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स्मृति शेष : ‘यही सच है‘ के फिल्मांकन पर संदेह था मन्नू दी को

नयी दिल्ली। प्रख्यात लेखिका मन्नू भंडारी को अपनी कहानी ‘यही सच है‘ का फिल्मांकन संदेहास्पद लग रहा था और ‘रजनीगंधा‘ इस कदर सफल औैर लोकप्रिय होगी, इसकी उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी। मन्नू दी, जैसा कि उनके पाठक-प्रशंसक संबोधित करते थे, ने 2009 में राधाकृष्ण प्रकाशन से आई पुस्तक ‘रजनीगंधा : पटकथा‘ (मन्नू भंडारी, बासु चटर्जी) में अपनी कहानी ‘यही सच है‘ पर फिल्म ‘रजनीगंधा‘ के बननेे की प्रक्रिया पर एक संक्षिप्त नोट लिखा है, जिसमें उन्होंने यह जानकारी दी है। ‘महाभोज‘, ‘आपका बंटी‘ जैसी रचनाओं की लेखिका मन्नू भंडारी का कल 90 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।

पुस्तक में “यही सच है‘ से ‘रजनीगंधा‘ तक की अंतरंग यात्रा‘ शीर्षक से लिखे नोट में उन्होंने बताया है कि जब बासुदा (फिल्म निर्देशक बासु चटर्जी) ने उनके सामने इस कहानी पर फिल्म बनाने का प्रस्ताव रखा तो वह चकित थीं। दरअसल, कहानी छपते ही बहुत प्रशंसा मिली थी और अनेक पत्रिकाओं में चर्चा के अलावा कई संकलनों में संकलित हो गई थी, पर इसके बावजूद उसका फिल्मांकन उन्हें संदेहास्पद लग रहा था, जिसका कारण कहानी की थीम थी। मन्नू दी के अनुसार कहानी एक लड़की के मानसिक द्वंद्व पर आधारित थी और इसीलिए लिखते समय भी उन्होंने इसे डायरी-फॉर्म के रूप में ही लिखा था।

उनके अनुसार अपने मन की बेहद निजी बातों को हम डायरी में ही तो लिखते हैं और फिर द्वंद्व भी जिस बात को लेकर था एक लड़की तो उसे केवल डायरी में ही लिख सकती थी। मन्नू दी ने लिखा है कि उनकी समस्या यह थी कि एक मध्यमवर्गीय लड़की का दो प्रेमियों के बीच बंटा यह मानसिक द्वंद्व जो उसका इतना निजी और गोपनीय था और उसके मन में ही चलता रहता था क्योंकि सबके बीच उसे व्यक्त करना तो उसके लिए संभव ही नहीं था, बासुदा फिल्म में कैसे व्यक्त करेंगे?
उन्होंने लिखा है कि हालांकि उनकी समस्या सुनकर बासुदा हंसे और फिर निद्वंद्व होकर कहा कि यह सारी समस्या वह उन पर छोड़ दें… बस, उन्हें उनकी अनुमति भर चाहिए।

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मन्नू दी ने कहा कि कुछ दिनों बाद उन्हें सूचित किया गया कि फिल्म का नाम ‘रजनीगंधा‘ रखा गया है। बासुदा ने इसी पुस्तक में लिखी एक संक्षिप्त टिप्पणी में बताया है कि जब उन्होंने ‘यही सच है‘ की पटकथा पर काम शुरू कर दिया था उस वक्त इस शीर्षक का पंजीकरण कोई और निर्माता करा चुका था, सो इसका उपयोग वह नहीं कर सकते थे। कुछ दोस्तों ने ‘रजनीगंधा‘ नाम सुझाया।

मन्नू दी ने लिखा है कि फिल्म के कुछ हिस्से दिल्ली में शूट हुए थे तो वह लोग बड़े उत्साह से देखने जाते। फिल्म पूरी होने पर वह बहुत खुश हुईं और फिल्म को पर्दे पर देखने को लेकर उत्सुक थीं लेकिन थोड़े दिनों बाद उन्हें सूचना मिली कि फिल्म को लेने वाला कोई डिस्ट्रीब्यूटर ही नहीं मिल रहा। मन्नू दी के अनुसार करीब साल भर बाद बासुदा ने उन्हें बताया कि फिल्म को ताराचंद बड़जात्या ने खरीद लिया है जो बहुत बड़े डिस्ट्रीब्यूटर थे।

अमोल पालेकर, विद्या सिन्हा और दिनेश ठाकुर की प्रमुख भूमिकाओं वाली फिल्म 1974 में आई थी और हिट रही थी। फिल्म में केवल दो गीत – ‘रजनीगंधा फूल तुम्हारे…‘ और ‘कई बार यूं भी देखा है…‘ थे और इतने लोकप्रिय हुए कि आज तक गुनगुनाए जाते हैं।
फिल्म ने सिल्वर जुबली मनाई और कई अवार्ड जीते। फिल्मफेयर के दो अवार्ड – क्रिटिक्स अवार्ड (जो किसी कलात्मक फिल्म को मिलता है) और पापुलर अवार्ड (जो किसी अच्छी कमर्शियल फिल्म को मिलता है), फिल्म को मिले। फिल्म के नाम ‘रजनीगंधा‘ पर बाजारों में साड़ी, पानमसाला जैसी कई चीजें चल पड़ीं।

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मन्नू दी ने लिखा है कि पहली फिल्म की ऐसी सफलता और लोकप्रियता ने उन्हें बेहद प्रसन्न किया। जब उन्होंने ‘यही सच है‘ कहानी लिखी थी तो उन्होंने कभी इस बात की कल्पना तक नहीं की थी। उनके अनुसार कहानी पर प्रशंसा तो मिली थी पर वह प्रशंसा और लोकप्रियता केवल साहित्यिक जगत तक ही सीमित थी और आम जनता के बीच इसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय केवल और केवल ‘रजनीगंधा‘ काे ही जाता है।

प्रख्यात लेखिका मन्नू भंडारी का कल 90 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। मन्नू भंडारी देश की आजादी के बाद चले नई कहानी दौर का हिस्सा रहीं। उनकी चर्चित कहानियों में ‘एक प्लेट सैलाब‘, ‘मैं हार गई‘, ‘तीन निगाहों की एक तस्वीर‘, ‘त्रिशंकु‘ आदि थीं। मन्नू भंडारी ने ‘महाभोज‘, ‘आपका बंटी‘, ‘स्वामी‘ और राजेंद्र यादव के साथ मिलकर ‘एक इंच मुस्कान‘ जैसे उपन्यास लिखे। उनकी बाल पुस्तकों में ‘आसमाता‘ (उपन्यास), ‘आंखों देखा झूठ‘ और ‘कलवा‘ शामिल हैं। उन्होंने आत्मकथा ‘एक कहानी यह भी‘ लिखी।

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