वाराणसी। पिठोरी अमावस्या भाद्रपद मास में आती है। पितृ पूजन, दान-पुण्य के लिए इसका विशेष महत्व है। भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि पर आने वाली पिठोरी अमावस्या देशभर में मनाई जाती है। ये उत्तर भारत में कुशाग्रहणी अमावस्या के तौर पर मनाई जाती है। इसके साथ ही इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने का भी महत्व है।
पिठोरी अमावस्या कब है? भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि 22 अगस्त को दोपहर 11.57 बजे लगेगी और 23 अगस्त को 11.37 बजे पूरी होगी। 22 अगस्त को अमावस्या मध्यकाल में लग रही है और उदया तिथि नहीं है, ऐसे में इस दिन पिठोरी अमावस्या मान्य होगी। इस दिन पितृ पूजन, तर्पण, श्राद्ध आदि का महत्व है। ऐसा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलेगी। इसके साथ ही उनका आशीर्वाद भी मिलता है।
कुशाग्रहणी अमावस्या कब है? इसी तरह 23 अगस्त को सूर्योदय कालीन अमावस्या तिथि लग रही है। ऐसे में इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने, दान पुण्य करने का विशेष महत्व है। इसके साथ ही पितरों के नाम पर जरूरतमंदों को भोजन करा सकते हैं। 23 अगस्त की अमावस्या तिथि को कुशाग्रहणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है।
क्योंकि इस दिन कुश इकट्ठा करने का महत्व है। इस दिन जिनके माता या पिता नहीं होते हैं वे कुश इकट्ठा करते हैं और इसे घर पर लाते हैं। यही कुश पूरे साल पितृ पूजन में काम आता है। इसके अलावा साल के अन्य दिनों में कुश नहीं उखाड़ा जाता है।
पिठोरी अमावस्या का महत्व : पिठोरी अमावस्या पर पितरों का तर्पण करने, श्राद्ध करने का विशेष महत्व है। माना जाता है कि इस दिन पीपल के पेड़ की पूजा करने से दुख दर्द दूर होते हैं। आपकी बाधाएं दूर होती हैं। शनिदेव की पूजा करने का भी महत्व होता है, क्योंकि अमावस्या तिथि शनिदेव को समर्पित होती है। वहीं पिठोरी अमावस्या के दिन गंगा नदी में स्नान करने पापों से मुक्ति मिलती है।
64 योगिनियों की पूजा का महत्व : कथाओं के अनुसार, भाद्रपद की पिठोरी अमावस्या पर मां पार्वती ने 64 योगिनियों के साथ मिलकर गणेश जी की पूजा की थी। दरअसल पिठोरी” शब्द का अर्थ होता है ‘आटे की मूर्तियां’. इसलिए इस दिन महिलाएं आटे से 64 योगिनियों की प्रतिमाएं बनाकर उनकी पूजा करती हैं। 64 योगिनियां देवी शक्ति का रूप मानी जाती हैं, और उनकी आराधना से सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
पिठोरी अमावस्या की पूजन विधि : इस दिन महिलाएं प्रातःकाल में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और पूजा की तैयारी करती हैं। स्नान के बाद सबसे पहले सूर्य देव को जल अर्पित करती हैं और फिर पितरों पर जल अर्पित करती हैं। पितरों के लिए जल अर्पित करते समय “ॐ पितृभ्यः नमः” मंत्र का जाप किया जाता है।
पूजा स्थल में घी का दीप जलाकर बच्चों के नाम से व्रत का संकल्प लेती हैं। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक पूजा करने से संतान के जीवन में सदैव खुशहाली बनी रहती है। बताते चलें कि दक्षिण भारत में पिठोरी अमावस्या को पोलाला अमावस्या भी कहा जाता है।
ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 99938 74848
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