वाराणसी । इस वर्ष 2022 में 30 मई को शनि जयंती है। नौग्रहों में शनि को सबसे क्रूर ग्रह की संज्ञा दी गई है। लेकिन शनि वास्तव में क्रूर ग्रह नहीं है। शनि मात्र व्यक्ति को उसके अच्छे-बुरे कर्मो के अनुसार फल प्रदान करते हैं। ग्रहों में शनि को न्यायाधिपति का पद प्राप्त है इसलिए इन्हें देव का दर्जा दिया हुए है। शनिदेव ने भगवान शिव की आराधना करके उन्हें प्रसन्न किया था। शिव ने शनि को दंडनायक ग्रह घोषित करके नौ ग्रहों में स्थान प्रदान किया था। यही कारण है कि शनि मनुष्य, देव, पशु-पक्षी, राजा-रंक सभी को उनके कर्मो के अनुसार फल प्रदान करते हैं।

मनुष्य ने यदि पूर्व जन्म में अच्छे कर्म किए हैं तो इस जन्म में शनि अपनी जातक की कुंडली में उच्च राशि या स्वराशि में स्थापित होते हैं। ऐसे शनि उस मनुष्य को भरपूर लाभ प्रदान करते हैं।

शनि के बारे में कुछ विशिष्ट बातें :
शनि का जन्म ज्येष्ठ अमावस्या के दिन हुआ। इनके पिता सूर्य और माता छाया हैं। अमावस्या के दिन जन्म होने के कारण इनका स्वरूप काला है।
शनि पांच भाई-बहन हैं। शनि के छोटे भाई यमराज हैं। तपती, भद्रा और यमुना सगी बहनें हैं।
शनि को मंद, शनैश्चर, सूर्यसूनु, सूर्यज, अर्कपुत्र, नील, भास्करी, असित, छायात्मज आदि नामों से भी पुकारते हैं।
शनि के अधीन मकर और कुंभ राशि है।
शनि पुष्य, अनुराधा और उत्तराभाद्रपद नक्षत्र का स्वामी है।

शनि अस्त होने के 38 दिन बाद पुन: उदय होता है।
शनि की उच्च राशि तुला और नीच राशि मेष है।
जन्मकुंडली के 12 भावों में शनि 8वें, 10वें और 12वें भाव का कारक है।
शनि जब तुला, मकर या कुंभ राशि में होता है और उस अवधि में किसी का जन्म हो तो वह रंक से राजा अपने अच्छे कर्मों से बन सकता है।
शनि जब मिथुन, कर्क, कन्या, धनु या मीन राशि में होता है और उस अवधि में किसी का जन्म हो तो परिणाम मध्यम रहता है।

शनि जब मेष, वृषभ, सिंह या वृश्चिक में हो और किसी का जन्म हो तो विपरीत परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।
हस्तरेखा शास्त्र में शनि का स्थान मध्यमा अंगुली के नीचे होता है।
अंक ज्योतिष में 8, 17 और 26 तारीख पर शनि का आधिपत्य है।
शनि 30 वर्ष में समस्त बारह राशियों में भ्रमण का चक्र पूरा कर लेता है।
एक बार किसी जातक को साढ़ेसाती आने के बाद 30 वर्ष बाद ही साढ़ेसाती का दूसरा चक्र आता है।
अपवाद को छोड़ दिया जाए तो मनुष्य के जीवन में तीन बार साढ़े साती का चक्र आता है।
शनि जब किसी जातक को उसके कर्मो के अनुसार दंड देने वाले होते हैं तो उससे पहले वे उसकी बुद्धि का नाश कर देते हैं।

आइए अब जानते हैं शनि मंत्रों को
– “ॐ शं शनैश्चराय नमः”

-ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:

-ॐ कृष्णांगाय विद्महे रविपुत्राय धीमहि तन्न: सौरि: प्रचोदयात।

-ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शन्योरभिस्त्रवन्तु न:।

-ॐ काकध्वजाय विद्महे खड्गहस्ताय धीमहि। तन्नो मन्दः प्रचोदयात।।

-ॐ शनैश्चराय विदमहे छायापुत्राय धीमहि। तन्नो मंद: प्रचोदयात।।

-कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम:।
सौरि: शनैश्चरो मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:।।

-ॐ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।

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पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री

ज्योतिर्विद् वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 9993874848

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