Coal based steel production threatens India's net zero goal1

क्लाइमेट के मोर्चे पर स्टील सेक्टर फेल, स्कोरकार्ड ने खोली पोल

स्टील सेक्टर की शर्मनाक तैयारी: दुनिया की कोई बड़ी कंपनी 2050 नेट-जीरो के लिए तैयार नहीं, Tata Steel सहित 18 कंपनियों का स्कोर फेल!

निशान्त, Climate कहानी, कोलकाता: दुनिया की ऊंची-ऊंची इमारतें, पुल, रेल और फैक्टरियां जिस स्टील पर टिकी हैं, उसी स्टील उद्योग की जलवायु तैयारी अब सवालों के घेरे में आ गई है।

क्लाइमेट वॉच द्वारा जारी ताजा “कॉरपोरेट स्कोरकार्ड” ने एक सच्चाई सामने रख दी है — दुनिया की 18 सबसे बड़ी स्टील कंपनियों में से एक भी कंपनी खुद को कम-कार्बन (low-emission) भविष्य के लिए तैयार नहीं बता पाई।

सभी कंपनियों का प्रदर्शन निराशाजनक

रिपोर्ट में शामिल कंपनियों में Tata Steel (भारत), ArcelorMittal, Nippon Steel (जापान), POSCO (दक्षिण कोरिया) जैसी दिग्गज कंपनियां शामिल हैं। इनमें से किसी का भी स्कोर 50 तक नहीं पहुंच पाया। ज्यादातर कंपनियां 20 से 30 के बीच सिमटी हुई हैं, जबकि औसत स्कोर सिर्फ 27 है।

STEELindustry

Caroline Ashley (क्लाइमेट वॉच) ने इसे सीधे शब्दों में “शर्मनाक” बताया। उन्होंने कहा, “कोई भी स्टील कंपनी 50 अंक तक नहीं पहुंच पाई है। जो कंपनियां सबसे आगे हैं, उनके पास भी अभी बहुत लंबा रास्ता बाकी है। कंपनियों की मौजूदा तैयारी और जलवायु संकट की जरूरतों के बीच गहरा अंतर साफ दिख रहा है।”

स्टील सेक्टर वैश्विक CO₂ उत्सर्जन का 10% हिस्सा

स्टील उद्योग अभी भी मुख्य रूप से कोयला-आधारित ब्लास्ट फर्नेस तकनीक पर निर्भर है, जो पूरे सेक्टर के उत्सर्जन का करीब 90% जिम्मेदार है। रिपोर्ट में सबसे बड़ी कमजोरी दो जगह दिखी है:

  • कोयले से बाहर निकलने की ठोस योजना का अभाव
  • ग्रीन आयरन और नवीकरणीय ऊर्जा का लगभग न के बराबर इस्तेमाल
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ग्रीन आयरन के मामले में 25 में से औसत स्कोर सिर्फ 0.6 है। हर कंपनी का ग्रीन आयरन खपत पर स्कोर शून्य है।

कौन आगे, कौन पीछे?

  • सबसे बेहतर: SSAB (स्वीडन) – 46.2 और thyssenkrupp (जर्मनी) – 41.9
  • सबसे पीछे: Hyundai Steel, Nippon Steel और HBIS Group

Tata Steel समेत ज्यादातर भारतीय और एशियाई कंपनियां औसत से नीचे या औसत के आसपास हैं।

रिपोर्ट का साफ संदेश

नेट-जीरो 2050 जैसे लक्ष्य घोषित करना काफी नहीं है। जब तक कोयला-आधारित परिसंपत्तियों में निवेश जारी रहेगा और ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन आयरन जैसी तकनीकों में बड़े पैमाने पर निवेश नहीं होगा, तब तक यह ट्रांजिशन सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगा।

The train of earth's dreams rests on steel tracks, India is the engine

स्टील सेक्टर में एक बार लगाया गया निवेश कई दशकों तक चलता है, इसलिए आज के फैसले आने वाले 30-40 साल के उत्सर्जन तय करेंगे। रिपोर्ट चेतावती है कि अगर अभी भी पुरानी तकनीक में निवेश जारी रहा, तो भविष्य में बदलाव और भी मुश्किल हो जाएगा।

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