विनय सिंह बैस की कलम से – व्रत, भक्ति और शुभ कर्म के दिन आ गए हैं

“बरषा बिगत सरद रितु आई। लछमन देखहु परम सुहाई॥ फूले कास सकल महि छाई। जनु