वाराणसी । श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस पर्व पर प्रमुख नाग मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और भक्त नागदेवता के दर्शन व पूजा करते हैं। सिर्फ मंदिरों में ही नहीं बल्कि घर-घर में इस दिन नागदेवता की पूजा करने का विधान है। ऐसी मान्यता है कि जो भी इस दिन श्रद्धा व भक्ति से नागदेवता का पूजन करता है उसे व उसके परिवार को कभी भी सर्प भय नहीं होता। इस बार यह पर्व 13 अगस्त को है। इस दिन नागदेवता की पूजा किस प्रकार करें, इसकी विधि इस प्रकार है।

पूजन विधि : नागपंचमी पर सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद सबसे पहले भगवान शंकर का ध्यान करें नागों की पूजा शिव के अंश के रूप में और शिव के आभूषण के रूप में ही की जाती है। क्योंकि नागों का कोई अपना अस्तित्व नहीं है। अगर वो शिव के गले में नहीं होते तो उनका क्या होता। इसलिए पहले भगवान शिव का पूजन करेंगे। शिव का अभिषेक करें, उन्हें बेलपत्र और जल चढ़ाएं। इसके बाद शिवजी के गले में विराजमान नागों की पूजा करे। नागों को हल्दी, रोली, चावल और फूल अर्पित करें। इसके बाद चने, खील बताशे और जरा सा कच्चा दूध प्रतिकात्मक रूप से अर्पित करेंगे। घर के मुख्य द्वार पर गोबर, गेरू या मिट्टी से सर्प की आकृति बनाएं और इसकी पूजा करें। घर के मुख्य द्वार पर सर्प की आकृति बनाने से जहां आर्थिक लाभ होता है, वहीं घर पर आने वाली विपत्तियां भी टल जाती हैं।

इसके बाद ‘ऊं कुरु कुल्ले फट् स्वाहा’ का जाप करते हुए घर में जल छिड़कें। अगर आप नागपंचमी के दिन आप सामान्य रूप से भी इस मंत्र का उच्चारण करते हैं तो आपको नागों का तो आर्शीवाद मिलेगा ही साथ ही आपको भगवान शंकर का भी आशीष मिलेगा बिना शिव जी की पूजा के कभी भी नागों की पूजा ना करें। क्योंकि शिव की पूजा करके नागों की पूजा करेंगे तो वो कभी अनियंत्रित नहीं होंगे नागों की स्वतंत्र पूजा ना करें, उनकी पूजा शिव जी के आभूषण के रूप में ही करें।

नाग-नागिन के जोड़े की प्रतिमा (सोने, चांदी या तांबे से निर्मित) के सामने यह मंत्र बोलें :
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
शंखपाल धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा।।
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
सायंकाले पठेन्नित्यं प्रात:काले विशेषत:।।
तस्मै विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्।।

इसके बाद पूजा व उपवास का संकल्प लें। नाग-नागिन के जोड़े की प्रतिमा को दूध से स्नान करवाएं। इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराकर गंध, फूल, धूप, दीप से पूजा करें व सफेद मिठाई का भोग लगाएं। यह प्रार्थना करें।
सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले।।
ये च हेलिमरीचिस्था येन्तरे दिवि संस्थिता।
ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन:।
ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नम:।।

प्रार्थना के बाद नाग गायत्री मंत्र का जाप करें :
ॐ नागकुलाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि तन्नो सर्प: प्रचोदयात्।

इसके बाद सर्प सूक्त का पाठ करें :
ब्रह्मलोकुषु ये सर्पा: शेषनाग पुरोगमा:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासुकि प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
कद्रवेयाश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
इंद्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
पृथिव्यांचैव ये सर्पा: ये साकेत वासिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
ग्रामे वा यदिवारण्ये ये सर्पा प्रचरन्ति च।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
समुद्रतीरे ये सर्पा ये सर्पा जलवासिन:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
रसातलेषु या सर्पा: अनन्तादि महाबला:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

नागदेवता की आरती करें और प्रसाद बांट दें। इस प्रकार पूजा करने से नागदेवता प्रसन्न होते हैं और हर मनोकामना पूरी करते हैं।

नागपंचमी : महाभारत आदि ग्रंथों में नागों की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है। इनमें शेषनाग, वासुकि, तक्षक आदि प्रमुख हैं। नागपंचमी के अवसर पर हम आपको ग्रंथों में वर्णित प्रमुख नागों के बारे में बता रहे हैं।

तक्षक नाग : धर्म ग्रंथों के अनुसार, तक्षक पातालवासी आठ नागों में से एक है। तक्षक के संदर्भ में महाभारत में वर्णन मिलता है। उसके अनुसार, श्रृंगी ऋषि के शाप के कारण तक्षक ने राजा परीक्षित को डसा था, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी थी। तक्षक से बदला लेने के उद्देश्य से राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने सर्प यज्ञ किया था। इस यज्ञ में अनेक सर्प आ-आकर गिरने लगे। यह देखकर तक्षक देवराज इंद्र की शरण में गया।

जैसे ही ऋत्विजों (यज्ञ करने वाले ब्राह्मण) ने तक्षक का नाम लेकर यज्ञ में आहुति डाली, तक्षक देवलोक से यज्ञ कुंड में गिरने लगा। तभी आस्तिक ऋषि ने अपने मंत्रों से उन्हें आकाश में ही स्थिर कर दिया। उसी समय आस्तिक मुनि के कहने पर जनमेजय ने सर्प यज्ञ रोक दिया और तक्षक के प्राण बच गए।

कर्कोटक नाग : कर्कोटक शिव के एक गण हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सर्पों की मां कद्रू ने जब नागों को सर्प यज्ञ में भस्म होने का श्राप दिया तब भयभीत होकर कंबल नाग ब्रह्माजी के लोक में, शंखचूड़ मणिपुर राज्य में, कालिया नाग यमुना में, धृतराष्ट्र नाग प्रयाग में, एलापत्र ब्रह्मलोक में और अन्य कुरुक्षेत्र में तप करने चले गए।

ब्रह्माजी के कहने पर कर्कोटक नाग ने महाकाल वन में महामाया के सामने स्थित लिंग की स्तुति की। शिव ने प्रसन्न होकर कहा- जो नाग धर्म का आचरण करते हैं, उनका विनाश नहीं होगा। इसके बाद कर्कोटक नाग उसी शिवलिंग में प्रवेश कर गया। तब से उस लिंग को कर्कोटेश्वर कहते हैं। मान्यता है कि जो लोग पंचमी, चतुर्दशी और रविवार के दिन कर्कोटेश्वर शिवलिंग की पूजा करते हैं उन्हें सर्प पीड़ा नहीं होती।

कालिया नाग : श्रीमद्भागवत के अनुसार, कालिया नाग यमुना नदी में अपनी पत्नियों के साथ निवास करता था। उसके जहर से यमुना नदी का पानी भी जहरीला हो गया था। श्रीकृष्ण ने जब यह देखा तो वे लीलावश यमुना नदी में कूद गए। यहां कालिया नाग व भगवान श्रीकृष्ण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंत में श्रीकृष्ण ने कालिया नाग को पराजित कर दिया। तब कालिया नाग की पत्नियों ने श्रीकृष्ण से कालिया नाग को छोडऩे के लिए प्रार्थना की। तब श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि तुम सब यमुना नदी को छोड़कर कहीं और निवास करो। श्रीकृष्ण के कहने पर कालिया नाग परिवार सहित यमुना नदी छोड़कर कहीं और चला गया।

इनके अलावा कंबल, शंखपाल, पद्म व महापद्म आदि नाग भी धर्म ग्रंथों में पूज्यनीय बताए गए हैं। नागपंचमी पर नागों की पूजा कर आध्यात्मिक शक्ति और धन मिलता है। लेकिन पूजा के दौरान कुछ बातों का ख्याल रखना बेहद जरूरी है। हिंदू परंपरा में नागों की पूजा क्यों की जाती है और ज्योतिष में नाग पंचमी का क्या महत्व है। अगर कुंडली में राहु-केतु की स्थिति ठीक ना हो तो इस दिन विशेष पूजा का लाभ पाया जा सकता है।

जिनकी कुंडली में विषकन्या या अश्वगंधा योग हो, ऐसे लोगों को भी इस दिन पूजा-उपासना करनी चाहिए. जिनको सांप के सपने आते हों या सर्प से डर लगता हो तो ऐसे लोगों को इस दिन नागों की पूजा विशेष रूप से करना चाहिए।

भूलकर भी ये ना करें :
1. जो लोग भी नागों की कृपा पाना चाहते हैं उन्हें नागपंचमी के दिन ना तो भूमि खोदनी चाहिए और ना ही साग काटना चाहिए।
2. उपवास करने वाला मनुष्य सांयकाल को भूमि की खुदाई कभी न करे।
3. नागपंचमी के दिन धरती पर हल न चलाएं।
4. देश के कई भागों में तो इस दिन सुई धागे से किसी तरह की सिलाई आदि भी नहीं की जाती।
5. न ही आग पर तवा और लोहे की कड़ाही आदि में भोजन पकाया जाता है।
6. किसान लोग अपनी नई फसल का तब तक प्रयोग नहीं करते जब तक वह नए अनाज से बाबे को रोट न चढ़ाएं।

राहु-केतु से परेशान हों तो क्या करें : एक बड़ी सी रस्सी में सात गांठें लगाकर प्रतिकात्मक रूप से उसे सर्प बना लें इसे एक आसन पर स्थापित करें। अब इस पर कच्चा दूध, बताशा और फूल अर्पित करें। साथ ही गुग्गल की धूप भी जलाएं। इसके पहले राहु के मंत्र ‘ॐ रां राहवे नम:’ का जाप करना है और फिर केतु के मंत्र ‘ॐ कें केतवे नम:’ का जाप करें। जितनी बार राहु का मंत्र जपेंगे उतनी ही बार केतु का मंत्र भी जपना है।

मंत्र का जाप करने के बाद भगवान शिव का स्मरण करते हुए एक-एक करके रस्सी की गांठ खोलते जाएं। फिर रस्सी को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। राहु और केतु से संबंधित जीवन में कोई समस्या है तो वह समस्या दूर हो जाएगी।

सांप से डर लगता है या सपने आते हैं : अगर आपको सर्प से डर लगता है या सांप के सपने आते हैं तो चांदी के दो सर्प बनवाएं साथ में एक स्वास्तिक भी बनवाएं। अगर चांदी का नहीं बनवा सकते तो जस्ते का बनवा लीजिए। अब थाल में रखकर इन दोनों सांपों की पूजा कीजिए और एक दूसरे थाल में स्वास्तिक को रखकर उसकी अलग पूजा कीजिए। नागों को कच्चा दूध जरा-जरा सा दीजिए और स्वास्तिक पर एक बेलपत्र अर्पित करें. फिर दोनों थाल को सामने रखकर ‘ॐ नागेंद्रहाराय नम:’ का जाप करें। इसके बाद नागों को ले जाकर शिवलिंग पर अर्पित करें और स्वास्तिक को गले में धारण करें। ऐसा करने के बाद आपके सांपों का डर दूर हो जाएगा और सपने में सांप आना बंद हो जाएंगे।

सुरसा जज्ञिरे सर्पांस्तेषां राजा तु तक्षकः।
वासुकिश्चैव नागानां गणाः क्रोधतमोऽधिकः इति वह्निपुराणे काश्यपीयवंशः॥
जरत्कारुमुनिपत्नी मनसादेवी तु अस्येव भगिनी।
आस्तीकस्य मुनेर्माता भगिनी वासुके स्तथा।।
जरत्कारुमुनेः पत्नी नागमातर्नमोऽस्तु ते।
इति मनसाप्रणाममन्त्रः।।

नागोत्पत्तिर्यथा :
सृजता ब्रह्मणा सृष्टिं मरीचिः सूतिकारणम्।
प्रथमं मनसा ध्यातस्तस्य पुत्त्रस्तु कश्यपः॥
तस्य दाक्षायणी भार्य्या कद्रुर्नाम शुचिस्मिता
मारीचो जनयामास तस्यां पुत्त्रान्महाबलान्
अनन्तं वासुकिञ्चैव कम्बलञ्च महाबलम्।
कर्कोटकञ्च राजेन्द्र! पद्मं चान्यं सरीसृपम
महापद्मं तथा शङ्खं कुलिकञ्चापराजितम् एते कश्यपदायादाः प्रधानाः परिकीर्त्तिताः।
एतेषान्तु प्रसूत्या तु इदमापूरितं जगत्॥ कुटिला हीनकर्म्माणस्तीक्ष्णास्योत्थविषोल्वणा:।
दृष्ट्या संदृश्य मनुजान् भस्म कुर्य्यः क्षणाद्ध्रुवम्॥
शब्दगामी यथा स्पर्शो मनुष्याणां नराधिप!।
अहन्यहनि जायेत क्षयः परमदारुणः॥ आत्मनस्तु क्षयं दृष्ट्वा प्रजाः सर्व्वाः समन्ततः।
जग्मुः शरण्यं शरणं परन्तु परमेश्वरम्॥ इमं सेवार्थमुद्दिश्य प्रजाः सर्व्वा महीपते!।
ऊचुः कमलजं देवं पुराणं ब्रह्मसंज्ञितम्॥

देवा ऊचुः –
देव देवेश लोकानां प्रसूतिः परमेश्वर।
त्राहि नस्तीक्ष्णदंष्ट्रेभ्यो भुजङ्गानौ महात्मनाम्॥
अहन्यहनि ये देव! पश्येयुरुरगा दृशा।
मनुष्यं मृगयूथं वा तत् सर्व्वं भस्मसाद्भवेत्॥
त्वया सृष्टिः कृता देव नीयते सा भुजङ्गमैः।
एतजज्ञात्वा तु दुर्वृत्तं तत् कुरुष्व महामते॥

ब्रह्मोवाच –
अहं रक्षां विधास्यामि भवतीनां न संशयः।
व्रजध्वं स्वानि धिष्ट्यानि प्रजापालाः ससाध्वसाः॥
एवमुक्ताः प्रजास्तेन ब्रह्मणाव्यक्तमूर्त्तिना।
आगतासु प्रजास्वाद्यस्तानाहूय भुजङ्गमान्॥
शशाप परमक्रुद्धो वासुकिप्रमुखांस्तथा।

ब्रह्मोवाच –
यतो मत्प्रभवान्नित्यं क्षयं नयत मानुषान॥
भवान्तरे तथान्यस्मिन्मातुः शापात् सुदारुणात्।

भवितातिक्षयो घारो नूनं स्वायम्भुवान्तरे॥
एवमुक्तास्तु वेपन्तो ब्रह्मणा भुजगोत्तमाः।

निपत्य पादयोस्तस्य इदमूचुर्व्वचस्तदा।। नागा ऊचुः।

भगवन्! कुटिला भवता कृता।
विषोल्वणत्वं क्रूरत्वं दृक्शस्त्रत्वञ्च नस्तथा।।

सम्पादितं त्वया देव इदानीं शमयाच्युत!॥ ब्रह्मोवाच।
यदि नाम मया सृष्टा भवन्तः कुटिलाशयाः।

ततः किं मनुजान्नित्यं भक्षयध्वं गतव्यथाः॥ नागा ऊचुः।
मर्य्यादां कुरु देवेश! स्थानञ्चैव पृथक् पृथक्।
नागानां वचनं श्रुत्वा देवो वचनमब्रवीत्॥

अहं करोमि वो नागाः समयं मनुजैः सह।
तदेकमनसः सर्व्वे शृणुध्वं मम शासनम्॥

पातालं वितलञ्चैव सुतलाख्यं तृतीयकम्।
दत्तं वै वस्तुकामानां गृहं तत्र गमिष्यथ॥
तत्र भोगान् बहुविधान् भुञ्जध्वं मम शासनात्।
तिष्ठध्वं सप्तमं यावद्रात्र्यन्तन्ते पुनः पुनः॥

ततो वैवस्वतस्यादौ काश्यपेया भविष्यथ।
दायादाः सर्व्वदेवानां सपर्णस्य च धीमतः॥
तदा प्रसूतिर्व्वः सर्व्वा भोक्ष्यते चित्रभानुना।
भवतां नैव दोषोऽयं भविष्मति न संशयः॥

ये वै क्रूरा भोगिनो दुर्विनीतास्तेषामन्तो भविता नान्यथैतत्।
कालं प्राप्तं भक्षयध्वं दशध्वं तथा परान् चापकृतो मनुष्यान्॥

मन्त्रौषधैर्गारुडमण्डलैश्च बद्धैर्दृष्टा मानवा ये चरन्ति।
तेषां भीतैर्व्वर्त्तितव्यं नचान्यच्चिन्त्यं कार्य्यं चान्यथा वो विनाशः॥
इतीरिते ब्रह्मणा ते भुङ्गजा जग्मुः स्थानं क्ष्मातलाख्यं हि सर्व्वे।
तस्थुर्भोगान् भुञ्जमानाः समग्रान् रसातले लीलया संस्थितास्ते ॥
एवं शापं ते तु लब्ध्वा प्रसादञ्च चतुर्मुखात्।
तस्थुः पातालनिलये मुदितेनान्तरात्मना॥

एतत् सर्व्वञ्च पञ्चम्यां तेषां जातं महात्मनाम्।
अतस्त्वियं तिथिर्धन्या सर्व्वपापहरा शुभा॥
एतस्यां संयतो यस्तु अम्लन्तु परिवर्ज्जयेत्।
क्षीरेण स्नापयेन्नागांस्तस्य यास्यन्ति मित्रताम्
इति वराहपुराणम्॥

एषां शिवभूषणप्रमाणं यथा – वासुक्याद्याश्च ये सर्पा यथास्थानञ्च ते हरम् भूषयाञ्चक्रुरुद्गम्य शिरोबाह्वादिषु द्रुतम्॥
इति कालिकापुराणे शिवविवाहे १८ अः।।

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पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री

ज्योतिर्विद वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
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