“अमृतकाल की धूल और काशी की सिसक”
वो दौर भी गुज़रा जब गजनवी का लश्कर आया था,
और औरंगज़ेब ने भी अपना ख़ौफ़ जमाया था।
तब भी जो पत्थर अडिग रहे, अपनी जगह से हिले नहीं,

वो आज अपनों के ही हाथों, मिट्टी में हैं मिले कहीं।
’अमृतकाल’ की घोषणा है, उत्सव का माहौल है,
पर मणिकर्णिका की गलियों में, मलबों का ही शोर है।
जहाँ अहिल्याबाई की श्रद्धा ने, ईंटों को संवारा था,
आज उसी विरासत पर, ‘विकास’ का हथौड़ा भारी है।
प्राचीन विग्रह, खंडित मूर्तियां, बिखरे पड़े हैं धूल में,
क्या सब कुछ मिटा देना ही लिखा है, प्रगति के उसूल में?
वो गलियां जो बनारस की रूह थीं, वो अब गुम हो रही हैं,
सदियों की जो पहचान थी, मशीनों तले दम तोड़ रही हैं।
लोग आहत हैं, पुरोहित मुखर हैं, आँखों में पानी है,
पर व्यवस्था के कानों तक, पहुँचती नहीं कोई कहानी है।
पाल समाज खड़ा है सड़कों पर, अपनी विरासत बचाने को,
पर नक्शे तैयार हैं यहाँ, एक नया बनारस रचाने को।
क्या ये चमक-धमक ही अब, महादेव का श्रृंगार है?
जहाँ अतीत को ढहा देना ही, आधुनिकता का सार है?
गंगा गवाह है इस दर्द की, जो घाट-घाट पर बिखरा है,
बनारस आज अपने ही आँगन में, थोड़ा सा उखड़ा है।




