कोलकाता न्यूज डेस्क | 09 मई 2026: आज गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की 165वीं जयंती पर हम उन महान व्यक्तित्व को याद करते हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं से न सिर्फ भारतीय साहित्य को विश्व पटल पर स्थापित किया, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन में भी क्रांतिकारी विचारों की ज्योति जलाई।
टैगोर साहित्य, संगीत, कला, शिक्षा और दर्शन के क्षेत्र में एक अनुपम प्रतिभा थे, जिन्हें “गुरुदेव” और “विश्वकवि” के नाम से जाना जाता है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में हुआ था। वे देवेंद्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के चौदहवें संतान थे।
ठाकुर परिवार उस समय बंगाल के सबसे धनी और प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवारों में से एक था। अंग्रेजों को “ठाकुर” उच्चारण करने में कठिनाई होती थी, इसलिए परिवार को “टैगोर” कहा जाने लगा।
बचपन से ही रवीन्द्रनाथ को औपचारिक स्कूली शिक्षा पसंद नहीं थी। पिता की इच्छा थी कि वे वकील बनें, लेकिन उनका मन पढ़ाई में नहीं लगता था। उन्होंने कई स्कूल बदले, अंत में घर पर निजी शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त की।
1878 में कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए, लेकिन बिना डिग्री प्राप्त किए ही वापस लौट आए। उनका सपना कवि और साहित्यकार बनने का था।
साहित्यिक सफर और नोबेल पुरस्कार
टैगोर मात्र 8 वर्ष की आयु से कविताएं लिखने लगे थे। 16 वर्ष की उम्र से उनकी रचनाएं ‘भानुसिंह’ छद्मनाम से प्रकाशित होने लगीं। उनकी सबसे चर्चित कृति ‘गीतांजलि’ को उन्होंने समुद्री यात्रा के दौरान अंग्रेजी में अनुवादित किया।
1912 में अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित हुआ और 1913 में उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। वे पहले गैर-यूरोपीय व्यक्ति थे जिन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ।
उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति की रहस्यवाद, प्रकृति प्रेम, मानवतावाद और भावनात्मक गहराई स्पष्ट दिखती है। 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद उन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई ‘नाइटहुड’ की उपाधि लौटा दी।
राष्ट्रगान और क्रांतिकारी चेतना
टैगोर का योगदान केवल साहित्य तक सीमित नहीं था। उन्होंने ‘जन गण मन’ लिखा, जो 1950 में भारत का राष्ट्रगान बना। बांग्लादेश का राष्ट्रगान ‘आमार सोनार बांग्ला’ भी उनकी ही रचना है।
‘जन गण मन’ को अंग्रेजों का चाटुकार कहकर आलोचना हुई थी, लेकिन टैगोर ने स्पष्ट किया कि “भारत भाग्य विधाता” ईश्वर के लिए लिखा गया है, किसी राजा या अंग्रेज शासक के लिए नहीं।
उनकी क्रांतिकारी कविताएं आज भी युवाओं को प्रेरित करती हैं:
“जहां मन है अथाह डर से परे…”
“हम होंगे कामयाब एक दिन…”
“चल अकेला, चल अकेला…”
वे भीड़ के साथ चलने की बजाय सत्य और न्याय के लिए अकेले चलने की प्रेरणा देते थे। उनकी रचनाएं स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लाखों भारतीयों में जोश भरती थीं।
शांतिनिकेतन और विश्व भारती
टैगोर केवल लेखक नहीं, बल्कि दूरदर्शी शिक्षाविद भी थे। उन्होंने 1901 में शांतिनिकेतन में गुरुकुल शैली का विद्यालय शुरू किया।
1921 में विश्व भारती की स्थापना की, जो आज केंद्रीय विश्वविद्यालय है। उनका मानना था कि शिक्षा प्रकृति की गोद में, खुली हवा में होनी चाहिए।
शांतिनिकेतन को 2023 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। महात्मा गांधी सहित कई नेताओं ने शांतिनिकेतन के विकास में सहयोग किया।
बहुमुखी प्रतिभा रवीन्द्रनाथ टैगोर:
- कवि, उपन्यासकार, नाटककार
- संगीतकार (रवीन्द्र संगीत की हजारों रचनाएं)
- चित्रकार (2,500 से अधिक चित्र)
- दर्शनशास्त्री और शिक्षाशास्त्री
उन्होंने पूरब और पश्चिम के बीच सांस्कृतिक सेतु का कार्य किया। उनकी रचनाएं आज भी विश्व स्तर पर पढ़ी और सराही जाती हैं।
अंतिम समय
रवीन्द्रनाथ टैगोर 7 अगस्त 1941 को 80 वर्ष की आयु में इस दुनिया से विदा हो गए। उन्होंने आजादी देखी नहीं, लेकिन उनके विचार और रचनाएं आजादी के बाद भी भारतीयों को प्रेरित करती रहीं।
विरासत
टैगोर ने बिना कुछ मांगे हमें बहुत कुछ दिया — राष्ट्रगान, क्रांतिकारी चेतना, नोबेल पुरस्कार की गरिमा, शांतिनिकेतन जैसा अनोखा शैक्षिक केंद्र और मानवतावादी दर्शन। उनके शब्द आज भी प्रासंगिक हैं:
“अनसुनी करके तेरी बात, न दे जो कोई तेरा साथ… तो तू ही कसकर अपनी कमर, अकेला बढ़ चल आगे रे…”
प्रिया श्रीवास्तव
भट्टनगर, लिलुआ, पश्चिम बंगाल
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