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बद्रीनाथ की कविता : “नारी तुम सम्मान हो”

नारी तुम सम्मान हो

नारी तुम सम्मान हो
हर पुरुष में शक्ति सी
विद्धमान हो

नारी तुम वो कारीगर हो
जिसने प्रकृति को रचा
प्रेम की वो मूरत हो
जिसने मातृत्व को गढ़ा
कला की वो मिशाल हो
जिसने सुंदरता को
श्रेष्ठतम आयाम दिया
बहुमुखी भावनाओं की धनी
कोमलता और कठोरता का समुचित संगम हो
क्षमा की समानर्थी
दया की हितैषी
करुणामयी विवेकशील हो

नारी तुम सम्मान हो
हर पुरुष में शक्ति सी
विद्धमान हो

सुख समृद्धि का प्रारूप
तुमने ही जीवन को
दिया सभ्य रूप
तुमने नटखट बचपन पाला
भटका हुवा यौवन संभाला
असहाय बुढापा का तुम्ही
तो रक्षावान हो

नारी तुम सम्मान हो
हर पुरुष में शक्ति सी
विद्धमान हो

अमूल्य तुम्हारा समर्पण
बेशकीमती है तर्पण
सह असंख्य पीड़ा
किया है तुमने सृजन
तुम आधारशील
तुम्ही गगन सी शान हो
तुम पूर्ण जीव की
सम्पूर्ण विज्ञान हो

नारी तुम सम्मान हो
हर पुरुष में शक्ति सी
विद्धमान हो

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तुम कंठ में जल की जैसी
शून्य गगन में थल की जैसी
तम की बाँह में चिंगारी जैसी
शेष क्षण में विशेष जैसी
हर अंत की शुरुआत तुमसे
हर शुरुआत की अंत तुमसे
तुम ब्रह्म की शुरुआत
और तुम्ही काल की मिलाप हो

नारी तुम सम्मान हो
हर पुरुष में शक्ति सी
विद्धमान हो

हृदय ऐसे अभिभूत है
जैसे कोई परमसुख है
नारी तेरे संलग्न में
हर पुरुष का गर्व निहित हैं
तुम कुशलता की देवी
हर कौशलता में पारंगत हो
तुम सहायक तुम निर्णायक
हर समर की प्रत्यक्ष प्रमाण हो

नारी तुम सम्मान हो
हर पुरुष में शक्ति सी
विद्धमान हो।

 

बद्रीनाथ साव

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