तारकेश कुमार ओझा, खड़गपुर। कहानी सिर्फ शब्दों का क्रम नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, संवेदना और संघर्ष की जीवंत धारा। इसी विचार को केंद्र में रखकर विद्यासागर विश्वविद्यालय के अंग्रेजी साहित्य, भाषा एवं संस्कृति विभाग (DELLCS) तथा विभागीय पूर्व छात्र संघ के संयुक्त प्रयास से बी.एन. शाश्मल हॉल में ‘द्वितीय तपन ज्योति बंद्योपाध्याय स्मारक व्याख्यान’ गरिमामय वातावरण में आयोजित किया गया।
कार्यक्रम का आरंभ विभागाध्यक्ष प्रोफेसर जयजीत घोष के आत्मीय स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने कुलपति प्रोफेसर दीपक कुमार कर द्वारा भेजे गए शुभकामना संदेश का वाचन भी किया, जिसने आयोजन को औपचारिक गरिमा प्रदान की।
इस अवसर पर कला एवं वाणिज्य संकाय के डीन प्रोफेसर (डॉ.) अरिंदम गुप्ता, अंग्रेजी विभाग के पूर्व प्रोफेसर (डॉ.) शंकर प्रसाद सिंह, विद्यासागर विद्यापीठ बालिका उच्च विद्यालय की प्रधानाध्यापिका तथा स्वर्गीय प्रोफेसर तपन ज्योति बंद्योपाध्याय की पुत्री स्वाती बंद्योपाध्याय सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

इस वर्ष के व्याख्यान का विषय था – “कहानियाँ डींग नहीं हैं : सामुदायिकता, आशा और न्याय की खोज में कहानी कहना, स्थायित्व और जीवन-निर्वाह।”
मुख्य वक्ता के रूप में Loughborough University (यूनाइटेड किंगडम) के नाट्यकला विभाग के प्रोफेसर, स्टोरीटेलिंग अकादमी के सचिव तथा यूनेस्को चेयर प्रोफेसर डॉ. माइकल विल्सन ने अपने विचार रखे।
उन्होंने कहा कि कहानियाँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, वे समाज को दिशा देती हैं। वे टूटे हुए विश्वास को जोड़ती हैं, संघर्षरत समुदायों को आशा देती हैं और न्याय की राह को प्रकाशित करती हैं।
उनके अनुसार, स्थायी और संवेदनशील समाज के निर्माण में कहानी कहना एक सशक्त साधन है, जो लोगों को जोड़ता है और साझा भविष्य की कल्पना को संभव बनाता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर शंकर प्रसाद सिंह ने की। डॉ. फ्रेड डालमासो ने भी अपने विचारों से सत्र को समृद्ध किया। अंत में डॉ. देवदास राय ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।
विभाग के प्रोफेसर इंद्रनील आचार्य, प्रोफेसर जॉली दास, डॉ. हेमंत कुमार गोलापल्ली तथा डॉ. शुभेंदु शेखर नस्कर की सक्रिय भूमिका उल्लेखनीय रही।
पूर्व छात्रों, शोधार्थियों और वर्तमान छात्र-छात्राओं की उत्साही सहभागिता तथा मुख्य वक्ता के साथ हुए संवाद ने कार्यक्रम को विचारों के जीवंत मंच में परिवर्तित कर दिया।
यह आयोजन केवल एक स्मारक व्याख्यान नहीं, बल्कि कथा, समुदाय और करुणा के माध्यम से बेहतर समाज की संभावनाओं पर गंभीर चिंतन का अवसर सिद्ध हुआ।
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