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लघु समाचार पत्रों पर शासन की दुर्नीति, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की जड़ों को कमजोर करने वाली नीतियों पर पुनर्विचार जरूरी – डॉ. अखिल बंसल

डॉ. अखिल बंसल, जयपुर। भारत में समाचार पत्र केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि लोकतंत्र की चेतना के वाहक हैं। विशेषकर लघु एवं मध्यम समाचार पत्र देश के कस्बों, गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों की आवाज को शासन और समाज तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद इन पत्रों के संपादक और पत्रकार वर्षों से जनसमस्याओं, स्थानीय मुद्दों और सामाजिक सरोकारों को प्रमुखता देते आए हैं।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऐसी नीतियां और व्यवस्थागत निर्णय सामने आए हैं, जिनसे छोटे समाचार पत्रों का अस्तित्व गंभीर संकट में पड़ता दिखाई दे रहा है। यदि सरकार की नीतियों का उद्देश्य वास्तव में स्वतंत्र और जीवंत पत्रकारिता को बढ़ावा देना है, तो इन निर्णयों पर पुनर्विचार आवश्यक है।

विज्ञापन व्यवस्था में संकट –
लघु समाचार पत्रों की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर रही है। बड़े मीडिया संस्थानों की तुलना में इनके पास न तो पर्याप्त पूंजी होती है और न ही विज्ञापन का व्यापक नेटवर्क। सरकारी विज्ञापन इनके लिए आर्थिक संबल का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं।

पिछले लगभग तीन वर्षों से डीएवीपी/सरकारी विज्ञापन व्यवस्था से पर्याप्त विज्ञापन न मिलने के कारण अनेक छोटे प्रकाशनों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है। छोटे पत्रों के लिए विज्ञापन केवल आय का माध्यम नहीं, बल्कि मुद्रण, डाक, कागज, वितरण और कर्मचारियों के खर्च को पूरा करने का साधन है। विज्ञापन व्यवस्था में कटौती या असमानता सीधे इनके अस्तित्व पर असर डालती है।

डाक रियायत समाप्त होना भी बड़ा झटका –
अब मासिक और पाक्षिक समाचार पत्र-पत्रिकाओं के लिए डाक रियायत में कमी या समाप्ति की व्यवस्था छोटे प्रकाशनों के लिए नई चुनौती बन सकती है। यदि जहां पहले रियायती दर पर लगभग 25 पैसे का डाक टिकट पर्याप्त था, वहां अब करीब दो रुपये का टिकट लगाना पड़े, तो सीमित प्रसार वाले प्रकाशनों का डाक खर्च कई गुना बढ़ जाएगा।

एक छोटे समाचार पत्र के लिए यह अंतर मामूली नहीं है। सैकड़ों या हजारों प्रतियां डाक से भेजने पर हर महीने अतिरिक्त खर्च हजारों रुपये तक पहुंच सकता है। ऐसे में संपादक के सामने प्रश्न खड़ा होता है—पत्र निकाले या परिवार की रोजी-रोटी चलाए?

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रेल यात्रा की रियायत भी थी उपयोगी –
छोटे समाचार पत्रों से जुड़े पत्रकारों के लिए रेल यात्रा में मिलने वाली रियायत भी अत्यंत उपयोगी रही है। समाचार संकलन, सम्मेलन, सरकारी कार्यालयों से संपर्क और पत्रकारिता संबंधी गतिविधियों के लिए उन्हें लगातार यात्रा करनी पड़ती है।

ऐसी रियायतों का समाप्त होना सीधे पत्रकारिता की लागत बढ़ाता है। बड़े मीडिया संस्थानों के पास यात्रा और रिपोर्टिंग के लिए संसाधन हो सकते हैं, लेकिन स्वतंत्र और छोटे समाचार पत्रों के पत्रकार अक्सर अपने सीमित साधनों से ही यह कार्य करते हैं।

सवाल किसी सरकार का नहीं, नीति की दिशा का है –
यह विषय केवल मोदी सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं होना चाहिए। असली प्रश्न यह है कि क्या सरकारी नीतियां छोटे और स्वतंत्र समाचार पत्रों को जीवित रखने के अनुकूल हैं?

यदि सरकारी व्यवस्था में बड़े मीडिया संस्थानों के लिए अवसर और छोटे प्रकाशनों के लिए लगातार बढ़ती आर्थिक बाधाएं होंगी, तो धीरे-धीरे मीडिया का विविध स्वरूप समाप्त हो सकता है। लोकतंत्र के लिए यह स्वस्थ स्थिति नहीं होगी।

छोटे समाचार पत्रों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे स्थानीय समस्याओं को सामने लाते हैं – गांव की सड़क, किसान की परेशानी, स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली, विद्यालय और अस्पताल की स्थिति, सामाजिक गतिविधियां तथा आम नागरिक की आवाज। बड़े मीडिया संस्थानों की पहुंच जहां राष्ट्रीय और महानगरीय विषयों तक अधिक रहती है, वहीं छोटे पत्र स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करते हैं।

सरकार को राहत पैकेज नहीं, न्यायपूर्ण नीति चाहिए –
लघु समाचार पत्र सरकार से किसी विशेष कृपा की मांग नहीं कर रहे। उनकी अपेक्षा केवल इतनी है कि पत्रकारिता को उसके आकार के आधार पर कमजोर न किया जाए।

सरकार को चाहिए कि –
– छोटे समाचार पत्रों के लिए न्यायपूर्ण एवं पारदर्शी सरकारी विज्ञापन नीति बनाई जाए।
– सरकारी विज्ञापन वितरण में प्रसार, नियमितता, क्षेत्रीय पहुंच और पत्रकारिता के योगदान को उचित महत्व दिया जाए।
– मासिक एवं पाक्षिक पत्र-पत्रिकाओं के लिए डाक रियायत बहाल या पुनर्गठित की जाए।

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– पत्रकारों की आवश्यक यात्राओं के लिए पूर्व में उपलब्ध रेल रियायत जैसी सुविधाओं पर पुनर्विचार किया जाए।
– छोटे प्रकाशनों के कागज, मुद्रण और डाक खर्च में बढ़ोतरी को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक राहत दी जाए।
– डिजिटल युग के बावजूद प्रिंट मीडिया की सामाजिक भूमिका को समाप्त मानने की भूल न की जाए।

लोकतंत्र में छोटी आवाज भी महत्वपूर्ण है –
लघु समाचार पत्रों की संख्या कम होना केवल प्रकाशनों की संख्या कम होना नहीं है। इसका अर्थ है – स्थानीय आवाजों का कम होना, छोटे शहरों और गांवों की समस्याओं का कम दिखाई देना और लोकतांत्रिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कमजोर होना।

आज आवश्यकता किसी सरकार के विरोध या समर्थन से अधिक नीतियों के पुनर्मूल्यांकन की है। यदि हजारों छोटे समाचार पत्र बंद होते हैं तो उसके साथ केवल कागज पर छपने वाले अंक बंद नहीं होंगे, बल्कि अनेक पत्रकारों, संपादकों, संवाददाताओं और मुद्रण कर्मियों की आजीविका भी प्रभावित होगी।

सरकार को यह समझना होगा कि मजबूत लोकतंत्र के लिए केवल बड़े मीडिया संस्थानों का मजबूत होना पर्याप्त नहीं है। गांव-कस्बों से निकलने वाला छोटा समाचार पत्र भी लोकतंत्र की उतनी ही महत्वपूर्ण कड़ी है।

इसलिए समय की मांग है कि लघु समाचार पत्रों को बोझ नहीं, लोकतंत्र के जमीनी प्रहरी के रूप में देखा जाए और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए तत्काल ठोस, न्यायपूर्ण और व्यावहारिक नीति बनाई जाए।

लघु समाचार पत्र बचेंगे, तभी स्थानीय पत्रकारिता बचेगी; और स्थानीय पत्रकारिता बचेगी, तभी लोकतंत्र की जड़ें मजबूत रहेंगी।

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डॉ. अखिल बंसल, जयपुर, वरिष्ठ पत्रकार
अध्यक्ष : अथाई मीडिया इंटरनेशनल

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