लखनऊ, 8 जनवरी 2026, लखनऊ कला एवं शिल्प महाविद्यालय के पूर्व छात्र, वरिष्ठ चित्रकार, संवेदनशील शिक्षाविद एवं प्रतिष्ठित साहित्यकार प्रो. राम जैसवाल (जन्म : 5 सितंबर 1935, सादाबाद, मथुरा, उत्तर प्रदेश; देहावसान : 7 जनवरी 2026, अजमेर, राजस्थान) का बुधवार को निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन की सूचना कल देर शाम प्राप्त हुई। इस दुःखद समाचार से देशभर का कला एवं साहित्य जगत शोकाकुल हो उठा है।
प्रो. राम जैसवाल जी बहुआयामी और असाधारण प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने 1953 से 1958 के बीच लखनऊ कला एवं शिल्प महाविद्यालय से ललित कला में डिप्लोमा प्राप्त किया तथा राजस्थान विश्वविद्यालय से चित्रकला में स्नातकोत्तर (एमए) की शिक्षा हासिल की।
उनका अकादमिक जीवन अजमेर स्थित डीएवी पीजी कॉलेज से आरंभ हुआ, जहाँ उन्होंने चित्रकला विभाग में व्याख्याता के रूप में कार्य करते हुए प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष पद तक की जिम्मेदारी निभाई और वहीं से सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के पश्चात भी वे निरंतर चित्रकला और साहित्य-सृजन में सक्रिय रहे।

जल-रंग और वॉश शैली में प्रो. राम जैसवाल जी की एक विशिष्ट पहचान थी। उनकी चित्र-भाषा में पारदर्शिता, प्रवाह, संयम और गहन संवेदनशीलता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
उनकी कृतियाँ जयपुर, लखनऊ, दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़, गोवा, शिमला, अहमदाबाद और अजमेर सहित देश के अनेक प्रमुख कला केंद्रों में प्रदर्शित हुईं। वे राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर के कई कला शिविरों और प्रदर्शनियों में सक्रिय सहभागी रहे।
उन्हें ललित कला परिषद, लखनऊ तथा राजस्थान ललित कला अकादमी की वार्षिक प्रदर्शनियों में पुरस्कार प्राप्त हुए। वर्ष 1997 में राजस्थान ललित कला अकादमी द्वारा उन्हें सर्वोच्च सम्मान ‘कलाविद’ से सम्मानित किया गया।
इसके अतिरिक्त उन्हें कला रत्न, वयोवृद्ध कलाकार सम्मान, नागरी दास सम्मान तथा संस्कार-भारती सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया गया। उनकी पेंटिंग्स राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय कला दीर्घाओं तथा निजी संग्रहों में सुरक्षित हैं।
साहित्य के क्षेत्र में भी प्रो. राम जैसवाल जी का उल्लेखनीय योगदान रहा। उनकी पहली कहानी 1956 में प्रकाशित हुई। ‘असुरक्षित’, ‘उग्र’, ‘समय दंश’, ‘विष जल’ और ‘अविराम’ उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं, जबकि ‘बिंब–प्रतिबिंब’ उनका चर्चित कविता संग्रह है।
उनकी रचनाएँ कल्पनालोक की उड़ान न होकर जीवन की ज़मीनी सच्चाइयों, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक यथार्थ को गहराई से अभिव्यक्त करती हैं। चित्रकार होने के कारण उन्होंने अपनी अनेक पुस्तकों के आवरण स्वयं डिज़ाइन किए, जिससे शब्द और रंग का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
भूपेंद्र कुमार अस्थाना ने बताया कि लखनऊ के कला जगत के युवा, वरिष्ठ कलाकारों, कला-इतिहासकारों और साहित्यकारों ने प्रो. राम जैसवाल जी के निधन को कला और साहित्य दोनों क्षेत्रों के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।
सरल, सहज और संवेदनशील व्यक्तित्व के धनी प्रो. राम जैसवाल जी अपने पीछे शिष्यों की एक सुदीर्घ परंपरा, समृद्ध कला-साहित्यिक विरासत और प्रेरणादायी स्मृतियाँ छोड़ गए हैं। अपने विचारों, शिक्षण और सृजन के माध्यम से प्रो. राम जैसवाल जी सदैव स्मृतियों में जीवित रहेंगे। उन्हें विनम्र एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
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