प्रयागराज/उज्जैन । राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना के तत्वावधान में “प्रयागराज एवं उज्जैन का धार्मिक, पौराणिक, आध्यात्मिक, शिक्षा, साहित्य के महत्व“ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी में अध्यक्षीय उद्बोधन दे रहे डॉ. शहाबुद्दीन नियाज मोहम्मद शेख ने कहा कि विश्व में हम सर्वश्रेष्ठ संस्कृति में जी रहे हैं और देश के पास धार्मिक आध्यात्मिक परंपरा भी है। कुंभ मेला ऐतिहासिकता है परंपराएं हैं। भारत देश ने आध्यात्मिक परंपरा को संभाल कर रखा है और हर क्षेत्र में अपना धार्मिक आध्यात्मिक क्षेत्र है और सबका अपना महत्व है। मुख्य अतिथि बृजकिशोर शर्मा ने कहा कि प्रयागराज और उज्जैन में ऊर्जा का प्रवाह होता है। अस्तित्व की विशेषता को सरल ढंग से रखा गया है। प्रयागराज में कुंभ का मेला होता है साथ ही स्कंद पुराण में बताया गया है कि संसार में यह वैज्ञानिक स्थित है। उज्जैन प्राचीन नगरी है। जहां पर पाषाण प्राप्त होता है।

विशिष्ट अतिथि डॉ. गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी, सचिव विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान, प्रयागराज ने कहा कि प्रयाग के प्रभाव का वर्णन इतना विस्तृत है जो कि शास्त्रों में लिखा गया है। प्रयागराज त्रिवेणी संगम के नाम से जाना जाता है जिसमें गंगा, जमुना, सरस्वती तीनों का संगम है। 14 जनवरी से लेकर मार्च तक मेला लगता है। संगम की महिमा का ज्ञान तीर्थ नगरी के नाम से जाना जाता है। वक्ता डॉ. रश्मि चौबे ने कहा कि उज्जैन में शिप्रा नदी है जो मंदिर के किनारे है, जहां प्रत्येक 12 साल में कुंभ मेला लगता है। जहां कालभैरव को मंदिरा भी चढ़ाई जाती है। साथ ही प्रयागराज की संस्कृति एवं पौराणिक मे दोनों का महत्व बताया। वक्ता उपमा आर्य ने कहा कि प्रयागराज और उज्जैन दोनों ही जगहों पर ऋषि लोग झोपड़ी बनाकर रहते हैं। इसे आर्यव्रत भी कहते हैं। कालिदास की रघुवंश में यह लिखा है इलाहाबाद के तट में वट वृक्ष है। साहित्य में देखें तो हरिवंश राय बच्चन, सांस्कृतिक और संगीत के दृष्टिकोण से देखें तो सुधा मुगदल हैं।

वक्ता डॉ. उपासना पांडे ने कहा कि महाकाल को जिस रूप में पूजना चाहे पूज सकते हैं। पहाड़ और कंदरो में ऋषि पूरी प्राणी जगत के अपना विश्लेषण करते हैं। सृष्टि की रचना, धर्म, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, का प्रतीक संपूर्ण रूप से देखा जाता है। वक्ता डॉ. नीलिमा मिश्रा, प्रयागराज ने कहा कि सृष्टि की रचना प्रयागराज ही है। जिसे इलाहाबाद के नाम से भी जाना जाता है। कुंभ के दो प्रकार उन्होंने बताया परंपरागत और ज्योतिसीय पक्ष। त्रिवेणी संगम को पंचकोशी बताया।
डॉ. प्रभु चौधरी, महासचिव, राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना, उज्जैन ने कहा कि कालों के काल महाकाल का जो नाम ले उस पर कोई भी विपत्ति नहीं आती। एक वीर पराक्रमी विक्रमादित्य का जन्म हुआ। महाकवि कालिदास का नाटक उपन्यास अद्वितीय है। यह कालिदास विक्रमादित्य की नगरी है।

गोष्ठी का आरंभ डॉ. रश्मि चौबे की सरस्वती वंदना से हुआ। डॉ. सुरेखा मंत्री ने स्वागत उद्बोधन दिया। गोष्ठी की प्रस्तावना प्रोफेसर अनुसुइया अग्रवाल, महासमुंद, छत्तीसगढ़ ने दिया। गोष्ठी का सफल एवं सुंदर संचालन डॉ. मुक्ता कान्हा कौशिक, मुख्य प्रवक्ता राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना ने किया। तथा सभी अतिथियों,वक्ताओं का धन्यवाद ज्ञापन गरिमा गर्ग, पंचकूला ने किया।

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