“भारत, अर्थात इंडिया राज्यों का संघ होगा”

श्रीराम पुकार शर्मा, हावड़ा । ‘संविधान’ मूलतः किसी भी देश के मौलिक कानूनों का निर्माता, उसके सहेजता और अपने नागरिकों के अधिकारों का रक्षक होता है। यह सरकार के विविध अंगों की संरचना, उनकी शक्ति और उनके कार्य को निर्धारित कर देश के समस्त नागरिकों के प्रशासनिक अधिकारों को निर्धारित और उनकी रक्षा करता है। आज ‘भारतीय संविधान’ के निर्माण की पूर्णता की 73वीं जयंती है। यह 26 नवंबर, 1949 को पूर्ण हुआ और देश के लिए 26 जनवरी, 1950 को लागू कर दिया गया। ‘भारतीय संविधान’ का निर्माण एक विशेष ‘संविधान सभा’ के द्वारा हुआ है, जो विश्व का सबसे वृहद संविधान है। इसकी लगभग सभी बातें लिखित रूप में दृढ़ सुरक्षित हैं। गणतंत्र भारत के सभी प्रशासनिक कार्य संविधान में दर्शाये गए नियमों के अनुरूप ही संपादित होना तय है।

‘भारतीय संविधान’ के निर्माण की कथा-कहानी हम सब नागरिकों लिए श्रवणेय है। देश की आजादी की प्राप्ति (15 अगस्त, 1947) के पूर्व से ही देश को सुचारु और व्यवस्थित ढंग से संचालित करने के लिए दृढ़ नियमों के गठन की आवश्यकता महसूस होने लगी थी। इसके लिए एक विशेष ‘संविधान सभा’ का गठन किया गया था। इस सभा ने अपना कार्य 1 दिसंबर, 1946 से ही प्रारंभ कर दिया था। इसके सदस्य भारत के विभिन्न राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, भीमराव अम्बेडकर, सरदार वल्लभ भाई पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि विशिष्ठजन इस सभा के विशेष सदस्य थे। अनुसूचित वर्गों से भी 30 से ज्यादा सदस्य इस सभा में शामिल थे। इस सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई। जिसका अस्थायी अध्यक्ष तत्कालीन भारत के प्रसिद्ध सांसद, शिक्षाविद, अधिवक्ता तथा पत्रकार डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को तथा अस्थाई उपाध्यक्ष फ्रैंक एंथोनी को बनाया गया था। संविधान सभा की पहली बैठक को संबोधित करने वाले प्रथम व्यक्ति जे.बी. कृपलानी थे। जबकि स्वतन्त्र देश की माँग करते हुए मुस्लिम लीग ने इस बैठक का बहिष्कार किया था।

‘संविधान सभा’ की दूसरी बैठक 11 दिसम्बर 1946 को हुई, जिसमें स्थाई अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को तथा स्थाई उपाध्यक्ष डॉ. हरेन्द्र कुमार मुखर्जी को बनाया गया था। तीसरी बैठक 13 दिसम्बर 1946 को बुलाई गई, जिसमें जवाहरलाल नेहरू ने संविधान के ’उद्देश्य व प्रस्ताव’ को पेश किया था, जिसे संविधान सभा ने 22 जनवरी 1947 को स्वीकार कर लिया। इन्हीं प्रस्तावों के आधार पर भारतीय संविधान की ‘प्रस्तावना’ को निर्मित की गई है। ‘प्रस्तावना’ के अनुसार ‘भारत एक सम्प्रुभता सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, गणराज्य है।’

तत्पश्चात 29 अगस्त 1947 को एक ‘संविधान प्रारूप समिति’ का गठन किया गया। डॉ. भीम राव आंबेडकर को इस सभा का अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जबकि उनके सहयोग के लिए अन्य छः सदस्य और भी थे। उन्होंने विश्व के महत्वपूर्ण 60 देशों के संविधानों का विशद अध्ययन कर भारत के लिए नवीन संविधान निर्माण के लिए 13 समितियों का गठन किया। विश्व के सबसे बड़े लिखित ‘भारतीय संविधान’ के निर्माण के लिए देश भर के विभिन्न प्रांतों से 389 विद्वान सदस्यों को चुना गया। डॉ. भीमराव अंबेडकर भारत के संविधान के मुख्य वास्तुकार थे। ‘भारतीय संविधान’ की असली कॉपी अर्थात पांडुलिपि को कैलिग्राफर प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने इंग्लैंड के बर्मिघम से आयातित 233 पृष्टों पर ‘इटैलिक शैली’ में अपने हाथ से अंग्रेजी में बहुत सुन्दर हस्तलेखा में लिखा। इसके लिए उन्होंने कोई भी पारिश्रमिक न लिया था, पर शर्तानुसार हर एक पन्ने पर उन्होंने अपना नाम और आखिरी पन्ने पर अपना और अपने दादाजी का नाम लिखा है। इस कार्य में उन्हें छः महीने लगे थे। शांति निकेतन के चित्रकारों ने प्रख्यात चित्रकार नंदलाल बोस के नेतृत्व में इसके कवर से लेकर हर पन्ने को अपनी सुंदर कलाओं से सजाया। इसका वजन 13 किलोग्राम है। जबकि इसके हिन्दी स्वरूप को वसंत कृष्ण बैद्य ने 264 पृष्टों में लिखा है, जिसका कुल वजन 14 किलोग्राम है।

‘भारतीय संविधान’ को बनाने में कुल 2 वर्ष, 11 माह 18 दिन लगे थे। इसके 12 अधिवेशन हुए थे। इसकी मूलप्रति में आराध्य राम, सीता और लक्ष्मण की तस्वीर है। ‘भारतीय संविधान’ के निर्माण के उपरांत उसकी पूर्णता की घोषणा हेतु संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 नवम्बर 1949 को आयोजित की गई। इस दिन निर्मित ‘भारतीय संविधान’ पर प्रथम हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति पं. जवाहरलाल नेहरू और राजस्थान के मास्टर बलवन्त सिंह मेहता थे। फिर देश भर से चयनित 284 लोगों ने उस पर अपने हस्ताक्षर किए। जिनमें से अधिकांश को ‘भारत गणराज्य के संस्थापक’ के रूप में माना जाता है। इसके अंग्रेजी और हिन्दी के मूल स्वरूप को ‘पार्लियामेंट लाइब्रेरी’ के एक विशेष कक्ष में हीलियम से भरे एक विशेष चैंबर में सुरक्षित रखा गया है। चुकी डॉ. भीमराव अंबेडकर ही ‘भारतीय संविधान’ के मूल वास्तुकार थे। अतः उन्ही को ‘भारतीय संविधान का जनक’ माना जाता है।

‘भारतीय संविधान प्रस्तावना’ इस प्रकार से है – “हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”

‘भारतीय संविधान’ के प्रथम अनुच्छेद की प्रथम पंक्ति कहती है, – “भारत, अर्थात इंडिया राज्यों का संघ होगा”। इस पंक्ति में ‘भारत’ और ‘इंडिया’ दोनों नामों का प्रयोग हुआ है। अंग्रेजी में यह अनुच्छेद इस प्रकार है, ‘इंडिया, दैट इज भारत’। इस प्रकार देखा और समझ आ जाए तो ‘भारतीय संविधान’ के हिसाब से हमारे देश के दो आधिकारिक नाम प्राप्त हैं। ‘इंडिया’ और ‘भारत’। हालांकि इसे ‘हिंदुस्तान’, ‘आर्यावर्त’, ‘जंबूद्वीप’ आदि कह कर भी पुकारा जाता है। मगर ‘इंडिया’ और ‘भारत’ के अलावे अन्य कोई भी नाम संवैधानिक नहीं हैं।

मूल रूप में ‘भारतीय संविधान’ में कुल 22 भाग और 395 अनुच्छेद थे। परंतु समयानुसार आवश्यकता को देख-समझ कर इसमें अब तक 127 संविधान संशोधन विधेयक संसद में लाये गये हैं, जिनमें से अब तक 105 विधेयक पारित होकर संविधान संशोधन अधिनियम का रूप ले चुके हैं। संविधान संशोधन (126 वाँ) बिल लोकसभा में जल्दी ही पास हो गया है, जिसके अनुसार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण 10 साल (25 जनवरी 2030) तक के लिए बढ़ाने का प्रावधान है। इस प्रकार वर्तमान में भारतीय संविधान में कुल 470 अनुच्छेद (25 भागों में विभाजित) और 12 अनुसूचियाँ हैं।

‘भारतीय संविधान’ का प्रमुख रक्षक भारत का ‘सर्वोच्च न्यायालय’ है। वह संविधान की रक्षा के साथ ही भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का भी रक्षक है। वह संसद द्वारा निर्मित ऐसी किसी भी विधि को अवैध घोषित कर सकता है, जो संविधान के विरुद्ध हो। इस प्रकार ‘सर्वोच्च न्यायलय’ संविधान की प्रभुता की रक्षा करता है। ‘भारतीय संविधान’ में जुड़े ‘इंडिया’ शब्द को कई लोग नापसंद भी करते हैं। कई चयनित जन प्रतिनिधियों ने सर्वोच्च न्यायालय में आवेदन देते हुए माँग की थी कि संविधान की प्रस्तावना में, अनुच्छेद एक में और संविधान में जहाँ-जहाँ ‘इंडिया’ शब्द का उपयोग हुआ हो, उसे बदल कर ‘भारत’ कर दिया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि ‘इंडिया’ शब्द से एक सामंतशाही शासन का बोध होता है, जबकि ‘भारत’ शब्द से देशी स्वायत शासन का बोध होता है।

3 जून, 2022 को उस आवेदन युक्त याचिका की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, – ‘भारत’ और ‘इंडिया’ दोनों नाम भारतीय संविधान के दिये हुए हैं। ‘इंडिया’ को संविधान में पहले ही ‘भारत’ कहा गया है। इसलिए वे इस नाम को बदल नहीं सकते।’ इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी माँग को केंद्र सरकार के पास भेज दिया है ताकि इस विषय पर संसद अपने विचार को स्पष्ट कर संवैधानिक संशोधन करे।

श्रीराम पुकार शर्मा

श्रीराम पुकार शर्मा
अध्यापक, (श्री जैन विद्यालय, हावड़ा)
हावड़ा – 711101 (पश्चिम बंगाल)
ईमेल सूत्र – [email protected]

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