अंबेडकर जयंती पर विशेष : इंसान का धर्म वही हो जो मानवता व समानता सिखाता हो

डॉ. विक्रम चौरसिया, नई दिल्ली । सोचिए जिसको स्कूल में सबसे पीछे बिठाया जाता हो, इतना ही नहीं उनको तो स्कूल में पानी भी नहीं पीने दिया जाता था, कई बार उनको सवारी गाड़ी से भी उतार दिया गया था, जब बाबा साहब बरोडा रियासत में नौकरी कर रहे थे, चपरासी उनको पानी तक नहीं पिलाता था, बल्कि दूर से टेबल पर रख देता था, एक बार तो एक पारसी मकान मालिक ने जब मालुम चला की पिछड़े समाज से है तो उनको लाठी डंडे से पीटकर घर से निकाल दिया , बाबा साहब का सम्पूर्ण जीवन सामाजिक कोरोना से संघर्ष करते हुए ही बीता।

लेकिन बदले में संघर्ष करते हुए भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन के 65 सालों में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, औद्योगिक, संवैधानिक आदि क्षेत्रों में अनगिनत कार्य करके राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिए उन्होंने कई ऐसे काम किए, जिन्हें हिंदुस्तान के बच्चा बच्चा जब तक चांद सूरज रहेगा याद रखेगा। अंबेडकर जयंती हर वर्ष 14 अप्रैल को एक त्यौहार के रूप में भारत ही नहीं विश्व के और कई देशों में भी मनाई जाती है।

जीवन भर समानता के लिए संघर्ष करने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती के दिन को उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए ‘समानता दिवस’ और ‘ज्ञान दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है। डॉ. अंबेडकर विश्व भर में मानवाधिकार आंदोलन, संविधान निर्माण और उनकी प्रकांड विद्वता के लिए जाने जाते हैं। बाबासाहेब 1952 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़े लेकिन वो हार गए। मार्च 1952 में उन्हें राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और फिर अपनी मृत्यु तक वो इस सदन के सदस्य रहे।

डॉ. भीमराव अंबेडकर प्रकांड विद्वान थे तभी तो अपने विवादास्‍पद विचारों और कांग्रेस व महात्‍मा गांधी की आलोचना के बावजूद उन्‍हें स्‍वतंत्र भारत का पहला कानून मंत्री बनाया गया। इतना ही नहीं 29 अगस्‍त 1947 को अंबेडकर को भारत के संविधान मसौदा समिति का अध्‍यक्ष न‍ियुक्‍त क‍िया गया भारत के संविधान को बनाने में बाबा साहेब का खास योगदान है। बाबा साहेब कहते थे की मैं उसी धर्म को मानता हूं, जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाए। जब तक आप सामाजिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं, कानून जो भी आपको स्वतंत्रता देता है वह आपके लिए बेमानी ही है।

चिंतक/आईएएस मेंटर/दिल्ली विश्वविद्यालय
लेखक सामाजिक आंदोलनों से जुड़े रहे हैं व वंचित तबकों के लिए आवाज उठाते रहे हैं।

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