बिना लेखकीय विवेक के प्रेमचंद की कहानी को समझना मुश्किल है – प्रो. बी.एल. आच्छा
उज्जैन। भारत की जो ज्ञान प्रज्ञा है, हमारी जो निष्ठाएं हैं या हमारी जो परम्पराएँ हैं, वो कैसे निर्णय लेती हैं इसके लिए ऑपरेशन सिन्दूर को जानना जरुरी है कि हम आतंकवाद को खत्म करना चाहते हैं किसी देश को नहीं।
ये विचार प्रेमचंद सृजन पीठ द्वारा साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग के तत्वावधान में कालिदास अकादमी में आयोजित प्रेमचंद कथा सागर के अनछुए किनारे, उनकी कहानी जिहाद के संदर्भ में आयोजित व्याख्यान में प्रमुख अतिथि के रूप में प्रख्यात आलोचक और वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. बी.एल. आच्छा, चेन्नई ने व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि हमारी ज्ञान परम्परा सींखचों में बंधीं नहीं है। पठन-पाठन के लिए अंततः लेखकीय विवेक ही काम करता है। बिना लेखकीय विवेक के प्रेमचंद की इस कहानी जिहाद को समझना मुश्किल है।
अध्यक्षीय व्याख्यान में सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलानुशासक एवं प्रसिद्ध समालोचक प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि प्रेमचंद सही अर्थों में साधारणता में असाधारणता के कथाकार हैं। उनकी दुनिया बहुत व्यापक है। प्रेमचंद सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं लिखते थे। वे कालजयी और विश्व कथाकार हैं। प्रेमचंद जी को किसी अलंकरण की जरूरत नहीं है क्योंकि वे स्वयं अलंकार हैं।
प्रेमचंद अद्वितीय हैं। पूरी दुनिया में प्रेमचंद की कोटि का कोई कथाकार दिखाई नहीं देता जो भारतीय संस्कृति, सभ्यता और राष्ट्रीयता के उच्चतम मूल्यों को लेकर लेखन करता हो। वे जगाने का कार्य भी करते हैं। प्रेमचन्द जी की पीड़ा महाकवि कालिदास की पीड़ा है क्योंकि बाहरी हमले हम शताब्दियों से झेलते आ रहे हैं।
प्रमुख वक्ता डॉ. रमेशचन्द्र चतुर्वेदी, गुजरात ने कहा कि मजहब का अक्ल से, विवेक से कोई वास्ता नहीं होता और धर्मांध होकर वे कुछ भी कर सकते हैं। जबकि हमारी भारतीय संस्कृति का मूल क्षमाशीलता और सहिष्णुता है। डॉ. चतुर्वेदी ने कहा कि यदि यही विपुल साहित्य प्रेमचंद ने अंग्रेजी में लिखा होता तो वे दुनिया भर में पूजे जाते। जिहाद कहानी सिर्फ सम्प्रदायवाद के खिलाफ कहानी नहीं उसमें हमारी ज्ञान परम्परा भी है।
सारस्वत अतिथि कालिदास अकादमी के निदेशक डॉ. गोविन्द गंधे ने कहा कि प्रेमचंद जी गद्य के उपासक थे उन्होंने पाठक को केंद्र में रखकर, पाठक को जोड़कर कालजयी साहित्य रचा और उनके साहित्य पर नित नई उद्भावनाएँ जारी हैं।
विशिष्ट अतिथि निराला सृजन पीठ भोपाल की निदेशक डॉ. साधना बलवटे ने कहा कि तथाकथित इतिहासकारों ने भारतीय साहित्य के इतिहास से भारतीयता और संस्कृति को दूर कर दिया। प्रेमचंद प्रगतिशील थे और प्रगतिशील होना और प्रगतिवादी होना अलग-अलग हैं। जेहाद कहानी के माध्यम से प्रेमचंद ने जो सन्देश दिया वो परिस्थितियाँ आज भी विद्यमान हैं।
माँ वाग्देवी और प्रेमचंद के चित्र पर माल्यार्पण और दीप आलोकन अतिथि सर्वश्री प्रो. बी.एल. आच्छा, डॉ. शैलेन्द्र कुमार शर्मा, मुकेश जोशी, डॉ. रमेशचन्द्र चतुर्वेदी, डॉ. गोविन्द गंधे, डॉ. साधना बलवटे, आचार्य शैलेन्द्र पाराशर, डॉ. रमण सोलंकी, डॉ. हरीश कुमार सिंह ने किया।
अतिथि स्वागत मुकेश जोशी, डॉ. राजेश रावल, डॉ. पिलकेंद्र अरोरा, महेश ज्ञानी, विवेक चौरसिया, शशांक दुबे, संतोष सुपेकर, सतीश दवे, सुरेन्द्र सर्किट, डॉ. पांखुरी वक्त, डॉ. अभिलाषा शर्मा, सीमा देवेन्द्र आदि ने किया। डॉ. अनामिका सोनी के राष्ट्रगीत गायन वन्दे मातरम से व्याख्यान का शुभारम्भ हुआ। सरस्वती वंदना सीमा देवेन्द्र ने प्रस्तुत की।
आयोजन में डॉ. प्रशांत पुराणिक, अंतर्राष्ट्रीय कवि दिनेश दिग्गज, डॉ. उर्मि शर्मा, पूर्व न्यायाधीश शशिभूषण श्रीवास्तव, शांतिलाल जैन, स्वामी मुस्कुराके शैलेन्द्र व्यास, अशोक भाटी, डॉ. श्वेता पंडया, पंकज चांदोरकर, प्रकाश देशमुख, सुगनचंद जैन, डॉ. अरविंद जैन, डॉ. संतोष पंड्या, अजय मेहता, उद्धव जोशी, डॉ. मोहन मुकुल, विक्रम विवेक,
डॉ. माया वदेका, डॉ. नेत्रा रावणकर, मीरा जैन, संगीता तल्लेरा, राजेंद्र नागर, राजेंद्र जैन, केशव पंड्या, दिलीप जैन, धनसिंह चौहान, राहुल शर्मा, अनिल पांचाल सेवक, प्रबोध पंड्या, दीपक सोनी, वरिष्ठ मालवी कवि अशोक नागर, डॉ. अजय शर्मा, मानसिंह खराड़ी, अशोक महाजन,
महेश त्रिवेदी, कमलेश रावल, प्रतिभा रावल एवं सम्राट विक्रमादित्य विवि के स्कॉलर्स और विद्यार्थी सहित कई गणमान्यजन उपस्थित रहे। संचालन डॉ. हरीश कुमार सिंह ने किया और आभार प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी ने व्यक्त किया।
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