श्री गोपाल मिश्र की रचना : प्रजा की गणितीय पराजय
।।प्रजा की गणितीय पराजय।। कोष्ठकों का छोटा सा घर-बार सूत्रों से झिलमिल बंदनवार… सांख्यिकी का
श्री गोपाल मिश्र की गजल
।।गजल।। यूं ग़ुमां होता है, बूंदों की किसी महफिल से तुम बहकती हुई शबनम सी
श्री गोपाल मिश्र की रचना : स्वप्न- संजीवनी
।।स्वप्न- संजीवनी।। इस तरह न मुझे झकझोर हे प्रहरी! सुषुम्ना व जागृति के बीच थिरकती
श्री गोपाल मिश्र की रचना : ‘तपस्या इक प्रेयसी’
।।तपस्या इक प्रेयसी।। प्रश्न पर्व (तपस्वी) रूपसी तेरा लावण्य पाश! क्यूं चुरा रहा मेरे मन-चितवन
श्री गोपाल मिश्र की रचना : विद्रोह की पूर्व संध्या
।।विद्रोह की पूर्व संध्या।। जरा देख लो मेरे जां-नशीं, ऐ हिंद के सुल्तान बामुलाहिजा होशियार!
श्री गोपाल मिश्र की रचना : यत्र नार्यस्तु पूज्यंते
।।यत्र नार्यस्तु पूज्यंते।। उष्ण तप्त दोपहर है, लड़कियों की जिंदगी। कंकड़ीली इक डगर है, लड़कियों
श्री गोपाल मिश्र की नुक्ता : गुरबत इक रोज
।।गुरबत इक रोज।। लिखने बैठा जो गरीबी का ग्लैमर तो देखा, कलम की रवानी में
श्री गोपाल मिश्र की रचना : अध्यात्म में प्रदूषण
।।अध्यात्म में प्रदूषण।। इच्छा नहीं इंसान की, ईश्वर तक पहुंचने की बस औपचारिकता वश, वह
श्री गोपाल मिश्र की कविता : गर्भपात
।।गर्भपात।। कुंठा शापित गर्भपात समदर्शिता का दर्शन होता.. जगत, बस इसी सूत्र में गुँथा होता।
श्री गोपाल मिश्र की रचना : एक घोटाला किरणों का
।।एक घोटाला किरणों का।। ऐ धूप! हे चाँदनी! न लाओ अपने पार्थिव कलह, मेरे दिव्य
