Biryani and fast food shop burnt to ashes due to massive fire in Siliguri

अशोक वर्मा “हमदर्द” की कहानी : “आग और राख”

कोलकाता। गाँव का नाम था बरवां, गंगा किनारे बसा हुआ, परंपराओं और रूढ़ियों में जकड़ा हुआ। यहाँ का हर रास्ता जाति की रेखाओं से बँटा था – किसके कुएँ से कौन पानी भरेगा, किसकी चौखट पर कौन पाँव रखेगा। सूरज सबको बराबर रोशनी देता था, मगर बरवां की आँखों पर जाति का अंधेरा गाढ़ा था।

बरवां के दक्षिण टोले में रहते थे दलित और शूद्र परिवार। मिट्टी की झोपड़ियाँ, खपरैल की छतें और चारपाई पर अधनंगे बच्चे। पश्चिमी टोले में रहते थे सवर्ण, जिनके अहाते ऊँची दीवारों से घिरे थे। खेत, कुएँ, बैल, औरतें – सब पर उन्हीं का हक था।

माधव चमार, उम्र पचपन। उसकी पीठ अब भी खेतों में झुकी रहती थी। गाँव का सबसे मेहनती आदमी, पर अपना खेत आधा बीघा भी नहीं। दूसरों की जमीन जोत-जोत कर उसने अपनी हड्डियाँ घिसा दीं। हर साल फसल मालिक के कोठार में चली जाती और उसके हिस्से आतीं टूटी चप्पलें, फटे कपड़े और सूखी रोटियाँ।

उसकी बीवी कहती – “ए जी, कब तक दूसरों का हल जोतोगे? अपने बच्चों का पेट कैसे भरेगा?”
माधव हँस देता, मगर भीतर से टूट जाता। “हमारे लिए खेत जोतना ही भाग है, सुख-दुख तो ऊँच जात वालों के लिए होता है।”

गाँव की पंचायत में शूद्रों की आवाज उठती ही नहीं थी। अगर कोई विरोध करता तो उसे कुएँ से पानी भरने पर रोक, खेत से मजदूरी से बाहर और कभी-कभी डंडे से सजा मिलती।

माधव का बेटा रामकुमार पढ़ाई में तेज था। वह चाहता था कि मास्टर बने, गाँव में इज्जत पाए। लेकिन स्कूल में मास्टर उसे ‘छूआछूत’ के नाम पर हमेशा अलग बिठाते।

एक दिन रामकुमार ने क्लास में सवाल पूछ लिया। मास्टर गुर्राया –
“अरे चमार के छोरे, तेरी औकात है सवाल पूछने की? पढ़-लिख कर क्या करेगा? बर्तन माँजना ही तेरे खून में है।”

कक्षा हँसी से गूँज उठी। रामकुमार के गाल लाल हो गए। उसने किताब बंद कर दी, पर मन में आग जल उठी। वह सोचने लगा – “क्या वाकई हमारी जात ही पाप है? भगवान ने हमें नीच क्यों बनाया? या यह सब झूठ है जो सदियों से हम पर लादा गया?”

उसे लगता जैसे उसकी रगों में खून नहीं, लावा बह रहा हो। बरवां के ठाकुर टोले में रहती थी गौरी। खूबसूरत, गोरी, शिक्षित। मगर उसका पति हर रात शराब पीकर लौटता और उस पर हाथ उठाता। गौरी के आँगन में दाल-घी की थाल सजती, पर उसका मन हमेशा भूखा रहता।

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सास कहती – “औरत का धर्म है सहना। पति चाहे मारे या गाली दे, तू चुप रह। इसी में कुल की मर्यादा है।”
गौरी सोचती – “हम सवर्ण औरतें भी क्या सचमुच आज़ाद हैं? या बस सुनहरी पिंजरे में कैद पंछी?”

उसका मन कई बार उठता कि मायके लौट जाए, पर मायका भी उसे बोझ मानता। वहाँ से वही जवाब आता – “अब तू हमारे घर की नहीं रही। तेरे सुख-दुख अब तेरे ससुराल के हैं।” गौरी की आँखों से हर रात आँसू बहते, पर किसी को परवाह नहीं।

बरवां में एक दिन बड़ा कांड हुआ। ठाकुर टोले के खेत में मजदूरी करने वाले दलित बच्चे ने प्यास लगने पर उनके कुएँ से पानी पी लिया। बस, आग भड़क गई। ठाकुर लोग लाठी लेकर टूट पड़े। बच्चा रोता रहा – “भैया, बस पानी ही तो पीया है।” पर जाति की आग ने इंसानियत को निगल लिया। बच्चे को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया गया।

यह खबर सुनकर रामकुमार का खून खौल गया। उसने पंचायत में जाकर कहा- “हम भी इंसान हैं। पानी पीना हमारा हक़ है।” पंचायत के बुज़ुर्ग हँस पड़े – “चुप कर, नीच जात के छोरे। ज्यादा बोलोगे तो गाँव से बाहर खदेड़ देंगे।” रामकुमार की मुट्ठियाँ कस गईं। उसने ठान लिया – अब यह अन्याय नहीं सहूँगा।

इस घटना के कुछ दिन बाद गौरी ने देखा कि मजदूरी करने आई एक दलित औरत फुलिया, को जमींदार ने दबोच लिया। फुलिया चीखती रही
“बचाओ, कोई बचाओ।” पर गाँव चुप था। गौरी ने खिड़की से देखा, उसके रोंगटे खड़े हो गए।

उस रात गौरी ने अपनी डायरी में लिखा – “जात औरतों को नहीं बचाती। हम चाहे दलित हों या सवर्ण, हमारे जिस्म पर हमेशा मर्द का हक समझा जाता है।” फुलिया का दर्द, गौरी का अपना बन गया। दोनों औरतें अलग जातियों से थीं, पर पीड़ा एक ही थी।

रामकुमार अब और नहीं सह पाया। उसने दलित और शूद्र युवाओं को इकट्ठा किया। कहा – “सदियों से हमें दबाया गया है। हमारी माँ-बहनों की इज्जत लूटी जाती है। हमारे बच्चों को स्कूल में अपमानित किया जाता है। अब वक़्त है कि हम खड़े हों।” माधव डर गया – “बेटा, विद्रोह मत कर। तेरे बाप-दादा सब चुपचाप सहते रहे। यही हमारी नियति है।”

रामकुमार गरज उठा – “बाबा, अगर हम चुप रहे तो हमारी आने वाली पीढ़ी भी इन्हीं जंजीरों में सड़ जाएगी। मैं यह जहर नहीं पी सकता।”
गाँव के कुछ दलित लड़के उसके साथ हो गए। गौरी और फुलिया अक्सर चोरी-छुपे मिलतीं। गौरी कहती – “हमारी जात अलग है, मगर दर्द एक है। हमें भी खड़ा होना होगा।” फुलिया बोली – “हम औरतें अगर साथ हो जाएँ, तो मर्दों की ताकत भी हिल जाएगी।”

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दोनों ने तय किया कि गाँव की औरतों को जागरूक करेंगी। वे खेतों, तालाबों और चौखटों पर जाकर कहती – “औरत चाहे किसी भी जात की हो, उसे अधिकार चाहिए। उसे अपमान और मारपीट से मुक्ति चाहिए।” धीरे-धीरे औरतों के भीतर भी आग जलने लगी।

एक रात ठाकुर टोले के गुंडे दलित बस्ती पर हमला करने आ गए। उनकी आँखों में वही पुराना अहंकार था। “ये नीच जात वाले उठ खड़े हुए हैं, इन्हें सबक सिखाना होगा।” पर इस बार हालात अलग थे। रामकुमार और उसके साथी लाठियों और पत्थरों से तैयार बैठे थे। गौरी ने भी चोरी-छुपे औरतों को हिम्मत दी थी।

जैसे ही हमला हुआ, पूरा दलित टोला उठ खड़ा हुआ। औरतें भी आगे आईं- किसी ने मिर्च झोंकी, किसी ने हँसिया उठा ली। गौरी ने अपने ही टोले के औरतों को आवाज दी “अगर हम आज चुप रहीं, तो कल हमारी बेटियाँ भी इसी नरक में जिएँगी।”

गाँव का माहौल जल उठा। लाठियाँ टकराईं, चीखें गूँजीं। पहली बार बरवां ने देखा कि शूद्र, दलित और औरतें एकजुट होकर खड़ी थीं। उस रात बरवां की हवा में धुआँ भर गया। पर उस धुएँ में सदियों की घुटन भी निकल रही थी। ठाकुरों का आतंक पहली बार टूटा।

पंचायत ने अगली सुबह मजबूरी में घोषणा की – “अब से कुएँ और तालाब सबके लिए खुले रहेंगे। कोई किसी औरत की इज्जत पर हाथ डालेगा तो दंड मिलेगा।”

मगर यह जीत आधी ही थी। जमीन अब भी उनके पास नहीं थी, शिक्षा अब भी अधूरी थी। पर आग जल चुकी थी और अब उसे बुझाना आसान नहीं था।

रामकुमार ने किताब हाथ में उठाई और कहा – “हम लड़ाई सिर्फ लाठी से नहीं, कलम से भी लड़ेंगे।” गौरी ने फुलिया का हाथ थामा और बोली – “और हम औरतें एक-दूसरे की ढाल बनेंगी।”

बरवां गाँव की कहानी सिर्फ एक गाँव की नहीं थी, यह पूरे समाज का आईना थी। जहाँ शूद्रों की मेहनत को हक़ नहीं मिला, दलितों को इंसान नहीं समझा गया, और सवर्ण औरतों को भी सोने के पिंजरे में कैद रखा गया।

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पर जब इन तीनों दर्दों ने एक-दूसरे को पहचाना, तो विद्रोह की चिंगारी फूट पड़ी। आग से राख तक का यह सफर बताता है जाति हो या लिंग, अन्याय हर हाल में अन्याय है। और जब पीड़ा एक हो जाती है, तो जंजीरें टूटना तय होता है।

अशोक वर्मा “हमदर्द”, लेखक

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