आज हम प्रफुल्ल सिंह के अनिश्चितता के सिद्धांत को सिद्ध करते हुए उस अनिश्चितता में से मध्य का मार्ग ढूंढेंगे और साथ ही अतिसंवेदनशीलता के विषय में भी जानेंगे। तो आइए शुरू करते है।

प्रफुल्ल जी कहते हैं,
“या तो आप सम्वेदनशील हो सकते हैं या सुखी हो सकते हैं। दोनों चीज़ें साथ-साथ घटित नहीं होतीं।”

अब यादि सोचा जाएं के सुखी कौन है? तो उत्तर मिलेगा, सुखी वो जिसके पास सुख है। तो सुख क्या है फिर?
असल में न सुख है, न दुख है। सुख-दु:ख तो मात्र एक विचार है। एक के लिए एक घटना दु:ख का संदेश लाती है, तो दूसरे लिए वही घटना भविष्य के लिए सुख की आहट देती है।
उदाहरण के लिये शहर में डेंगू फैला। यह ख़बर दु:खदायी, भयंकर और हैरान करने वाली महसूस होती है। कोई दोष लोगों को देगा तो कोई नेताओं को, तो कोई सफ़ाई कर्मचारियों इत्यादि को। परंतु कितने लोगों की ज़िंदगी बन जाएगी। यह बहुत कम लोग देखते हैं। डेंगू फैला तो बकरी का दूध बेचने वालों की, पपीता बेचने वालों की, डॉक्टरों की, लैब वालों की, और उनके साथ अनेक लोगों की तो पौ-बारह हो जाएगी। अक्सर ये सोचती हूं कि जो अंतिम संस्कार का सामान बेचता होगा उसके घर में ख़ुशी कब आती होगी। वह भी जब अपने ग़ल्ले की आरती करता होगा तो कहता होगा कि ‘सुख संपत्ति घर आवे’। कब आएगी उसके घर में सुख संपत्ति? कब आएगा उसके जीवन में आराम? जब शहर में ज्यादा मृत्यु होगी।

तो अब प्रश्न उठता है यदि सुख या दुख जैसी चीजें है ही नही तो फिर सुखी कौन हुआ और कैसे?
वास्तविकता में अगर देखा जाए तो सुखी वो है जिसके पास मानसिक शांति और स्थिरता है।
तो क्या संवेदनशीलता के साथ मानसिक शांति और स्थिरता संभव नहीं?
नही! बिल्कुल नही क्योंकि एक संवेदनशील व्यक्ति दुनिया जहां के तमाम छोटे बड़े सुख दुख से प्रभावित होता है। अगर आप एक संवेदनशील हैं तो समाज मैं फैली अव्यवस्था, छल-कपट, अन्याय को देखकर आपका प्रभावित होना स्वाभाविक है। ऐसे में जीवन में शांति और स्थिरता का आना असंभव है।
अतः ये बात शैल के अनिश्चिता के सिद्धांत को सिद्ध करती है के व्यक्ति एक समय पर या तो सुखी (शांत और स्थिर) रह सकता है या फिर संवेदनशील।

तो क्या जो व्यक्ति संवेदनशील है वो कभी सुखी(शांत और स्थिर) नही रह सकता? क्या इसमें बीच का कोई रास्ता नही?

देखिए जीवन में शांति और स्थिरता लाने के लिए दो ही रास्ते है।
पहले के लिए आपको अपनी संवेदनशीलता को त्याग कर उदासीन होना पड़ेगा। जिससे आप पर सुख दुख का कोई प्रभाव ना पड़े पर ये मनुष्यता के लिए ठीक नहीं। मनुष्य में संवेदनाएं है तभी वो मनुष्य है।
पर इसके लिए व्यर्थ की चिंताओ से खुद को कुंज करते जाना भी ठीक नहीं। तो ऐसे में या तो स्वार्थी बने और उदासीन हो जाए या फिर संवेदनशीलता की अग्नि में जलते रहें।
इस पहले विकल्प के अतिरिक्त एक विकल्प और है जिसमे आप संवेदनशील तो रहेंगे पर आपकी संवेदनशीलता आपको क्षति नही पहुचायेगी और वो विकल्प है अध्यात्म और दर्शन का विकल्प। यहां अध्यात्म का अर्थ सन्यास लेने से बिल्कुल नही है। अध्यात्म का अर्थ है जीवन को यथार्थ से देखना। आत्मचिंतन करना। खुद की, शांति की और स्थिरता की खोज करना।

संवेदनशील इंसान के लिए यह दुनिया तकलीफदेह हो जाती है. अगर आप पूरी तरह से बेखबर हैं, तो ठीक है. अगर आपको ज्ञान प्राप्ति हो चुकी है, तब यह बहुत ही सुंदर बात है, लेकिन इन दोनों स्थितियों के बीच में होना कष्टकर है क्योंकि इसी स्थिति में आपकी संवेदनशीलता आपको क्षति पहुंचती है। ये ठीक वैसा है जैसे कई कभार हमे कोई खरोच लग जाती है और हमे पता भी नही चलता। जब तक हमे ख़बर नहीं रहती हम नॉर्मल रहते है वही जैसे ही पता चलता है के अरे ये खरोच कब लगी इसमें से तो खून निकल रहा है तब हम परेशान हो जाते है। पर जब स्थिति का पूरा ज्ञान होता है के ये बस जरा सी खरोच है और सब ठीक हो जायेगा तब हम फिर स्थिर हो जाते हैं। सभी प्राणियों में अनुभूति की क्षमता होती है। जब तक जीवित हैं आंतरिक और बाह्य वस्तुस्थिति हमारी अनुभूति का कारण बनती है। व्यक्ति जितना संवेदनशील होगा उसकी अनुभूति उतनी ही प्रबल होगी। और यही अनुभूति ही उसके सुख दुख का कारण बनती है।
एक बार आपने यदि साक्षी भाव से संसार की हर घटना को देखना शुरू कर दिया तो भयंकर से भयंकर दु:ख में भी आप डोलेंगे नहीं। इसलिए आध्यात्मिक प्रक्रिया और आत्मचिंतन बहुत जरूरी है। दर्शन और अध्यात्म आपके नजरिए को जरूरी नही के बदल दे पर ये जरूर है के वो आपके दृष्टिकोण को वृहत करता है।

जब आप आत्मचिंतन करेंगे तो ये चीजे खुद ब खुद आप पर खुलेगी और अध्यात्म इसी आम चिंतन का नाम है खुद को जानने का मार्ग है। और इसके लिए आपको अपनी संवेदनशीलता भी नही खोनी पड़ेगी।

एक विशेष बात और कि ;
संवेदनशीलता और अतिसंवेदनशीलता में अंतर समझे संवेदनशीलता भला है, ये एक मानवीय गुण है पर अतिसंवेदनशीलता रोग है। संवेदनशीलता होना अर्थात किसी के परेशानी मे कष्ट होना अच्छी बात है, पर कोरी संवेदनशीलता से किसी को लाभ नहीं होता, कोरी सवेदनशीलता से मेरा तात्पर्य है कि किसी की परेशानी मे आप कुछ न करें या न पा रहे हों तो भी दुखी बने रहें। आप किसी से जितना जुड़े होते हैं उतना ही उसका कष्ट बड़ा लगता है , उतने ही आप संवेदनशील होते हैं, परन्तु कहीं कोई दुर्धटना, प्राकृतिक आपदा या आतंकवाद घटता है तो वह हमारी संवेदनाओं को छूकर निकल जाता है, हम फिर सामान्य हो जाते हैं। और ऐसा होना भी चाहिये, क्योंकि हमारी सीमायें हैं जिनके बाहर जाकर हम हरेक की मदद तो कर नहीं सकते। इस दुनिया में रोज़ कुछ अच्छा, कुछ बुरा होता रहता है, सुख-दुख आते जाते हैं। कुछ लोग ये बात नहीं समझते और कही भी कुछ भी ग़लत होता है तो दुखी हो जाते हैं, सामान्य रहने में उन्हें ग्लानि होती है, ऐसी संवेदनशीलता को अतिसंवेदनशीलता कहते हैं जिसके कारण ऐसे लोगों को चारों ओर निराशा और अंधकार नज़र आने लगता है। यह स्थिति धीरे-धीरे अवसाद (depression) का रूप ले लकती है। एक नेक इंसान को उतना ही संवेदनशील होना चाहिये कि वह कष्ट की घड़ी में यथासंभव किसी की मदद करे परन्तु ऐसा करना यदि उनके वश में न हो तो उसके बारे में सोच-सोच कर दुखी या उदास न हों। संवेदनशील इंसान दुर्घटना के समय उपस्थित होगा तो वह मदद करेगा, अनदेखा करके वहां से नहीं जायेगा।

व्यक्तित्व के गुणदोषों का समन्वय जीवन में ठहराव लाता है। कोई व्यक्ति अगर अपनी संवेदनशीलता को पहाचान कर उसे सही स्तर पर लाना चाहे तो वह ऐसा कर सकता है, कोशिश करे कि जब लगे अतिसंवेदनशील हो रहा है तो स्यंय को निर्देश (auto suggestion) दे कि नहीं इस बात पर ध्यान नहीं देना है, ख़ुद को दूसरे कामो में व्यस्त करले।संवेदनहीन व्यक्ति अपने को निर्देश (auto suggestion) दे कि किसी को कष्ट में देखेगा तो वह उसकी मदद अवश्य करेगा, मौके से भागेगा नहीं। अपनी संवेदनशीलता को व्यक्ति पहचान सके, यह लेख लिखने का एक उद्देश्य यह भी है। अपनी संवेदनशीलता को सही स्तर पर लाना इतना सरल भी नहीं है, इसके लिये किसी मनोवैज्ञानिक की मदद ली जा सकती है। अति संवेदनशीलता अनिन्द्रा (insomnia), तनाव (stress), अवसाद (depression) व्याकुलता (anxiety) का कारण बन सकती है।

प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम”
युवा लेखक/स्तंभकार/साहित्यकार
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
ईमेल : [email protected]

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