‘जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं।।’
श्रीराम पुकार शर्मा हावड़ा। आज आषाढ़ मास की पावन पूर्णिमा है। आज ही के दिन ‘महाभारत’ के सृजनकर्ता महर्षि वेद व्यास का इस धरती पर अवतरण हुआ था, जिन्हें सनातन हिंदू धर्म में प्रथम गुरु माना जाता है। फलतः महान दिग्दर्शन महर्षि वेद व्यास को स्मरण करते हुए, उनके अवतरण संबंधित पावन तिथि को ‘गुरु पूर्णिमा पर्व’ के रूप में मनाई जाती है। ‘नारदपुराण’ के अनुसार ‘गुरु पूर्णिमा पर्व’ आत्मस्वरूप का ज्ञान देने और कर्तव्य बताने वाले गुरु के प्रति अपनी आस्था प्रकट करने के लिए मनाया जाता है। यही हमारी सनातनी परंपरा भी है। आज का विशेष दिन ‘गुरु पूर्णिमा’ गुरुओं के प्रति सम्मान, श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का ही विशेष दिन है।
श्रीराम भक्तप्रवर गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार, – ‘जो लोग गुरु के चरणों के पावन रजकण को अपने शीश पर धारण करते हैं, वे मानो समस्त भौतिक सहित स्वर्गीय ऐश्वर्य-वैभव को अपने वश में कर लेने की विशेष शक्ति को प्राप्त कर लेते हैं।’ शायद इसीलिए त्रिलोकपति श्रीहरि विष्णु जी भी अपने गुरूजनों का यशोगान करते नहीं थकते हैं। जो हमारी अज्ञानता रूपी तिमिर को अपने ज्ञान रूपी ज्योति-श्लाका से जलाकर जो नष्ट कर देता है, अर्थात मन में व्याप्त अज्ञानता को नष्टकर ज्ञान के नवीन प्रकाश को भर देता है, उसे ही ‘गुरु’ कहा जाता है।
गुरु के प्रयास और उनकी कृपा से ही व्यक्ति को लोक तथा परलोक की सभी विद्याएँ व सद्गतियाँ प्राप्त होती हैं। इसीलिए जगत में ईश्वर के अस्तित्व के संबंध में भले ही मतांतर है, परंतु जीवन में गुरु के महत्व को सभी धर्मावलम्बियों और संप्रदायों ने निर्विरोध स्वीकार किया है। गुरु आत्मा (व्यक्ति) और परमात्मा (ज्ञान, सिद्धि) के मध्य प्रबल सेतु सदृश माध्यम होते हैं, जिससे जुड़कर ही व्यक्ति अपनी जिज्ञासाओं को शांत कर और अपने दोषों से मुक्त होकर, प्रभु से साक्षात्कार करने में सक्षम हो पाता है।
गुरु बिना न, तो आत्म-दर्शन संभव है, और न ही आध्यात्म-दर्शन ही, अर्थात गुरु की सानिध्यता से ही व्यक्ति इस लोक के समस्त तत्वों को प्राप्त कर सकता है। गुरु की महिमा को भगवान से भी अधिक मानी गई है, क्योंकि गुरु के आशीर्वाद से जीवन का अंधेरा मिटता है और परमज्ञान का दिव्य प्रकाश मिलता है। गुरु की कृपा से हम अपने जीवन को सही दिशा में ले जा सकते हैं।
‘सकल सुमंगल मूल जग, गुरुपद पंकज रेनु॥’
भारतीय सनातनी संस्कृति में गुरु-शिष्य परम्परा आध्यात्मिक प्रज्ञा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक अद्भुत पवित्र सेवा की परंपरा है, जिसके अन्तर्गत गुरु अपने शिष्य को नि:स्वार्थ भाव से अपनी योग्यता के अनुकूल शिक्षा में पारंगत करते हैं। बाद में वह शिष्य, गुरु से प्राप्त ज्ञान के माध्यम से स्वयं अपने आप को, अपने परिवार को, अपने समाज को, अपने देश को और फिर लोकहितार्थ के कार्यों को सम्पादित कर उन्हें समृद्धशाली, खुशहाल और उन्नत बनाता है। गुरु-शिष्य की यह पवित्र परम्परा ज्ञान के आदान-प्रदान के लगभग सभी क्षेत्रों में समान रूप से प्रतिष्ठित है, जैसे पठन-पाठन, अध्यात्म, संगीत, कला, खेलकूद, वास्तु, विज्ञान, चिकित्सा, कार्य-क्षेत्र आदि सब कुछ में। 
एकमात्र गुरु ही माता-पिता के समान ही अपने शिष्य के निरंतर भौतिक और आध्यात्मिक उत्तरोत्तरी विकास की हार्दिक कामना रखते हुए उसे अपने से भी अधिक क्षमतावान व श्रेष्ठ बनाना चाहते हैं। वह तो उस कुम्हार की भाँति होते हैं, जो कच्ची मिट्टी के घड़े रूपी अपने विद्यार्थी को सही स्वरूप देने के लिए ऊपर से तो जरूरत के अनुकूल चोट करते हैं, तो अन्तः से उचित सहारा भी देते हैं। अतः शिष्य को चाहिए कि वह अपने मन में अपने गुरु के प्रति कोई शंका न रखते हुए, अपने माता-पिता के समान ही अपने गुरु के प्रति भी उचित आदर-सम्मान और सेवा की भावना रखे। संत काबीरदास ने तो स्पष्ट ही कहा है –
‘कबिरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और। हरि के रूठे ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर।।’
हर नवजात शिशु निर्बल और ज्ञानशून्य कच्ची मिट्टी के लोंदा के समान कोमल हुआ करता है। फिर पहले तो उसके माता-पिता व परिजन उसमें प्रेमयुक्त सबलता के भावरस को संचारित करते हैं, तत्पश्चात उसे जीवन सहित पारिवारिक, सामाजिक और सांसारिक मूल्यों के अनुकूल सक्षम बनाने का वृहद कार्य गुरुजनों के द्वारा ही संपादित होता है। गुरु ज्ञान युक्त हितचिंतक, मार्गदर्शक, विकास प्रेरक एवं विघ्न विनाशक बनकर उसका नियमित विकास करने लगते हैं, जिससे वह जीवनगत बाधाओं पर सफलताओं की विविध सीढ़ियों पर क्रमशः चढ़ता हुआ, अपने जीवन से संबंधित परम लक्ष्य को प्राप्त करता है। इस प्रकार गुरु व्यक्ति विशेष को भवसागर के पार उतारने में एक चतुर नाविक की भूमिका का निर्वाह करते हैं।
गुरू की ज्ञानमूलक चेतना को ही अंगीकार करके मनुष्य इस जड़- चेतन, चर-अचर से परिपूर्ण लोक और फिर परलोक की परम सिद्धियों को प्राप्त करने का अधिकारी बन जाता है। ज्ञान मंच पर आरूढ़ गुरू प्रसन्न होकर अपने शिष्यों को भोग एवं मोक्ष, दोनों का ही वरदान देते हैं । वे अपने ज्ञान व तप के प्रभाव से सहज ही शिष्यों के संचित कुकर्मों को भस्म कर, सद्कर्मों से उसे अलंकृत करते हैं। ज्ञानमूलक चेतना से युक्त सद्गुरू की महिमा को बताते हुए भगवान् शंकर गुरू आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर करते हैं। देवाधिदेव महादेव माँ भगवती पार्वती से कहते हैं है ‘ध्यानमूलं गुरुर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम्। मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥’
अर्थात, ‘गुरु की मूर्ति, भक्त के ध्यान का मूल है। गुरु के चरण, समस्त पूजाओं का मूल है। गुरु का वचन, सभी मंत्रों का मूल है। गुरु की कृपा, सांसारिकता से मोक्ष का मूल होता है।’
गुरु-शिष्य की पवित्र परंपरा की बातें होने पर अनायास ही गुरु द्रोणाचार्य-शिष्य एकलव्य की, गुरु चाणक्य-शिष्य चन्द्रगुप्त की, गुरु रामकृष्ण परमहंस-शिष्य स्वामी विवेकानंद की, समर्थ गुरु रामदास-शिष्य शिवाजी आदि की बातें हमें स्मरण हो उठती हैं। भील पुत्र एकलव्य, अपने गुरु द्रोणाचार्य के प्रति सत्य निष्ठा, श्रद्धा, भक्ति, विश्वास, समर्पण आदि भाव रखने के कारण ही गुरु के परोक्ष रहते हुए भी धनुर्विद्या में पारंगत हो गया। गुरु चाणक्य के प्रति एकनिष्ठा, विश्वास, समर्पण आदि के भाव कारण ही चन्द्रगुप्त एक साधारण बालक से मौर्यवंश का निर्माता और एक महान शासक बना।
समर्थ गुरु रामदास के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास ने ही शिवाजी को मराठा साम्राज्य का अधिनायक बना दिया। गुरु रामकृष्ण परमहंस के प्रति सत्य निष्ठा, श्रद्धा, भक्ति, विश्वास, समर्पण, सेवा आदि भाव रखने के कारण ही साधारण बालक नरेंद्र आगे चलकर संसार को नई दिशा प्रदान करने वाले स्वामी विवेकानन्द बन पाए। गुरु-शिष्य संबंधित ऐसे उदाहरण हमारे इतिहास में अनगिनत भरे पड़े हैं। गुरु के निःस्वार्थ कार्यों को स्मरण कर उनके सम्मान में प्रति वर्ष ही आषाढ़ पूर्णिमा पर ‘गुरुपर्व’ मनाया जाता है, जिसे ‘गुरु पूर्णिमा’ भी कहते हैं।
हमारी पवित्र सनातनी भारत-भूमि पर देव-काल से ही गुरू-शिष्य की और गुरुजनों के प्रति विशेष आदर-सम्मान की भव्य अटूट परंपरा निर्बाध गति से चलती आ रही है। सभ्य समाज में गुरु के बिना किसी व्यक्ति विशेष के जीवन का कोई अस्तित्व ही नहीं माना गया है। हमारी संस्कृति और हमारे प्राचीन ग्रंथों में गुरु को देवों के समकक्ष और कहीं देवों से भी श्रेष्ठ माना गया है, जो होना भी चाहिए। कहा भी गया है –
“गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।”
अर्थात – ‘गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शंकर है। गुरु ही साक्षात् परब्रह्म है, उन सद्गुरु को मेरा प्रणाम।’ – ‘गुरु ब्रह्मा है, क्योंकि वह अपने दिव्य ज्ञान के माध्यम से अपने शिष्य को नव जन्म देता है। गुरु विष्णु है, क्योंकि वह अपने शिष्य को अपने ज्ञान रूपी कवच से रक्षा करता है और गुरु साक्षात् महेश्वर भी है, क्योंकि वह अपने शिष्य के सारे दोषों का समयानुसार संहार भी करता है।’
शिक्षण-कार्य की बराबरी, जगत में कोई भी अन्य पेशा नहीं कर सकती है, क्योंकि हर पेशे में ही स्वार्थ की भावना प्रबल होती है। हर पेशा ही लाभ को केंद्र कर संचालित हुआ करता है, पर एक मात्र शिक्षण-कार्य ही ऐसा है, जहाँ गुरु सर्वदा अपने शिष्य के जीवन में उत्तरोतर विकास की ही चाहत रखता है, अपनी पहुँच से भी और अधिक। अन्य कुछ भी नहीं। इसीलिए गुरु से हम आजीवन ऋणमुक्त नहीं हो सकते हैं। हम सिर्फ उन्हें सम्मान और धन्यवाद ही दे सकते हैं, जिसको पाकर गुरु परमसंतुष्टि को प्राप्त करते हैं।
गुरू का ध्यान, उनकी पूजा, उनके ही कथनों के अनुसार जीवन को साधने एवं उनकी ही कृपा से परम पद की प्राप्ति- यही साधना का सहज पथ माना जाता है। यदि गुरू प्रसन्न हों, तो काल को भी अपने पाँव को पीछे लौटाने पड़ते हैं। जो शिष्य अपने सद्गुरू की कृपा छाँव में रहता है, उसका भला कौन क्या बिगाड़ सकता है? इस सत्य को स्थापित करने वाली एक घटना, बंगाल के महान साधक सुरेन्द्र नाथ बनर्जी से संबंधित है, जिसे जानकर शिष्यगणों को सहज ही गुरू की महिमा का बोध होगा।
साधक सुरेन्द्रनाथ बनर्जी (प्रसिद्ध राष्ट्रवादी सुरेन्द्रनाथ बनर्जी नहीं) उन दिनों सर्वेयर के पद पर कार्यरत थे। इस पद पर उनकी आमदनी तो ठीक थी, पर पारिवारिक जीवन बहुत ही अस्त-व्यस्त था। पहले बेटी का मरना, फिर पत्नी का लम्बी बीमारी के बाद देहत्याग! इन विषमताओं ने उन्हें विचलित कर दिया था। ऐसे में उनकी मुलाकात महान् सन्त सूर्यानन्द गिरी से हुई। सुरेन्द्रनाथ के विकल मन ने सन्त की शरण में छाँव पाना चाहा। इसी उद्देश्य से वह उन संन्यासी महाराज की कुटिया में गए और दीक्षा देने की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना को सुनकर महाराज सूर्यानन्द गिरी नाराज हो गए और उन्हें डपटते हुए बोले – ‘आज तक तुमने क्या सत्कर्म किया है, जो मेरा शिष्य बनना चाहते हो। जाओ, पहले सत्कर्म करो।’
उनकी इस झिड़की को सुनकर सुरेन्द्रनाथ विचलित नहीं हुए और बोले – ‘महाराज! आज्ञा दीजिए।’
संन्यासी सूर्यानन्द गिरी ने कहा – ‘इस संसार में पीड़ित मनुष्यों की संख्या कम नहीं है। उन पीड़ितों की सेवा करो।’
‘जो आज्ञा प्रभो !’ सुरेन्द्रनाथ ने कहा – ‘मैंने सम्पूर्ण अन्तस् से आपको अपना गुरू माना है, आपके द्वारा कहा गया, प्रत्येक वाक्य मेरे लिए मूलमंत्र है। आपके द्वारा उच्चारित प्रत्येक अक्षर मेरे लिए प्रेरणा बीज है।’
ऐसा कहकर सुरेन्द्रनाथ कलकत्ता चले आए और अभावग्रस्त, लाचार, दुःखी मनुष्यों की सेवा करने लगे। उन्हें अस्पताल ले जाकर भर्ती करने लगे। निराश्रितों के सिरहाने बैठकर सेवा करते हुए, वे गरीबों के मसीहा बन गए। धीरे-धीरे पास की सारी रकम समाप्त हो जाने पर वे कुली का काम करने लगे। उससे उन्हें जो आमदनी होती, उससे अपाहिजों की सहायता करने लगे। ऐसी दशा में उनके कई वर्ष गुजर गए। इस बीच संन्यासी सूर्यानन्द गिरी से उनकी कोई मुलाकात नहीं हुई।
एक दिन, जब वे कुली का काम करके किसी मिल से बाहर निकले, तो देखा कि सामने गुरूदेव खड़े हैं। सुरेन्द्रनाथ के प्रणाम करते ही उनसे गुरूदेव ने कहा – ‘सुरेन्द्र! तुम्हारी परीक्षा पूर्ण हुई, अब तुम मेरे साथ चलो।’
अपने आराध्य महान् सन्त सूर्यानन्द गिरी के आदेश को शिरोधार्य करके सुरेन्द्रनाथ चुपचाप गुरू के पीछे-पीछे चल पड़े। गुरूदेव उन्हें बंगाल, आसाम पार कराते हुए बर्मा के जंगलों में ले गए। यही से उनकी साधना का क्रम शुरू हुआ। गुरू-कृपा से सुरेन्द्रनाथ एक महान् सिद्ध हुए, जो सन्त महानन्द गिरी के नाम से प्रसिद्ध हुए। परवर्ती काल में जब कोई उनसे साधना का रहस्य जानना चाहता, तो वे एक ही बात कहते – ‘मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं’ गुरू वाक्य ही मेरा मूल मंत्र है। इसकी साधना से सब कुछ स्वयं ही हो जाता है।’ सचमुच ही गुरूदेव की महिमा अनन्त व अपार है।
विद्यालय में गुरु-शिष्य के बीच स्निग्धता युक्त संपर्क पर ही अनुशासनबद्धता निर्भर करती है। इससे एक ओर तो गुरु विद्यार्थियों की समस्याओं को जान पाते हैं, तो दूसरी ओर अपने मधुर व्यवहार से अपने विद्यार्थियों के हृदय करीब पहुँच जाते हैं। यह पद्धति विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता को रोकने में बहुत ही सहायक हुआ करता है। गुरुजनों के कंधों पर ही राष्ट्र के भावी नागरिकों के निर्माण का दायित्व है, जिससे वे अपना मुख नहीं मोड़ सकते हैं। जब उनके सभी विद्यार्थी सुसामाजिक और सुसंस्कृत बनेंगे, तब ही इस ‘गुरु-पूर्णिमा पर्व’ का औचित्य सिद्ध होगा। तब ही ‘गुरु-पर्णिमा पर्व’ का वास्तविक उद्देश्य भी पूर्ण होगा।
अतः ‘गुरु पूर्णिमा’ के पावन अवसर पर अपने जीवन को साधने के क्रम में रंचमात्र भी ज्ञान-ज्योति प्रदान करने वाले ज्ञात-अज्ञात अपने समस्त गुरुजनों के चरणों के पावन रजकण को अपने शीश पर धारण कर उन्हें सादर नमन करते हैं।
श्रीराम पुकार शर्मा
अध्यापक,
श्री जैन विद्यालय, हावड़ा
ई-मेल सूत्र – rampukar17@gmail.com

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