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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष…

हर युग में इस धरती की प्राणाधार है नारी, 
निजको अर्पण कर करती सबका उत्थान है नारी।  
इसी में है निहित जगत-जननी का शक्ति स्वरूप,
यह तो खल-मर्दिनी काली-दुर्गा विकराल है नारी।।

श्रीराम पुकार शर्मा, कोलकाता । प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समाज के नवनिर्माण में महिलाओं की भूमिका अकाट्य रही है। आज महिलाएँ पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर प्रदत्त सभी दायित्वों को बड़ी सक्रियता और सफलता पूर्वक निर्वाह कर रही हैं। महिलाओं की इन्हीं अनमोल योगदानों और उपलब्धियों की सराहना हेतु प्रति वर्ष 8 मार्च को विश्व स्तर पर ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ उत्सव मनाने की परम्परा रही है। आज के दिन विश्व के प्रायः सभी कार्य-क्षेत्रों में संलग्न रही महिलाओं के प्रति सम्मान, प्रशंसा और प्रेम-भाव प्रकट करते हुए उनके सापेक्ष ही उन्हें विशेष सम्मान प्रदान हेतु यह ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ मनाया जाता है। आज से 114 वर्ष पूर्व, अर्थात वर्ष 1908 ई० में अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में काम के लिए कम घंटों, बेहतर तनख़्वाह और वोटिंग के अधिकार की माँग करती हुई क़रीब 15 हज़ार महिलाएँ प्रदर्शन हेतु सड़कों पर उतरी थीं। जिनके प्रदर्शन से प्रभावित होकर अमरीका की तत्कालीन ‘सोशलिस्ट पार्टी’ ने ‘महिला दिवस’ मनाने की घोषणा की थी। इस प्रकार ‘महिला मजदूर आन्दोलन’ की नींव पर ही वर्तमान ‘अंतररष्ट्रीय महिला दिवस’ का वृहद् स्वरूप आधारित है।

‘महिला दिवस’ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाने का सर्वप्रथम विचार ‘क्लारा ज़ेटकिन’ नामक एक जर्मन कम्युनिस्ट महिला का था, जो उस वक़्त डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में सन् 1910 में कामकाजी महिलाओं की एक अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में भाग ले रही थीं, जिसमें उस वक़्त 17 देशों से आई कोई 100 से भी अधिक महिलाएँ मौजूद थीं। क्लारा ज़ेटकिन ने उस महिला कांफ्रेंस में ही विश्व स्तर पर महिला दिवस मनाने का प्रस्ताव किया, जिसे सभी महिलाओं ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया था। इस प्रकार क्लारा ज़ेटकिन ने ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ की नींव रखी थी।

प्रथम ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ सन् 1911 में ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विटज़रलैंड में मनाया गया था। इसे औपचारिक स्वरूप सन् 1917 में दिया गया, जब रूस में महिलाओं ने ‘ब्रेड एंड पीस’ की माँग करते हुए चार दिनों तक हड़ताल की, जिसके उपरांत तत्कालीन रूस के बादशाह ज़ार निकोलस को अपना पद छोड़ना पड़ा था। चुकी वह दिन वहॉं के जूलियन कैलेंडर के अनुसार 23 फरवरी था, परन्तु दुनिया के बाक़ी देशों में प्रचलित ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार वह दिन 8 मार्च था। अतः तब से प्रतिवर्ष 8 मार्च को ही विश्व भर में ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ मनाया जाने लगा। जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘संयुक्र राष्ट्र संघ’ ने इसकी मान्यता सन् 1975 में दी है।

‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ कैंपेन के लिए 1908 में ब्रिटेन की ‘वीमेंस सोशल एंड पॉलिटिकल यूनियन’ ने बैंगनी, हरा और सफेद रंग को इसका प्रतीकात्मक ‘रंग’ के रूप अपनाया था। जिसमें हरा रंग उम्मीद को, बैंगनी रंग न्याय-गरिमा को और सफेद रंग शुद्धता को दर्शाता है। ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ ने अपने एक विशेष अभियान में कहा है कि “एक शताब्दी के बाद भी हम महिलाएँ जीवन के विविध क्षेत्रों में अपेक्षित लैंगिक समानता हासिल नहीं कर पाए हैं।” अतः इसके आयोजन के माध्यम से माहिलाओं के साथ होने वाली असमानताओं को प्रदर्शित कर समाज में उनके अधिकारों को सुनिश्चित करने की व्यवस्था की जाती है। भारत सहित कई देशों की महिला कार्यकर्ताओं का मानना है कि महिला को अधिकार देने के विपरीत उन्हें निरंतर हिंसक धमकी, सामाजिक अवहेलना, आर्थिक परतंत्रता और क़ानूनी मामलों में उपेक्षा का ही शिकार होना पड़ रहा है।

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भारत में महिला के अधिकारों की रक्षा तथा उनके जीवन की उन्नति को केंद्र कर सुविख्यात महिला स्वतंत्रता सेनानी और ‘भारत कोकिला’ के नाम से विख्यात कवयित्री सरोजिनी नायडू ने निरंतर देश की आजादी और महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। देश की आजादी के बाद सरोजिनी नायडू को पहली महिला राज्यपाल बनने का गौरव भी प्राप्त हुआ। अतः महिलाओं के अधिकारों के लिए उनकी भूमिका को देखते हुए उनके जन्मदिन 13 फरवरी को ही देश भर में ‘राष्ट्रीय महिला दिवस’ मनाया जाता है।

विद्वानों का मानना है कि प्राचीन भारत में भी महिलाओं को जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ बराबरी का दर्जा हासिल था। वैदिककालीन समाज में महिलाएँ शिक्षा के अधिकारी मानी जाती थीं, उन्हें उपयुक्त शिक्षा दी जाती थी। महिलाओं की शादी एक परिपक्व उम्र में होती थी और संभवतः उन्हें अपनी इच्छानुसार अपना पति चुनने का भी अधिकार प्राप्त था। ऋग्वेद और उपनिषद जैसे ग्रन्थों में गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं का नाम उल्लेखित है। हालांकि बाद में भारत में इस्लामी आक्रमण और इसके बाद ईसाइयत के आगमन से भारतीय महिलाओं की आजादी और अधिकार निरंतर सीमित होती चली गईं। फिर भारतीय महिलाओं को पारिवारिक और सामाजिक दासता व बंदिशों के आधीन रहना पड़ा है, जिसका कुप्रभाव सती-प्रथा, बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा आदि के रूप में हमें दिखाई पड़ते हैं।

समाज में ऐसी विषम परिस्थितियों के बावजूद भी कुछ महिलाओं ने सामाजिक, राजनीति, धर्मिक, व साहित्यिक क्षेत्रों में अपने नाम को रोशन कर सबको चकित कर दीं। रज़िया सुल्तान दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाली पहली महिला बनी। गोंड की महारानी दुर्गावती ने 1564 में मुगल सम्राट अकबर से लोहा लेती हुई अगले पंद्रह वर्षों तक शासन किया था। चाँद बीबी ने भी 1590 के दशक में अकबर के खिलाफ़ लोहा लेती हुई अहमदनगर की रक्षा की। जहाँगीर की पत्नी नूरजहाँ ने राजशाही शक्तियों का प्रभावशाली ढंग से इस्तेमाल किया। कर्नाटक में कित्तूर रियासत की रानी कित्तूर चेन्नम्मा ने लार्ड डलहौजी की ‘राज्य हड़प नीति’ खिलाफ़ अंग्रेजों के विरूद्ध सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया। तटीय कर्नाटक की महारानी अब्बक्का ने 16 वीं सदी में पुर्तगाली सेना के खिलाफ़ अपने राज्य की सुरक्षा का नेतृत्व किया।

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झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ़ 1857 के भारतीय क्रांति का स्वर बुलंद किया। अवध की शासिका बेगम हज़रत महल ने भी 1857 के विद्रोह का नेतृत्व किया था। दक्षिण भारत में कई महिलाओं ने गाँवों, शहरों और जिलों पर शासन करती हुई सामाजिक एवं धार्मिक संस्थानों की शुरुआत की थीं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भिकाजी कामा, डॉ॰ एनी बेसेंट, प्रीतिलता वाडेकर, विजयलक्ष्मी पंडित, राजकुमारी अमृत कौर, अरुणा आसफ़ अली, सुचेता कृपलानी, कस्तूरबा गाँधी, कमला नेहरू, मातंगिनी हाजरा, कप्तान लक्ष्मी सहगल आदि महिलाओं ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। महिला संत-कवयित्री मीराबाई, अक्का महादेवी, रामी जानाबाई और लाल देद का नाम साहित्य में सादर स्वीकृत है।

सिक्खों के पहले गुरु, गुरु नानक ने भी महिलाओं को धार्मिक संस्थानों का नेतृत्व करने, सामूहिक प्रार्थना के रूप में गाये जाने वाले वाले कीर्तन या भजन को गाने और इनकी अगुआई करने, धार्मिक प्रबंधन समितियों के सदस्य बनने, युद्ध के मैदान में सेना का नेतृत्व करने, विवाह में बराबरी का हक और अमृत (दीक्षा) में समानता की अनुमति देने की वकालत की। अंग्रेजी शासन के दौरान राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फ़ुले आदि जैसे कई सुधारकों ने महिलाओं के उत्थान व सशक्तिकरण के लिए सामाजिक और कानूनी लिये लड़ाइयाँ लड़ीं।

भारत में महिलाएं अब राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी तरह की गतिविधियों जैसे कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, व्यापारिक, प्रबन्धन, शिक्षा, मीडिया, कला और संस्कृति, सेवा क्षेत्र, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आदि में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं। भारत सरकार ने 2001 को महिला सशक्तीकरण वर्ष के रूप में घोषित किया था। फिर ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ के एक दिन बाद ही अर्थात 9 मार्च, 2010 को राज्यसभा ने ‘महिला आरक्षण बिल’ को पारित कर महिलाओं को नायब तोफा प्रदान किया, जिसके आधार पर संसद और राज्य की विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की व्यवस्था की गई है।

‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ के अवसर पर इंदिरा गाँधी (पूर्व प्रधान मंत्री), मदर टेरेसा (नोबल शांति पुरस्कार), एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी, गंगूबाई हंगल, लता मंगेशकर (सभी गीत-संगीत) के साथ ही प्रेम माथुर (प्रथम महिला व्यावसायिक पायलट), विजय लक्ष्मी पंडित (यूनाइटेड नेशंस जनरल एसेम्बली की महिला अध्यक्ष), सुचेता कृपलानी (पहली महिला मुख्यमंत्री, यु.पी.), किरण वेदी (प्रशासिका), अन्ना चान्डी, (उच्च न्यायालय की पहली महिला जज, केरल), आंजोली इला मेनन (चित्रकार), चंदा कोचर (बैंकिंग),  पी.टी. उषा, जे. जे. शोभा (एथलेटिक्स), सुनीता विलियम्स (अन्तरिक्ष यात्री), बचेन्द्री पाल (पर्वतारोही), कल्पना चावला (अन्तरिक्ष यात्री), प्रतिभा पाटिल (पूर्व राष्ट्रपति), मीरा कुमार (लोकसभा अध्यक्ष), सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम, आशापूर्णा देवी (साहित्यकार), कुंजरानी देवी व कर्णम मल्लेश्वरी (भारोत्तोलन), डायना एडल्जी (क्रिकेट), साइना नेहवाल (बैडमिंटन), कोनेरू हम्पी (शतरंज), सानिया मिर्जा (टेनिस), मैरी कैम (मुक्केबाजी), मेधा पाटेकर (सामाजिक) आदि को हम सादर स्मरण करते हैं। इसी तरह से भारत में पंचायत राज संस्थाओं के माध्यम से वर्तमान में दस लाख से अधिक महिलाएँ राजनीति-क्षेत्र में सक्रिय हैं और राष्ट्रीय तथा सामाजिक क्षेत्रों में बढ़-चढ़ कर काम कर रही हैं।

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हम ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ के पावन अवसर पर महिलाओं सम्बन्धित वर्तमान मुश्किलें, यथा – श्रमशक्ति की भागीदारी, पैत्रिक सम्पति में हिस्सेदारी, महिलाओं सम्बन्धित अपराध, यौवन-उत्पीड़न, दहेज़-उत्पीड़न, बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा, कन्या भ्रूण-हत्या, घरेलू-हिंसा, नारी-तस्करी तथा उनके जर्जर स्वस्थ्य को भी नहीं भूले हैं। पर इन समस्याओं को न सिर्फ कोई भी सरकार, बल्कि हमारी प्रगतिशील मनोवृतियाँ दूर कर सकती है। फिर भी अधिकांश देशों की अपेक्षा भारत में महिला सशक्तिकरण की योजना निरंतर प्रबलता के साथ प्रगतिशील बनी हुई है और उम्मीद भी की जाती है कि यह प्रगतिशीलता आगे आने वाले समय में भी बनी ही रहेगी। मनुस्मृति में उल्लेखित है –
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।
(जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ स्त्रियों की पूजा नहीं होती है, वहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं)

श्रीराम पुकार शर्मा

श्रीराम पुकार शर्मा,
हावड़ा – 711101 (पश्चिम बंगाल)
ई-मेल सम्पर्क सूत्र – rampukar17@gmail।com

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