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लघुकथा : रियल सांता

विवेक रंजन श्रीवास्तव, कोलकाता। रात के ठंड भरे अंधेरे में कॉल बेल की आवाज आई। दरवाजा खोला तो सामने एक दुबला सा लड़का खड़ा था। पीठ पर थैला, चेहरे पर पसीना और आंखों में एक जल्दी साफ नजर आ रही थी। उसने पैकेट आगे बढ़ाया और बोला सर आपका ऑर्डर। पैकेट लेकर मैंने दरवाजा बंद कर लिया।

भीतर मेज पर रख पैकेट खोला, पिज्जा की भाप मेरे चेहरे से टकराई। टीवी पर चल रही किसी क्रिसमस फिल्म में सांता बच्चों के लिए उपहार रख रहा था। बच्चे सो रहे थे। चिमनी के नीचे सांता के लिए दूध और चाकलेट कटोरी में सजे थे।

मैंने सोचा अभी अभी जो लड़का गया वह ही तो असली सांता है। उसके थैले में हर किसी के लिए खुशी है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसके आने का इंतजार कोई कविता में नहीं लिखता और उसके लिए कोई कटोरी सजाकर दूध और टोस्ट नहीं रखता।

मैं बाहर लपका, उसकी बाइक सड़क के मोड़ पर ओझल हो चुकी थी। मेरे हाथ में गरम पिज्जा था और मन में एक ठंडी सी टीस। क्या कभी हमने इन सच्चे सांता के लिए कोई रिटर्न गिफ्ट रखा है। क्या कभी उनके लिए भी दूध और चाकलेट सजाए हैं या हम उन्हें सिर्फ डिलीवरी नोटिफिकेशन समझकर स्वाइप कर देते हैं।

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विवेक रंजन श्रीवास्तव, लेखक

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