।।नानी घर।।
नितेश तिवारी ‘श्याम’
मातश्री की माई का घर,
मेरी माँ का वह है मायका,
मैं कहता था उसे नानी घर।
दादी घर कभी कहा नहीं,
जब भी कहता अपना घर।
पर मन के भीतर बैठ गया है,
वह दूसरा घर, हाँ वह नानी घर।
अपने घर के हम ही मालिक,
हम ही नौकर, हम ही चाकर।
अपने घर का मालिक बनकर भी,
कर पाया न वह राज कभी,
जो करता था राज नानी घर में।
नानी का घर नानी का था,
सारी चिंताएं थीं नानी की,
चाहे खाने की, चाहे पानी की,
या फिर चाहे मेरी बेइमानी की।
मै राजा था अपने मन का
क्योंकि नाती था मैं नानी का।
मुक्त रहता घर के झंझावातों से,
लिप्त रहता हमउम्र संग उत्पातों में।
अब युवावस्था में जा पहुंचा हूं,
फिर से उस नानी के ही घर।
घर तो बदला है थोड़ा सा,
नानी का चेहरा भी बदला है।
घर के पास-पड़ोसी भी बदले,
रवैया और विचार भी बदल गया।
समयानुरूप मैं बदला हूं बहुत,
जिम्मेवारियां सिर पर आ बैठी बहुत।
नानी तो अब भी वही नानी रही,
अब भी उतनी ही भोली-भाली।
जो पहले पीछे थी दौड़ा करती,
अब बस दो तीन पग ही डोली।
अब मैं शरारती नहीं, सौम्य रहा,
नानी के लिए अभी भी वही रहा।
अब भी पहले की भांति ही वह,
हमारे पहुंचने पर चहक जाती,
वृद्ध चिड़ियों-सी हाथों में कुछ लिए।
हमारे लौटने पर आज भी रोती,
और जबरन बांध देती, घी आचार।
जेबों में कुछ रुपया जरूर भर देती।
आखिर नानी तो नानी ही होती है।
वह तो मेरी माँ की भी माई है।
नितेश तिवारी ‘श्याम’
कक्षा – द्वादश,
श्री जैन विद्यालय,
हावड़ा।

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