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अम्मा के फोन का अब भी इंतजार करते हुए…

विनय सिंह बैस, नई दिल्ली। आज से करीब 35 वर्ष पहले सबसे छोटे चाचा की शादी के लिए के लिए एक बेहद धार्मिक व्यक्ति आए थे। हालांकि किन्हीं कारणों से वह संबंध तो नहीं हो पाया लेकिन उनके द्वारा दिया गए एक कैलेंडर से मैं बेहद प्रभावित हुआ जिसमें लिखा था-
“कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती,
करमूले तु गोविंदः प्रभाते करदर्शनम्।”
अर्थात हथेली के ऊपर श्रीलक्ष्मी वास करती हैं, हथेली के मध्य में मां सरस्वती का निवास है और हथेली के नीचे भगवान गोविंद रहते हैं।

इसका प्रभाव यह हुआ कि तभी से मैं सुबह बिस्तर से उठने से पूर्व सबसे पहले अपनी दोनों हथेलियां को जोड़कर देखने लगा। श्री लक्ष्मी, मां सरस्वती और भगवान गोविंद का स्मरण, मनन करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। वायुसेना में सेवा के दौरान समय मिलने पर और दिल्ली आने के बाद नियमित गर्म पानी में नींबू शहद डालकर पीना, योग करना, ब्रेकफास्ट करने के बाद ऑफिस जाना, लंच करने के बाद कुछ देर टहलना और ऑफिस से वापस आते समय मेट्रो से घर तक पैदल आना मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है ।

इसी तरह लंच के बाद ऑफिस के बाहर टहलते समय या फिर मेट्रो से उतरकर पैदल घर वापस आते समय अम्मा से फोन पर बात करना भी मेरी दिनचर्या का अटूट हिस्सा रहा है। ऐसा तो कई बार हुआ है कि मैंने लंच के बाद अम्मा से बात की हो और मेट्रो से उतरने के बाद पुनः बात की हो, लेकिन ऐसा बहुत कम हुआ है कि दिन में एक बार भी अम्मा से बात न हुई हो।

अम्मा से बात करने का फायदा यह था कि उनके हाल-चाल तो मिलते ही थे, साथ ही घर-परिवार, गांव-मोहल्ले, नात-रिश्तेदार सबके समाचार एक साथ मिल जाते थे। अम्मा ‘ऑल इन वन’ थी। सबको फोन करने के बजाय अम्मा से बात कर लो, तो सबका हाल-पता मिल जाता था।

अम्मा को मेरी यह दिनचर्या खूब अच्छी तरह पता थी। इसीलिए दोपहर 1:00 बजे के बाद और शाम को 6:30 के बाद वह किसी से भी लंबी बात नहीं करती थी। साफ कह देती थी – “अच्छा रखो। फिर बात करूंगी, अभी मुन्ना का फोन आ रहा होगा।”

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अम्मा की स्मरण शक्ति बड़ी तीव्र थी। मेरे जिस साथी या सहकर्मी से एक बार भी ठीक से मिल लेती थी तो उसका नाम याद रखती और मुझसे हाल-चाल भी पूछती। अभी के छोड़िए, वायु सेना तक के मेरे सारे मित्रों, उनकी पत्नियों, यहां तक कि कुछ बच्चों के नाम भी उन्हें याद थे। उनके बारे में जब-तब पूछती रहती थी।

2023 में 8-9 महीने तक इलाज के लिए वह दिल्ली में रही और लगभग मेरे सभी दोस्तों तथा वर्तमान कार्यालय के सहकर्मियों से मिली। लालगंज वापस जाने के बाद भी वह मित्र विजय के बच्चों का, अजय पूर्ति की शादी का, आकाश सर की बिटिया की पढ़ाई का, संदीप, इंद्रभूषण, पीयूष आदि साथियों का हाल-चाल मुझसे पूछती रहती थी। अजय पूर्ति और पीयूष के अब तक कुंवारे रहने का कारण भी पूछती और मुझसे कहती कि इनकी शादी कहीं करा दो। इन मित्रों में से कोई भी मेरे पास होता तो वह उससे स्वयं भी अवधी में बात करती थी, हाल-चाल लेती थी।

अम्मा के साथ हमेशा से अच्छी बात यह रही थी कि वह दिल में कुछ नहीं रखती थी। जो कुछ मीठा-कड़वा कहना होता था, मुँह पर कह देती थी। इसीलिए उनसे कोई भी बात कहने में मुझे तो कोई झिझक नहीं होती थी। तमाम बातें जो मैं अपनी पत्नी और बच्चों से भी नहीं कह पाता था, उनसे कह कर दिल हल्का कर लेता था।

पापा के जाने के बाद अम्मा की सारी उम्मीदें मुझ पर टिक गई थी। उन्हें पता था कि मुझसे कोई बात कैसे मनवानी है। इसके लिए वह अधिकार, दुलार और कई बार इमोशनल ब्लैकमेल करके अपनी बात मनवा लेती थी। छोटे भाई, उसकी बच्चियों, यहां तक की छोटी बहन जो बात मुझसे संकोचवश नहीं कह पाती थी, वह बात अम्मा के माध्यम से मुझ तक पहुंचाई जाती थी।

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अम्मा के पास रिलायंस का कीपैड वाला फोन था जो उनके लिए टॉर्च, मोबाइल, म्यूजिक सिस्टम, टीवी, घड़ी आदि का कार्य करता था। यह छोटा सा मोबाइल उन्हें हमारे बड़े परिवार और पूरी दीन दुनिया से जोड़े रखता था।

अम्मा मोबाइल में किसी का नाम खुद सेव नहीं कर पाती थी लेकिन याददाश्त इतनी तेज कि नंबर देखकर पहचान जाती थी कि किसका फोन आया है। रिचार्ज खत्म होने का मैसेज आते ही मुझसे कह देती – “बच्चा 75 रुपये वाला रिचार्ज कर दो। नहीं तो कल से फोन न कर पाउंगी तुम्हें।” उनकी यह गुप्त धमकी सदैव कारगर रही।

पिछले वर्ष मई महीने के अंत में जब वह गंभीर रूप से बीमार पड़ी और एक दिन के लिए रीजेंसी अस्पताल कानपुर के आईसीयू से नार्मल वार्ड में शिफ्ट हुई तो उन्होंने ऑक्सीजन मास्क हटते ही सबसे पहले अपना फोन मांगा था। उसका कीपैड प्रेस कर के समय देखा और फिर बोली- “मुन्ना, तुम तो यहीं हो, मुझे बिटिया से बात करना है।”

मैंने कहा- “अम्मा डॉक्टर ने ज्यादा बात करने को मना किया है। तुम ठीक हो जाओ, फिर बिटिया से और मुन्ना दोनों से पहले की तरह खूब बात करना।”
अम्मा पिछले दो वर्ष से मौत से पूरी ताकत और हिम्मत से लड़ रही थी, यमराज को छका रही थी। लेकिन अंततः वही हुआ जो भगवान को मंजूर था। उन्हें ईश्वर में धाम गए हुए एक वर्ष होने को आया है। लेकिन प्रतिदिन मुझसे बात करने वाली अम्मा ने अपने ‘आल इन वन’ जिओ फोन से मुझसे, अपने मुन्ना से, अपने बच्चा से अब तक एक बार भी बात नहीं की है।
और
मैं अम्मा का नम्बर डायल करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहा हूँ।

(मुन्ना)
अम्मा के फोन का अब भी इंतजार करते हुए

विनय सिंह बैस, लेखक/अनुवाद अधिकारी

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