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व्यंग्य : “सांता, सेल और दुनियां”

विवेक रंजन श्रीवास्तव। लाल टोपी वाला सांता इस बार देर से आया शायद उसे पेट्रोल महंगा पड़ रहा हो, या फिर रूस-यूक्रेन की बर्फ में उसका रेनडियर फँस गया। चिमनी से उतरने की जहमत भी अब कौन उठाए, जब दरवाज़े पर “नो ट्रेसपासिंग” या “आप कैमरे की निगरानी में हैं” की चेतावनी लगी हो और सुरक्षा कैमरे रिकॉर्डिंग कर रहे हों।

बच्चों को अब चाकलेट और कुकीज से ज़्यादा डेटा पैक चाहिए ताकि वे ऑनलाइन गिफ्ट ट्रैक कर सकें और बड़ों की हालत ये है कि उन्होंने क्रिसमस ट्री को भी ईएमआई पर लिया हुआ है। क्रिसमस ट्री पर लगी लाइटें ऐसे टिमटिमाती हैं, जैसे अर्थव्यवस्था या शेयर मार्केट और सोने की कीमत के ग्राफ।

सांता की स्लेज पर अब कॉर्पोरेट विज्ञापनों के लोगो लगे हैं। वह अब जादू की थैली नहीं खोलता। कार्ड स्वाइप करता है या डायरेक्ट एकाउंट में मनी ट्रांसफर करता है जिससे वोट सुनिश्चित किए जा सकें। गरीब इलाकों में जिस दिन सांता आता है, उसी दिन बिजली चली जाती है। कुछ बच्चों को लगता है कि अंधेरा ही उनका “गिफ्ट रैपर” है।

दुनिया भर के नेता हर साल सांता की तरह भाषण देते हैं, मीठी आवाज, लाल कपड़े, खाली थैला। कोई वादा करता है “शांति लाने” का, कोई “सुधार” का, पर हिरन उन्हीं मैदानों में घास ढूंढ रहे होते हैं जहाँ पहले से ही कुछ नहीं बचा।

सांता अब “ग्लोबल वार्मिंग” से परेशान है। बर्फ पिघल रही है और उसके रहने की जगह कम होती जा रही है। शायद इसलिए उसने उत्तरी ध्रुव छोड़कर स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिया। अब वह शेयर की गिरावट में उतरता है और भरोसे की चिमनी में फँस जाता है।

पर असली सवाल यह नहीं कि सांता आएगा या नहीं। असली सवाल यह है कि हम अब भी किसी “सांता” की प्रतीक्षा क्यों कर रहे हैं? क्या हमें सच में जादुई टोपी वाला कोई चाहिए जो हमारी बर्फबारी रोके और महंगाई घटाए? या हमें चाहिए वो आत्म विश्वास जो हमें मेहनत का यथार्थ याद दिलाए?

क्योंकि सांता का काम तो बस प्रेरणा देना था, सुविधाएं नहीं देना। उसने गिफ्ट का रास्ता दिखाया था, पर उससे हम मेहनत से पाना भूल गए, हमें हर मुसीबत में सांता या कोई संत की ओर देखने की आदत पड़ गई है, जबकि वास्तव में ये हम ही हैं जो खुद रैप कर के गिफ्ट क्रिसमस ट्री के नीचे रख लेते हैं। इस तरह बच्चों को बहलाया जा सकता है पर पल भर की झूठी खुशी सच्चाई नहीं बदल सकती।

अब अगर सांता लौट भी आए, तो शायद मुस्कुराएगा और कहेगा “मैं तो बस प्रतीक हूं, खुशी, दुनियां में शांति, गरीबी दूर करना, मंहगाई से निपटना सब हमें खुद करना है।”

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विवेक रंजन श्रीवास्तव, लेखक

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