिल हैं।
वृत्तचित्र का प्रदर्शन : सम्मेलन के दौरान ‘The Journey of Tamralipta Peak Dynasty’ नामक वृत्तचित्र का प्रदर्शन भी किया गया, जो पहले ही 11 विदेशी देशों में प्रदर्शित हो चुका है। वृत्तचित्र का निर्देशन प्रोफेसर डॉ. प्रणब साहू, निर्माण डॉ. दीपेंद्र नारायण राय, समन्वय प्रोफेसर कांचन कुमार भौमिक तथा संपादन अरिंदम दास ने किया। शोध एवं निर्माण में ट्रॉपिकल इंस्टीट्यूट ऑफ वॉटर एंड एनवायरनमेंटल रिसर्च का योगदान रहा।
ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक तथ्य : प्रोफेसर डॉ. प्रणब साहू ने अपने शोध में बताया कि ताम्रलिप्त क्षेत्र का भूपर्यावरणीय विकास 9 से 11 हजार वर्ष पूर्व समुद्र तट के समीप प्रारंभ हुआ था। 6-7 हजार वर्ष पूर्व कृषि आधारित जनपद विकसित हुआ और लगभग 3200 वर्ष पूर्व मयूर राजवंश के हाथों संगठित ताम्रलिप्त सभ्यता का उदय हुआ।
पुरातत्व विभाग के अनुसार यहां 2500 वर्ष पुराने पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं, जबकि ईसा पूर्व 350 से ईस्वी 800 तक लगभग 1150 वर्षों तक ताम्रलिप्त बंदरगाह से अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता रहा।
शोध में यह भी सामने आया कि झाड़ग्राम, बांकुड़ा, पुरुलिया और घाटशिला क्षेत्र से तांबा निकालकर सुवर्णरेखा, कांसाई और ताराफेनी नदी मार्ग से ताम्रलिप्त बंदरगाह तक पहुंचाया जाता था, जहां से इसे विदेशी देशों में भेजा जाता था।
विद्वानों के विचार : कलकत्ता विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के प्रोफेसर डॉ. सौभिक गांगुली ने बताया कि यहां तीन हजार वर्ष पुराने मानव उपयोग की वस्तुएं तथा पांच हजार वर्ष पुराने जनपदों के प्रमाण मिले हैं।
एएसआई के पूर्व महानिदेशक प्रोफेसर गौतम सेनगुप्त और अधिकारी डॉ. सुनील कुमार पट्टनायक ने कहा कि ताम्रलिप्त बंदरगाह और बौद्ध विहारों का विस्तार उड़ीसा के बलासोर तक हुआ था।
थाईलैंड, कंबोडिया, म्यांमार, जापान, ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका से आए बौद्ध भिक्षुओं एवं शोधकर्ताओं- जिनमें कंबोडिया के यान सोकने, मॉर्म सेवन, चुन अमानत तथा थाईलैंड के आनंतोचाई प्रमुख रहे- ने एकमत से कहा कि बौद्ध धर्म के प्रसार, व्यापार और शांति स्थापना में ताम्रलिप्त बंदरगाह की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
पर्यटन और पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग : बर्धमान विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग के प्रोफेसर डॉ. एम. ए. सठिक ने ताम्रलिप्त विरासत के अनुरूप पर्यटन विकास की रूपरेखा प्रस्तुत की। वहीं सेवा भारती महाविद्यालय के प्राचार्य ने इस ऐतिहासिक सभ्यता को स्कूल और विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया।
अंत में राजपरिवार की सदस्या नंदिनी राय द्वारा स्थानीय आदिवासी समाज के लिए किए जा रहे सेवा कार्यों की सराहना की गई। अत्यंत सौहार्दपूर्ण और विद्वत वातावरण में तीन दिवसीय यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ।
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