तारकेश कुमार ओझा, खड़गपुर : नई पीढ़ी को यह किसी लोककथा जैसा लगेगा, लेकिन यह सौ टका सच है कि अस्सी के दशक तक भारतीय चुनाव व्यवस्था का एक बेहद महत्वपूर्ण किरदार हुआ करता था — “साइकिल दूत”। जिसका सरकारी नाम ” साइक्लिस्ट मैसेंजर ” हुआ करता था I
क्योंकि आज की तरह तब न मोबाइल थे, न व्हाट्सऐप ग्रुप, न वायरलेस सेटों की भरमार। लोकतंत्र तब अपने दो पहियों पर चलता था — और उन पहियों पर बैठा होता था एक दुबला-पतला नौजवान, जिसकी साइकिल की घंटी में प्रशासन की धड़कन बसी होती थी।
साइकिल दूत की नियुक्ति और जिम्मेदारी
चुनाव घोषणा होते ही स्थानीय प्रशासन इन युवाओं की अस्थायी नियुक्ति कर लेता था। किसी मतदान केंद्र (पोलिंग बूथ) के पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) के अधीन इनकी तैनाती होती थी।
उनका मुख्य काम था:
- मतदान कर्मी बूथ पर पहुँचे या नहीं
- मतदान प्रक्रिया शुरू हुई या नहीं
- लंच ब्रेक का समय
- मतदान समाप्ति की सूचना
- कोई अनियमितता, झड़प या बैलेट बॉक्स से जुड़ी समस्या
ये सारी जानकारियाँ गुलाबी रंग के विशेष कार्ड पर लिखकर साइकिल से कंट्रोल रूम तक पहुँचानी पड़ती थीं।
गुलाबी कार्ड उस समय किसी सरकारी “प्रेमपत्र” से कम महत्वपूर्ण नहीं माना जाता था।
साइकिल दूत उसे ऐसे सँभालकर ले जाते थे, जैसे कोई गुप्तचर देश की परमाणु फाइल लेकर जा रहा हो।
ईवीएम से पहले का दौर
अगर कहीं ईवीएम खराब हो जाए — अरे, तब ईवीएम कहाँ थी! अगर बैलेट बॉक्स में गड़बड़ी हो जाए, झड़प हो जाए, बूथ पर तनाव हो जाए — तो वही साइकिल दूत हाँफते हुए प्रशासन तक खबर पहुँचाता था।
उसकी साइकिल की रफ्तार देखकर लगता था मानो पूरा लोकतंत्र उसी की चेन पर टिका हुआ है।
मेहनताना और रोमांच
मजेदार बात यह थी कि इस जोखिम भरे और जिम्मेदारी वाले काम के बदले उन्हें पचास रुपये से भी कम मेहनताना मिलता था — वह भी चुनाव खत्म होने के कई दिन बाद, नकद भुगतान के रूप में।
लेकिन तब के नौजवानों के लिए यह रकम किसी सरकारी नौकरी के ट्रेलर जैसी लगती थी। ऊपर से एक अलग रोमांच — “हम भी चुनाव ड्यूटी में हैं!”
उन दिनों गाँव-मोहल्ले में साइकिल दूतों की चाल ही बदल जाती थी। वे खुद को आधा सरकारी कर्मचारी और आधा जासूस समझने लगते थे।
सरकारी खाना: पहला VIP लंच
जेब में गुलाबी कार्ड, चेहरे पर जिम्मेदारी, और पैडल में राष्ट्रसेवा का जोश! और हाँ, लोकतंत्र सिर्फ काम ही नहीं करवाता था, खाना भी खिलाता था।
सरकार की ओर से पीठासीन अधिकारी को निर्देश होता था कि साइकिल दूतों को दोपहर का भोजन कराया जाए।
सो, चुनाव वाले दिन दूत महोदय भी अधिकारियों के साथ बैठकर दाल-भात या पूड़ी-सब्जी उड़ाते थे।
कई युवाओं के लिए शायद वही सरकारी “वीआईपी लंच” जीवन का पहला प्रशासनिक सम्मान होता था।
आज के डिजिटल युग से तुलना
आज स्मार्टफोन, रीयल-टाइम ऐप्स, ईवीएम, VVPAT और ऑनलाइन डैशबोर्ड ने चुनाव प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया है। सूचनाएँ सेकंडों में पहुँच जाती हैं।
लेकिन 80 के दशक का वो दौर याद दिलाता है कि लोकतंत्र की नींव मेहनत, समर्पण और साधन सीमाओं पर भी मजबूत खड़ी की जा सकती है।
वो साइकिल, वो घंटी, वो गुलाबी कार्ड और उन नौजवानों का पसीना — ये सब मिलकर भारतीय लोकतंत्र की एक अनमोल मिसाल थे।
निष्कर्ष
आज जब हम तुरंत परिणाम देखते हैं, तब उन “साइक्लिस्ट मेसेंजर” को सलाम करना बनता है, जिन्होंने बिना किसी आधुनिक सुविधा के लोकतंत्र को सही समय पर सूचित रखा।
यह कहानी सिर्फ नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि उन बुनियादी मूल्यों की याद भी है जिन पर हमारा चुनावी तंत्र टिका हुआ है — ईमानदारी, जिम्मेदारी और सेवा भाव।
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