श्रीराम पुकार शर्मा, हावड़ा। पंचांग के अनुसार सावन को आने में अभी कई दिन बाकी है, पर इस वर्ष आषाढ़ ने शायद पंचांग पढ़ने से ही साफ इनकार कर दिया है। उसने निश्चय कर लिया है कि जब तक जी चाहेगा, वही सावन बना रहेगा। बादलों ने भी उसकी हाँ में हाँ मिला दी है। अपनी श्रावणी फुहारें आषाढ़ में ही उड़ेल दी गईं। लगता है, प्रकृति भी अब ‘कार्यकाल विस्तार’ की समर्थक हो गई है।
यह तो आज के लिए स्वभाविक क्रिया है। सत्ता और पत्ता का साथ अधिकांश देते हैं। परंतु आगे वाला न जगह छोड़ना चाहे, तो क्या पीछे वाला बैठ जाए या थम जाए? नहीं, उसे भी तो अपनी मंजिल पर पहुँचने की जल्दी है। उसके भी तो बाल-बच्चे हैं। वे भी श्रावणी फुहार का आनंद लेना चाहते हैं। लेकिन पीछे वाला भी अकेले नहीं है, उसके पीछे भी तो कोई है, जो उसे आगे बढ़ने के लिए ढकिया रहा है। आखिर कब तक वह भी सब्र बाँधे रहे।
पहले की बातें कुछ और थीं। बच्चों को जवान होते देखकर बड़े-बुजुर्ग, उनके लिए धीरे-धीरे घर के मुखिया का अपना आसन छोड़ने लगते थे। नौजवान भी उस रिक्त स्थान को पूरा करने के लिए अपना कंधा आगे कर देते थे। आज कहाँ? आज तो जब तक उन्हें जबरन धक्के देकर आसन से बेदखल न किया जाए, हटने का नाम ही नहीं लेते हैं।
सबके सब द्विवेदी बाबा के शिरीष के फल ही बने रहते हैं। शरीर अस्पताल में ‘वेनटिलेशन’ पर रहेगा, परंतु मुखिया वह ही बने रहेंगे। आखिर पिछला भी कब तक राजकुमार ही बना रहें, उसे भी तो राज सुख भोगना है कि नहीं। इन बातों को आगे वालों को भी समझना चाहिए। इससे सामाजिकता बनी रहती है।
आपसी कलह घट मिटती है। घर में शांति बनी रहती है। इतिहास गवाही देता है कि अनेक राजकुमारों ने राजगद्दी पाने के लिए शत्रुओं से कम, अपने पिता से ही अधिक संघर्ष किया है। लोग इतिहास से सबक लेते ही नहीं हैं। बार-बार एक ही तरह की गलती करते है ! यह ठीक नहीं है।
आप तो देख ही रहे हैं न, इस आषाढ़ के मिजाज को। इसने अब तक अपना पैर इतना पसार दिया है कि चारों ओर लबालब कर दिया है। ठीक है, तुम्हें समय ने साठ दिया, तुमने अपना सामर्थ्य दिखाया, अपना तंत्र चलाया। लेकिन अब कै दिन बाकी ही रह गया, धीरे-धीरे अपना बोरिया-बिस्तर समेटने लगो।
सावन को भी तो लगना चाहिए कि आषाढ़ जाने की अपनी तैयारी कर रहा है। वह भी आने की तैयारी करेगा। पर नहीं, प्रतीत होता है कि अंगद महाराज का पैर ही जमा दिया हो। सावन दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, और अपने हाथ में वर्षा-पात्र लिए विनम्रता से कह रहा है, – भईया, दरवाजा तो खोलिए, अब आप बाहर निकलिए। अब तो मेरी बारी है।
पर आषाढ़ भीतर से कुंडी चढ़ाकर मस्त टी.वी. के सामने बैठा रोमांटिक फिल्म देख रहा है। उसके सामने ढेरों चिप्स, पिज्जा के पैकेट और पेय-पदार्थ से भरे बोतल पड़े हैं। सावन को वहन से टरकाने के लिए भीतर से ही बैठे-बैठे ही कहता है, – “अभी तो मैं ही मन भर बरसा नहीं हूँ, भाई! तुम यहाँ से जाओ। अगले सप्ताह आना।” 
अब बेचारा सावन करे, तो क्या करे? उसके लिए तो कुछ करने रहा ही नहीं। फिर उसके पीछे ही आ रहा भादों भी भला अपने नाम की सार्थकता को जैसे सिद्ध करेगा? भादों तो दूर खड़ा ही सोच रहा है, – “यदि बड़े भईया ही सब कर देंगे, तो मेरे हिस्से में क्या बचेगा? केवल पंचांग?” – किसी को भी किसी की कोई चिंता ही नहीं है। सब अपने स्वार्थ में ही लगे हुए हैं।
स्टेज पर या मैदान में सबको अपनी कला का प्रदर्शन का मौका मिलना चाहिए। सबने कुछ न कुछ तैयारी अवश्य ही किया है। एक ही सब मजा लूट ले जाएगा, तो बाकी क्या खाली अपने सूरत दिखाने आएंगे? हरेक को अपनी परिसीमा का ध्यान रखना चाहिए। कम से कम सामाजिकता के लिए ही सही।
लेकिन नहीं, आज हर कोई स्टेज पर या मैदान में जमा ही रहना चाहता है। कोई माइक छोड़ना ही नहीं चाहता है। कई बार तो लाइन ही काट दिया जाता है, फिर भी वे न समझते हैं और माइक पकड़े ही रहते हैं। अगला बेचारा अपनी बारी के इंताजर में, भाषण के पांडुलिपि को उलटते-पुलटते, उसे ही मलिन कर देता है।
स्थिति यह होती है कि आए थे सोहर गाने, लेकिन स्टेज पर पहुँचते-पहुँचते ‘धन्यवाद’ कहकर माइक-बत्ती की डोरी खोलना पड़ता है। फिर दरी-त्रिपाल को समेटने और कुर्सियाँ इकट्ठा कर उन्हें गिनने का भी सामाजिक कार्य करना पड़ता है।
इसीलिए कहता हूँ कि आगे वाले को, उसे अपने पीछे वाले का भी ख्याल रखना चाहिए। अपने तो मलाई-मिष्टान मारते रहते हैं, पीछे वाले के लिए झूठन ‘दोंगे’ ही छोड़ देते हैं। अपना स्वस्थ का भी तो कुछ ख्याल कीजिए, कहीं ‘शुगर’ न बढ़ जाए, फिर मलाई-मिष्टान को देखकर भी आपका ‘शुगर लेवल’ और बढ़ जाएगा। स्वस्थ रहिए, सुखी रहिए और पीछे वालों को भी आगे आने दीजिए।
आषाढ़ चल रहा है, तो सावन भी आएगा, फिर भादों भी आएगा । उनके लिए भी मार्ग प्रशस्त कर दीजिए और उनके करने लिए भी कुछ कार्य बाकी रहने दीजिए। आप भी तो अजर-अमर बनकर धरती पर नहीं आए हैं। आपके पीछे भी अनेक लोग है। हरेक के पास कुछ न कुछ योग्यता है। उन्हें भी अपनी योग्यता प्रदर्शित करने दीजिए।
प्रकृति का सौंदर्य इसी में है कि आषाढ़ समय पर विदा ले, सावन समय पर आए और भादों को भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का मौका मिले। यदि एक ही महीना या ऋतु सब कुछ अपने हिस्से में समेट लेना चाहेगा, तो फिर वार्षिक कैलेंडर का क्या मतलब रह जाएगा? यह बात नहीं है कि यह केवल कोई खास महीने या फिर कोई खास ऋतु पर ही लागू होता है, बल्कि यही बात मनुष्यों पर भी लागू होती है।
श्रीराम पुकार शर्मा,
अध्यापक व स्वतंत्र लेखक,
24, बन बिहारी बोस रोड,
हावड़ा – 711101
ई-मेल सम्पर्क – rampukar17@gmail.com
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