कोलकाता हिन्दी न्यूज | 12 जुलाई 2026: पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा की नैनो परियोजना से जुड़ा विवाद अब फिर से चर्चा में है। करीब दो दशक पहले शुरू हुआ यह मुद्दा राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद फिर से गरमा गया है।
सरकार की तैयारी
उद्योग मंत्री तापस रॉय ने कहा है कि टाटा समूह के साथ शुरुआती बातचीत चल रही है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी व्यक्तिगत रूप से मामले पर निगरानी रख रहे हैं।
यदि टाटा वापसी करती है, तो सरकार किसी अन्य कंपनी को वहां लाने की योजना नहीं बना रही है।
किसानों के लिए अधूरा सपना
हालांकि, इसके पीछे की कहानी किसानों के लिए बहुत चिंता का विषय है। जिन किसानों ने 2006 में नैनो परियोजना के लिए अपनी भूमि दी थी, उनके सपने अभी भी अधूरे हैं।
टाटा के सिंगूर छोड़ने के बाद उन हजारों परिवारों को आर्थिक और मानसिक संकट का सामना करना पड़ा है। सरकार आज भी करीब 3,600 परिवारों को हर महीने 2,000 रुपये और 16 किलो चावल देती है।
किसानों का दृष्टिकोण
75 साल की अंगूर दास ने बताया कि उनके पति ने छह बीघा भूमि परियोजना के लिए दी थी। वह कहती हैं कि यदि टाटा वापस आती है, तो वह भी अपनी बची हुई भूमि देने को तैयार हैं।
अनिद्य दास, जो सिंगूर आंदोलन के दौरान सिर्फ 12 साल के थे, अब रोजगार के लिए कोलकाता जाते हैं। वे अपना दुख साझा करते हैं कि अगर फैक्ट्री लग गई होती, तो उन्हें इतना संघर्ष नहीं करना पड़ता।
भूमि के मूल्य में बड़ा बदलाव
डॉ. उदयन दास, जो भूमि अधिग्रहण के समर्थन में बनी सिंगूर शिल्प विकास समिति के अध्यक्ष हैं, ने बताया कि 2006 के बाद से भूमि की कीमत लगभग 15 गुना बढ़ गई है।
जहां पहले सड़क किनारे की भूमि की कीमत करीब तीन लाख रुपये प्रति बीघा थी, अब वह एक करोड़ रुपये प्रति बीघा के आस-पास पहुंच गई है। ऐसे में, यदि टाटा वापस आता है, तो उसे मुआवजे के लिए लगभग 1,300 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं।
बेकार पड़ी 997 एकड़ भूमि
आज सिंगूर की 997 एकड़ भूमि, जहां कभी नैनो परियोजना की शुरुआत हुई थी, अब झाड़ियों से ढकी हुई है। पहले यह क्षेत्र पश्चिम बंगाल की अत्यधिक उपजाऊ कृषि भूमि में से एक हुआ करता था। लेकिन परियोजना के रुकने के बाद किसानों को रोजगार के लिए अन्य क्षेत्रों में जाना पड़ा।
विरोध की आवाज
हालांकि, सिंगूर में सभी लोग टाटा की संभावित वापसी के लिए एकमत नहीं हैं। सिंगूर कृषि रक्षा समिति के प्रमुख प्रबीर पात्रा का कहना है कि उनका संघर्ष केवल तीन फसली उपजाऊ जमीन को बचाने के लिए था। अगर फिर से ऐसी स्थिति बनती है, तो वह दोबारा आंदोलन करने को तैयार हैं।
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