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प्रांजल वर्मा की कविता : सास कभी बुरी नहीं होती

।।सास कभी बुरी नहीं होती।।
प्रांजल वर्मा

सास कभी बुरी नहीं होती…
वह बस उम्र की ढलान पर खड़ी
एक ऐसी स्त्री होती है,
जिसके भीतर मां होने की चाह
अब भी जलती रहती है,
पर जिसे कोई पुकारता नहीं।

बहू जब नए घर में कदम रखती है,
तो सास की आंखें
उसे बहू नहीं,
एक बेटी की तरह देखना चाहती हैं
पर शब्द ढूंढ नहीं पातीं।

और बहू,
जिसके मन में हजार झिझकें हों,
यदि एक बार मुस्कराकर कह दे
“मां, आप थक गई होंगी”
तो सास का वर्षों पुराना
सारा कठोरपन टूट जाता है।

सच यही है
सास के दिल में कोई कटुता नहीं होती,
बस एक डर होता है
कि कहीं उसकी जगह
धीरे-धीरे खाली न कर दी जाए।

बहू यदि
उस डर को समझ ले,
तो सास उसके लिए
वैसी ही मां बन जाती है
जैसी उसने कभी भगवान से मांगी थी।

घर की सबसे बड़ी शांति
यहीं से जन्म लेती है
जब बहू
सास में मां का रूप देख लेती है,
और सास
बहू में अपना पूरा संसार।

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प्रांजल वर्मा, कवित्री

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