तारकेश कुमार ओझा, खड़गपुर। परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद की नई संभावनाओं को तलाशने के उद्देश्य से विद्यासागर विश्वविद्यालय के दर्शन एवं जीवन-जगत विभाग ने मंगलवार को बी. एन. शाशमल हॉल में एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया।
“परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु : समकालीन चिंतन में जे.एन. महांति के दार्शनिक योगदान की खोज” विषय पर केंद्रित इस आयोजन में देश-विदेश के शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने भारतीय दर्शन के वैश्विक आयामों पर गहन विमर्श किया।
उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के कार्यवाहक डीन प्रो. अरिंदम गुप्त, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के कुलपति एवं आईसीपीआर अध्यक्ष प्रो. निर्माल्य नारायण चक्रवर्ती, जादवपुर विश्वविद्यालय की प्रो. मधुछंदा सेन, उत्कल विश्वविद्यालय के दर्शन विभागाध्यक्ष डॉ. सरोज कांत कर, विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. जयंत किशोर नंदी तथा विभागाध्यक्ष प्रो. झाड़ेश्वर घोष प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
वक्ताओं ने अपने संबोधन में कहा कि प्रख्यात दार्शनिक जे.एन. महांति का चिंतन भारतीय दार्शनिक परंपरा और आधुनिक बौद्धिक विमर्श के बीच एक सशक्त सेतु का कार्य करता है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में उनके विचार आज भी समान रूप से प्रासंगिक हैं और भारतीय दर्शन को नई दृष्टि प्रदान करते हैं।
सेमिनार में विभिन्न विश्वविद्यालयों के शिक्षकों, दार्शनिकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही।
विचार-विमर्श के दौरान भारतीय दर्शन की समकालीन उपयोगिता, वैश्विक स्वीकार्यता तथा महांति के दार्शनिक अवदान के विविध आयामों पर विस्तार से चर्चा की गई। आयोजन ने अकादमिक जगत में सार्थक संवाद और नए शोध-विमर्श की दिशा को भी मजबूती प्रदान की।
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