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77वीं जयंती पर किंवदंती पत्रकार को सादर स्मरण, हिंदी पत्रकारिता के महानायक सुरेंद्र प्रताप सिंह – केशव भट्टड़

केशव भट्टड़, कोलकाता। 4 दिसंबर 2025 को, हिंदी पत्रकारिता के उस महानायक का स्मरण करते हैं, जिन्होंने कलम को लोकतंत्र का सबसे मजबूत हथियार बनाया। सुरेंद्र प्रताप सिंह (एस.पी. सिंह) की 77वीं जयंती के अवसर पर, उनकी जीवन यात्रा, प्रमुख कार्यों और सत्ता को चुनौती देने वाली रिपोर्टिंग का स्मरण न केवल पत्रकारिता के इतिहास को समृद्ध करता है, बल्कि वर्तमान मीडिया को निष्पक्षता का पाठ भी पढ़ाता है।

एस.पी. सिंह ने प्रिंट से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक अपनी यात्रा में हिंदी पत्रकारिता को खोजी भावना से नवजीवन प्रदान किया। उनकी रिपोर्टिंग और तेवर ने न केवल सामाजिक न्याय की मांग को बल दिया, अपितु सत्ता के गलियारों में उथल-पुथल भी मचा दी।

सुरेंद्र प्रताप सिंह का जन्म 4 दिसंबर 1948 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के पातेपुर गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। उनके पिता जगन्नाथ सिंह व्यवसायी थे, जबकि माता मालती सिंह गृहिणी। बचपन में ही परिवार के साथ पश्चिम बंगाल चले गए, जहां उन्होंने गारुलिया मिल हाई स्कूल से 1962 में मैट्रिक उत्तीर्ण किया।

कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी में प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर तथा सुरेंद्रनाथ कॉलेज से विधि स्नातक की उपाधि प्राप्त की। शिक्षा के दौरान वे एआईएसएफ (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन) से जुड़े और छात्र पत्रिका के संपादक बने, जो उनकी पत्रकारिता की प्रारंभिक झलक थी।

एस.पी. सिंह ने हिंदी व्याख्याता के रूप में कार्य प्रारंभ किया, किंतु उनका मन पत्रकारिता में था। 1970 के दशक में टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की भर्ती में उन्होंने लिखित परीक्षा उत्तीर्ण की। साक्षात्कार में धर्मवीर भारती के प्रश्न पर उन्होंने बेबाकी से कहा, “यहां गुलामी करने थोड़ी न आया हूं।”

इस साहस से प्रभावित भारती ने उन्हें धर्मयुग में प्रशिक्षु के रूप में स्थान दिया। यह वह मोड़ था जब हिंदी पत्रकारिता ने एक निडर योद्धा को अपनाया। मात्र 49 वर्ष की आयु में, 27 जून 1997 को दिल्ली में ब्रेन हेमरेज से उनका निधन हो गया, किंतु उनकी विरासत अमर है।

सुरेंद्र प्रताप सिंह (एस.पी. सिंह), हिंदी पत्रकारिता के एक ऐसे स्तंभ थे, जिनकी लेखनी ने न केवल सामाजिक विसंगतियों को उजागर किया, अपितु राजनीतिक सत्ता को भी चुनौती दी। पत्रकारिता के प्रारंभिक चरण में धर्मयुग और दिनमान जैसी पत्रिकाओं से जुड़कर उन्होंने खोजी पत्रकारिता की नींव रखी, जबकि ‘रविवार’ पत्रिका के संपादक के रूप में उन्होंने हिंदी मीडिया को एक नया आयाम प्रदान किया।

उनके लेख सामाजिक न्याय, भाषाई असमानता, सांप्रदायिकता, अंधविश्वास और हाशिए पर पड़े वर्गों की व्यथा पर केंद्रित थे। ये लेख न केवल पाठकों को प्रभावित करते थे, बल्कि नीतिगत परिवर्तनों और राजनीतिक इस्तीफों का कारण भी बने।

एस.पी. सिंह की पत्रकारिता बहुमुखी थी- प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और यहां तक कि सिनेमा तक। 1970 के दशक में धर्मयुग और दिनमान से प्रारंभ हुआ उनका सफर भाषाई असमानता पर ‘खाते हैं हिंदी का, गाते हैं अंग्रेजी का’ जैसे लेखों से चर्चित हुआ। ‘खाते हैं हिंदी का, गाते हैं अंग्रेजी का’ एस.पी. सिंह का सबसे चर्चित प्रारंभिक लेख है, जो उन्होंने माधुरी पत्रिका में लिखा।

लेख में उन्होंने हिंदी भाषी समाज की उस विसंगति पर करारा प्रहार किया है, जहां लोग हिंदी माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर ‘खाते’ हैं, किंतु सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में अंग्रेजी को ‘गाते’ हैं। यह भाषाई असमानता, वर्गीय भेदभाव और सांस्कृतिक उपनिवेशवाद पर एक तीखा व्यंग्य है। लेख में उदाहरणों के माध्यम से दर्शाया गया है कि कैसे हिंदी को माध्यमिक भाषा का दर्जा देकर अंग्रेजी को श्रेष्ठता प्रदान की जाती है, जो भारतीय बुद्धिजीवियों की मानसिक गुलामी को प्रतिबिंबित करता है।

इस लेख ने व्यापक बहस छेड़ दी। यह लेख हिंदी पत्रकारिता में भाषा-केंद्रित विमर्श की शुरुआत का प्रतीक बना और युवा पत्रकारों के लिए प्रेरणा स्रोत। आज के डिजिटल युग में यह लेख और भी प्रासंगिक लगता है। 1977 में आनंद बाजार पत्रिका समूह की साप्ताहिक ‘रविवार’ के संस्थापक-संपादक बने, जहां उन्होंने खोजी पत्रकारिता को नई ऊंचाई दी।

‘रविवार’ ने 1970-80 के दशक में हिंदी मीडिया को क्रांतिकारी रूप दिया; युवा पत्रकारों को राज्य-स्तरीय जांच सौंपी, जिससे संजय पुगलिया जैसे नाम उभरे। उनकी रिपोर्ट्स ने मंत्रियों के इस्तीफे और नीतिगत परिवर्तन कराए।

1985 में राजेंद्र माथुर के निमंत्रण पर मुंबई के नवभारत टाइम्स के रेजिडेंट एडिटर बने तथा 1988 में कार्यकारी संपादक। यहां ‘विचार’ कॉलम के माध्यम से सामाजिक मुद्दों पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। इसके अतिरिक्त, इंडिया टुडे, देव फीचर्स और द टेलीग्राफ से जुड़े। 1995 में लिविंग मीडिया ग्रुप ने उन्हें दूरदर्शन पर ‘आज तक’ का कार्यकारी संपादक नियुक्त किया।

आम बोलचाल की भाषा अपनाकर उन्होंने हिंदी टीवी को लोकतांत्रिक बनाया; प्रसिद्ध पंक्ति “ये थी खबरें आज तक, इंतजार करिए कल तक” उनकी देन थी। उनकी रचनात्मकता सिनेमा तक फैली – 1984 में गौतम घोष की फिल्म ‘पार’ के संवाद लिखे, जो राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता बनी। मृणाल सेन की ‘जेनेसिस’ (1986) में भी उनका योगदान रहा।

एस.पी. सिंह के लेखों की प्रमुख विशेषता उनकी निष्पक्षता, साहस और जनोन्मुखी दृष्टिकोण थी। वे कभी पक्षपातपूर्ण न होकर तथ्यों पर आधारित रहते थे, जो हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी मीडिया से श्रेष्ठ बनाने का प्रयास था।

‘रविवार’ के दौरान (1977-85) उनकी रचनाएं सबसे गंभीर मानी जाती हैं, इन्होंने हिंदी को ‘समाचार-केंद्रित’ भाषा के रूप में स्थापित किया। उनके अधिकांश लेखों की चर्चा समकालीन साक्ष्यों में विद्यमान है।

एस.पी. सिंह की रिपोर्टिंग ने सत्ता को आईना दिखाया; कई मामलों में उनके खुलासों ने राजनीतिक भूकंप ला दिया। ‘रविवार’ की रिपोर्ट्स ने सरकारों को हिलाया, मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों के इस्तीफे कराए तथा नीतियां बदलीं। एस.पी. सिंह की पत्रकारिता का मूल सामाजिक सरोकार था। वे सांप्रदायिकता, अंधविश्वास और सत्ता के दुरुपयोग पर प्रहार करते थे।

भोपाल गैस त्रासदी पर जांच-पड़ताल (रविवार, दिसंबर 1984) उनकी यादगार रिपोर्टिंग है। 2-3 दिसंबर 1984 की रात्रि को यूनियन कार्बाइड कारखाने से मिथाइल आइसोसायनेट गैस रिसाव ने भोपाल को मौत का शहर बना दिया, जिसमें तत्काल 3,800 से अधिक मौतें हुईं।

एस.पी. सिंह ने ‘रविवार’ के विशेष संवाददाता के रूप में व्यापक कवरेज किया – पीड़ितों के साक्षात्कार, सरकारी लापरवाही, कॉर्पोरेट जिम्मेदारी और चिकित्सकीय आंकड़ों का विश्लेषण। उनकी रिपोर्ट्स ने हादसे को ‘मानवीय विफलता’ सिद्ध किया, जिससे राष्ट्रीय विमर्श तेज हुआ।

इस रिपोर्ट के प्रभाव से सरकारी जांच समितियां बनीं, सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता से यूनियन कार्बाइड ने 470 मिलियन डॉलर का समझौता किया। यह रिपोर्ट खोजी पत्रकारिता का उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां तथ्यों ने सत्ता की निष्क्रियता उजागर की। यह रिपोर्ट कॉर्पोरेट जवाबदेही की प्रासंगिकता दर्शाती है।

‘रविवार’ के संपादक के रूप में एस.पी. सिंह ने हरिजनों, ग्रामीणों और अल्पसंख्यकों की समस्याओं पर एक श्रृंखला लिखी। प्रमुख थीम्स में सांप्रदायिक दंगे (जैसे 1980 के दशक के मोरादाबाद, उत्तर प्रदेश दंगे), अंधविश्वास (गणेश मूर्ति के ‘दूध पीने’ अफवाह, 1995, पर थी, जहां उन्होंने ‘सरफेस टेंशन’ जैसे वैज्ञानिक तथ्यों से अंधविश्वास को खंडित किया) और जातिगत भेदभाव विरोध शामिल थे।

एक उल्लेखनीय लेख में उन्होंने सूर्यग्रहण पर ज्योतिषीय अंधविश्वास को चुनौती देते हुए वैज्ञानिक गौहर रजा के विचारों को स्थान दिया। वैज्ञानिक गौहर रजा को स्थान देकर उन्होंने तर्कवाद को बढ़ावा दिया, जो अंधविश्वास के विरुद्ध लोकतांत्रिक शिक्षा का प्रतीक था। ये सभी लेख तथ्य-आधारित जांच पर आधारित थे, जिसमें स्थानीय साक्ष्यों और सांख्यिकीय आंकड़ों का उपयोग किया गया।

एस.पी. सिंह की ‘विचार’ कॉलम (नवभारत टाइम्स) और ‘रविवार’ की स्टोरीज में राजनीतिक घोटालों पर फोकस था। उदाहरणस्वरूप, सीमेंट घोटाले जैसी घटनाओं पर प्रारंभिक रिपोर्टिंग, जहां उन्होंने क्षेत्रीय अखबारों के साक्ष्यों को समर्थन दिया। ये लेख सत्ता के दुरुपयोग, चुनावी अनियमितताओं और नीतिगत विफलताओं पर केंद्रित थे, जिसमें आंकड़ों और साक्ष्यों का कठोर विश्लेषण था।

इनके कारण राज्य सरकारें हिलीं, और कई नीतियां बदलीं। ‘रविवार’ को खोजी पत्रकारिता का प्रतीक बना दिया। आज के भ्रष्टाचार-केंद्रित विमर्श में, ये लेख पारदर्शिता के महत्व को रेखांकित करते हैं। इन लेखों ने कई मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के इस्तीफे कराए, क्योंकि वे सत्ता के दुरुपयोग और प्रशासनिक विफलता को उजागर करते थे।

उनकी रिपोर्ट्स पक्षपात-रहित रहकर तथ्यों पर जोर देती थीं, जो वर्तमान फेक न्यूज युग में प्रासंगिक है। इन रिपोर्ट्स ने साबित किया कि पत्रकारिता सत्ता पर अंकुश रखने का हथियार है, जिससे सत्ता संतुलित रहती है। वर्तमान में, जब सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, ये लेख सामाजिक सद्भाव की आवश्यकता पर जोर देते हैं।

‘रविवार’ की साख ऐसी बनी कि पाठक इसे सर्वोच्च विश्वसनीय स्रोत मानने लगे। युवा पत्रकारों को राज्य-स्तरीय जांच सौंपकर उन्होंने नई पीढ़ी तैयार की। आम आदमी की बोलचाल अपनाकर उन्होंने मीडिया को एलीटिस्ट से लोकतांत्रिक बनाया, जो सूचना के लोकतंत्रीकरण का उदाहरण है।

एस.पी. सिंह का मानना था कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जो निष्पक्षता, साहस और जनसरोकार से सत्ता की निगरानी करता है। अज्ञेय जैसे साहित्यकारों से हुई बहस में उन्होंने कहा, “पत्रकारिता साहित्य नहीं, तथ्यपरक विधा है।” उनकी पद्धति लोकतांत्रिक, युवा सशक्तिकरण, तथ्य-आधारित जांच और हाशिए के वर्गों की आवाज पर केंद्रित थी।

जब बहुजन समाज पार्टी प्रमुख कांशीराम ने पत्रकार आशुतोष को थप्पड़ मारा, एस.पी. सिंह ने ‘आज तक’ पर टिप्पणी की – “जितने लोगों को आप आतंकित कर सकें, उतने ही बड़े नेता हैं।” यह लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किए गए हमले पर उनका प्रतिवाद था, जो सत्ता के दमनकारी चरित्र को उजागर करता है।

सुरेंद्र प्रताप सिंह हिंदी पत्रकारिता के प्रणेता थे, जिनकी 77वीं जयंती हमें स्मरण करा रही है कि निष्पक्ष मीडिया ही लोकतंत्र की रक्षा करता है। उनके कार्य और विचारों ने साबित किया कि पत्रकारिता सत्ता का आईना है, न कि उसका उपकरण।

राष्ट्रीय स्तर का सम्मान – हल्दी घाटी पुरस्कार (1992) में महाराणा मेवाड़ चैरिटेबल फाउंडेशन द्वारा प्रदान किया गया, जो पत्रकारिता के माध्यम से समाज जागरण के स्थायी मूल्यवान कार्य के लिए दिया जाता है। इस पुरस्कार के अंतर्गत उन्हें सम्मानसूचक शॉल, तोरन पट्टिका, प्रमाण-पत्र तथा नकद राशि प्राप्त हुई। यह पुरस्कार उनके खोजी पत्रकारिता और सामाजिक मुद्दों पर तीखी टिप्पणियों को मान्यता प्रदान करता है।

एस.पी. सिंह की विरासत अपार है। एस.पी. सिंह के कार्यों ने हिंदी मीडिया को नई दिशा प्रदान की, जिसके लिए उन्हें औपचारिक पुरस्कारों से अधिक, समकालीन पत्रकारों एवं समाज द्वारा अमिट सम्मान प्राप्त हुआ। उनके जैसे पत्रकार दुर्लभ होते हैं, जिन्होंने सत्य की खोज को प्राथमिकता दी।

लखनऊ के आईआरडीएस द्वारा उनके नाम पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पुरस्कार स्थापित होना और पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज द्वारा उनकी जयंती का प्रतिवर्ष पालन करना उनकी अमरता का उद्घोष है। वे “पत्रकारिता का शीर्ष पुरुष” कहलाने के योग्य हैं, जिन्होंने रिपोर्टर और रिपोर्ट को गरिमा दी। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता में युवाओं को अवसर देकर एक पूरी नई पीढ़ी गढ़ी।

सुरेंद्र प्रताप सिंह हिंदी पत्रकारिता के महानायक थे – एक ऐसे योद्धा जिन्होंने कलम से समाज को जगाया। उनकी बेबाकी, निष्पक्षता और जनसरोकार आज भी प्रासंगिक हैं। यदि हिंदी मीडिया उनकी विरासत को अंगीकार करे, तो ही यह चौथा स्तंभ मजबूत बनेगा। उनकी यादें अमर रहें।

(स्पष्टीकरण : इस आलेख में दिए गए विचार लेखक के हैं और इसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है।)

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