Hanuman ji

श्री हनुमान जन्मोत्सव विशेष : रामदूत अतुलित बलधामा

श्रीराम पुकार शर्मा, कोलकाता। शक्ति, भक्ति और समर्पण के प्रतीक चिरंजीवी श्री हनुमान जी, भगवान श्रीराम के अत्यंत ही प्रिय और परम भक्त हैं। इन्हें भगवान शिव का अवतार बताया जाता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार हनुमान जी का जन्म त्रेतायुग के अन्तिम चरण में चैत्र पूर्णिमा को, मंगलवार के दिन, चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के योग में, सूर्योदय काल में वर्तमान भारत देश के महाराष्ट्र राज्य के नाशिक जिले में अंजनेरी पर्वत पर हुआ माना जाता है, जिसे पहले ऋषिमुख पर्वत कहा जाता था। अब उसे आंजनेय पर्वत भी कहा जाता है। (अन्य कई स्थानों की भी मान्यता है) इस वर्ष श्री हनुमान जी की पावन जन्मोत्सव 2 अप्रेल, वृहस्पतिवार को मनाई जा रही है।

रावण को ब्रह्मा जी द्वारा कई दिव्य शक्ति प्राप्त हो गई थी, जिससे उसका मरना, असंभव-सा हो गया था। ऐसे में रावण ने अपनी मोक्ष हेतु देवाधिदेव शिवजी से निवेदन किया। तब शिवजी ने श्रीराम जी (श्रीहरि) के हाथों, उसे मोक्ष प्रदान करने के लिए अद्भुत लीला रची। इस कार्य में श्रीराम जी को साथ देने के लिए, उन्होंने स्वयं श्री हनुमान के रूप में अवतार ग्रहण किया और रावण के वरदान के अनुकूल, उसे मृत्यु के साथ ही साथ मोक्ष भी दिलवाया।

श्री हनुमान जी, किष्किन्धा के अंतर्गत सुमेरु पर्वत के वानरराज ‘कुंजर सुदान’ (हाथी को मारने वाला) केसरी और उनकी अर्धांगिनी शिव जी की परम भक्त अंजना देवी के छः पुत्रों में सबसे बड़े थे। इस धरा पर आठ चिरंजीवी हैं, उनमें से रुद्रावतार श्री हनुमान जी भी एक हैं। श्री हनुमान जी का अवतार ही भगवान श्रीराम की सहायता के लिए हुआ था।

केसरी-नंदन श्री हनुमान जी के गुरु, इनकी माता अंजना देवी, स्वयं भगवान् शंकर, भगवान् सूर्य और महर्षि मातंग जी थे। हिंदू महाकाव्य रामायण और प्रचलित पवित्र आध्यात्मिक ग्रंथों के अनुसार, श्री हनुमान जी को वानर मुख वाले अत्यंत ही बलिष्ठ पुरुष के रूप में वर्णित किया गया है। वे मात्र एक लंगोट पहने, अनावृत शरीर वाले, कंधे पर सदैव पवित्रता, अनुशासन, ब्रह्मचर्य और आध्यात्मिक जिम्मेदारी का प्रतीक जनेऊ धारण किए रहते हैं।

उनके तेज मस्तक पर स्वर्ण मुकुट एवं शरीर पर स्वर्ण आभूषण विभूषित रहते हैं। पारिवारिक आनुवांशिकता के अनुकूल, उनकी एक लम्बी पूँछ भी है। उनका मुख्य अस्त्र गदा है। उनके मुख पर सदा अतुलनीय तेज विराजमान रहता है। इन सब के अतिरिक्त उनके जिह्वा पर सदैव श्रीराम-नाम का रट लगा रहता है।

केसरी नंदन जी, अपने बालपन में अन्य बालकों की तरह ही स्वाभाविक रूप से बहुत नटखट थे। वे अपने इस नटखट स्वभाव से साधु-संतों को बहुत सताया करते थे। वे अक्सर उनकी पूजा-सामग्रियाँ और अन्य कई वस्तुओं को उनसे छीन-झपट लेते थे।

उनके इस नटखट स्वभाव से रुष्ट होकर साधुओं ने उन्हें अपनी शक्तियों को भूल जाने का शाप दे दिया था। इस शाप से हनुमान अपनी सारी शक्तियों को भूल गए थे, जिन्हें पुनः किसी अन्य द्वारा स्मरण कराने पर ही, उन्हें अपनी असीमित शक्तियों का स्मरण हो सकता था।

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सीता माता की खोज में वानरों का एक दल दक्षिण तट पर तो पहुँच गया। परंतु इतने विशाल सागर को लाँघने का साहस किसी में भी न था। स्वयं श्री हनुमान जी भी बहुत चिन्तित थे कि कैसे इस समस्या का कोई समाधान निकाला जाए। तब ऋक्षराज जामवंत जी ने उनकी खोई हुई शक्तियों को स्मरण कराया, तब उनकी सारी शक्तियाँ, उन्हें समरण हो गईं और उन्हें पुनः प्राप्त हो गईं। फिर श्री हनुमान जी ने अपना रूप विस्तार किया और पवन-वेग से आकाश में उड़ते हुए सागर को पार कर गए।

‘कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥’

बचपन में ही केसरी-नंदन उदित सूर्य को कोई मीठा फल समझकर, उसे खाने के लिए सूर्य की ओर आकाश में उड़ चले थे, जिससे भयभीत होकर सूर्यदेव अस्त होने लगे थे। फलतः प्राणियों में उत्पन्न भय निवारण हेतु इन्द्र ने अपने वज्र से हनुमानजी की ठुड्डी (हनु) पर प्रहार किया था, जिससे श्री हनुमान जी की ठुड्डी टूट गई थी। इसलिए उनको ‘हनुमान’ के नाम से संबोधित किया जाता है।

इसके अतिरिक्त श्री हनुमान जी कई अन्य नामों से प्रसिद्ध है, जैसे बजरंग बली, मारुति, अंजनी सुत, पवनपुत्र, संकटमोचन, केसरी नन्दन, महावीर, कपीश, शङ्कर सुवन आदि। उनके ये सभी नाम उनके जननी-जनक, स्वरूप, कार्य-स्वरूप रुद्रावतार के अनुरूप ही है।

‘वाल्मीकि रामायण’ के ‘सुंदरकाण्ड’ के श्लोक संख्या 42.34 में लंका में सीता जी से मिलने के बाद, श्री हनुमान जी अपना परिचय देते हुए कहते हैं –
‘दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः।
हनुमान् शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः॥’
अर्थात, – ‘मैं अयोध्या नरेश श्री राम का दास हूँ, जिन्होंने क्लेशरहित कई बड़े-बड़े कार्य सिद्ध किए हैं। मैं शत्रुओं की सेना का नाश करने वाला, वायुपुत्र हनुमान हूँ।’

इसी तरह से श्रीराम भक्त प्रवर गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने “रामचरितमानस” के ‘सुंदरकाण्ड’ में लंका की अशोक वाटिका में सीता माता जी को अपना परिचय देकर हुए, उनके मन में उत्पन्न सन्देह को दूर करते हुए कहते हैं कि हे माता जानकी! मैं श्री रामजी का दूत हूँ। करुणानिधान श्रीराम जी की सच्ची शपथ के साथ कहता हूँ कि यह अँगूठी, मैं ही यहाँ लाया हूँ, जिसे मेरे प्रभु श्रीरामजी ने मुझे, आपके लिए सहिदानी या पहचान के रूप में दी है।

फिर उन्होंने सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का, अपना विराट स्वरूप को प्रगट किया, जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करने वाला, अत्यंत ही बलवान् और वीर स्वरूप था।
‘राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥
कनक भूधराकार सरीरा । समर भयंकर अतिबल बीरा॥’

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श्री हनुमान जी पंचमुखी अवतार भी है, जो लंका-युद्ध् की एक घटना से संबंधित है। काले जादू और तांत्रिक गुणों के ज्ञाता अहिरावण, श्रीराम और लक्ष्मण का सोते समय हरण कर, उन्हें पाताल-लोक में बलि देने के लिए ले गया। अपने प्रभु और उनके अनुज की खोज में श्री हनुमान जी भी पाताल लोक में पहुँच गये। पाताल-लोक के मुख्यद्वार पर मकरध्वज पहरा दे रहा था, जो मूलतः उनका प्रस्वेद-पुत्र ही था। परंतु प्रभु काज हेतु उन्होंने उसे अपने आधीन कर पातालपुरी के द्वार पर बाँध दिया।

श्री हनुमान जी को पता चल गया था कि अहिरावण का वध करने के लिए, वहाँ पर मौजूद पाँच दीपकों को उन्हें एक साथ ही बुझाना पड़ेगा। अतः उन्होंने पँचमुखी अवतार स्वरूप (श्री वराह, श्री नरसिम्हा, श्री गरुड़, श्री हयग्रिव और स्वयं का) धारण कर, एक साथ ही पाँचों दीपकों को बुझाकर अहिरावण का अंत कर दिया।

उनके ‘पंच-मुख’ यथा; श्री हनुमान जी; साहस और शक्ति, नरसिंह; निडरता, गरुड़; जादुई कौशल और नाग के काटने, वराह; स्वास्थ्य और भूत भगाने और हयग्रीवा; शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति के प्रतीक स्वरूप हैं।
‘पैठी पताल तोरि जमकारे । अहिरावण की भुजा उखाड़े।।
बाएं भुजा असुर दल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे।।’

इसी प्रकार, वनवास काल की समाप्ति के उपरांत, अयोध्या में श्रीराम जी का राज्याभिषेक हुआ। तब प्रभु श्रीराम जी ने लंका-युद्ध में अपने सभी सहयोगियों को विभिन्न उपहार देकर सम्मानित किया। श्री हनुमान जी को भी उपहार लेने के लिए बुलाया गया।

श्री हनुमान जी को आता देखकर, भाव-अभिप्लुत श्रीराम ने अपने आसान से खड़े होकर, उन्हें अपने गले से लगा लिया और कहा कि हनुमान ने अपनी निश्छल सेवा और पराक्रम से, जो योगदान दिया है, उसके बदले में ऐसा कोई उपहार नहीं है, जो उनको दिया जा सके।

मगर वात्सल्य अनुरागी माता सीता ने उन्हें अपने मोतियों का एक हार प्रदान किया। उपहार लेने के उपरांत, श्री हनुमान जी ने उस मोतियों की माला के एक-एक मोती को तोड़कर देखने लगे। उनकी ऐसी क्रिया-कलाप को देखकर, उपस्थित लोगों ने उनसे इसका कारण पूछा, तो श्री हनुमान जी ने कहा कि वह देख रहे हैं, कि इन मोतियों के अन्दर उनके प्रभु श्रीराम और माता सीता हैं, या नहीं।

यदि वे इनमें नहीं हैं, तो इस उपहार का उनके लिए कोई मूल्य नहीं है। कुछ लोगों ने जब कहा कि इसका मतलब है कि हनुमान के मन में प्रभु श्रीराम और माता सीता के लिए उतना प्रेम नहीं है, जितना वे प्रदर्शित करते हैं। इतना सुनते ही विह्वल श्रीराम-जानकी भक्त प्रवर श्री हनुमान जी ने उसी सभा में अपनी छाती को चीरकर, उसमें अवस्थित प्रभु श्रीराम और माता जानकी की पावन छवि को सबको दिखा दिया।

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‘राम लखन वैदेही तुम पर सदा रहे हरषाए,
हृदय चीर के राम सिया का दर्शन दिया कराए।’

एक लोककथा के अनुसार, मुगल बादशाह अकबर ने श्रीराम भक्त प्रवर गोस्वामी तुलसीदास को चमत्कार दिखाने के लिए आदेश दिया, पर उन्होंने साफ मना कर दिया। तब उसने रोष में आकार गोस्वामी तुलसीदास जी को फतेहपुर सीकरी के शाही कारागार में डाल दिया था।

गोस्वामी जी ने उसी कारागार में 40 दिनों में शांतचित अवधी भाषा में हनुमान जी की स्तुति के रूप में 40 चौपाइयाँ लिखी थीं। इसके उपरांत ही चमत्कारिक स्वरूप में, फतेहपुर सीकरी में, उस कारागार में, शाही महल में अचानक विराट बंदर-दल का हमला हुआ। अकबर की प्रबल सेना भी, बन्दरों के आतंक को रोकने में असफल रही।

तब अपने किसी मंत्री की परामर्श को स्वीकार करते हुए, उसने गोस्वामी तुलसीदास जी को कारागार से ससम्मान मुक्त कर दिया। कारागार से गोस्वामी जी की मुक्ति होते ही, सभी बन्दर फतेहपुर से अचानक गायब हो गए थे। इस अद्भुत घटना ने श्रीराम भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी की महिमा दूर-दूर तक फैला दी। इस घटना ने उनकी भक्ति और ‘हनुमान चालीसा’ को जन-जन में अमर कर दिया।

अजर-अमर श्री हनुमान जी का प्रतिदिन ध्यान करने और उनके मंत्रों को जाप करने से मनुष्य के सभी भय-क्लेश-विपत्ति दूर होते हैं, पूर्णरूपेण सिद्ध है। विश्व भर के सहृदय सनतनी हिंदुओं की मान्यता है कि ‘हनुमान चालीसा’ का जाप, गंभीर समस्याओं से मुक्ति दिलाता है।
‘श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार।
बरनौ रघुवर बिमल जसु , जो दायक फल चारि।

श्री हनुमान जी के पारंपरिक नामों के अतिरिक्त बारह अन्य नाम भी, उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के आधार पर प्राप्त हैं, जिनका भिन्न अर्थ और भिन्न महत्व, इस प्रकार से है – हनुमान; – जिनकी ठोड़ी टूटी हो, रामेष्ट; – श्री राम भगवान के भक्त, उधिकर्मण; – भक्तों को उद्धार करने वाले, अंजनीसुत; – अंजनी के पुत्र, फाल्गुनसखा; – फल्गुन अर्थात् अर्जुन के सखा।

सीता शोक विनाशक; – देवी सीता के शोक का विनाश करने वाले, वायुपुत्र; – हवा के पुत्र, पिंगाक्ष; – भूरी आँखों वाले, लक्ष्मण प्राणदाता; – लक्ष्मण के प्राण बचाने वाले, महाबली; – बहुत शक्तिशाली, अमित विक्रम; – अत्यन्त वीरपुरुष और दशग्रीव दर्पनाशक; – दश ग्रीवा वाले रावण के दर्प को दूर करने वाले।
‘ॐ ऐं भ्रीम हनुमते, श्री राम दूताय नमः’

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