न कोई खौफ अब शेष है,
न अहंकार का कोई भार
जिस दिन समझ लिया
कि मैं कर्ता नहीं,
उसी दिन आत्मा हल्की हो गई।
न ठौर है, न ठिकाना,
यह देह तो बस
कुछ समय का प्रवास है,
साँसों की सराय में
क्षणिक ठहराव।
मिट्टी था मैं
भगवान की उँगलियों से
गढ़ा गया एक मौन प्रश्न,
जिसे जीवन ने
अनुभवों के उत्तर दिए।

मिट्टी ही हूँ
कभी आँसू सोख लेती हुई,
कभी प्रार्थनाओं का भार उठाए,
कभी चरणों से लिपटकर
मोक्ष की भाषा सीखती हुई।
और जब यह यात्रा पूरी होगी,
तो किसी विदाई की जरूरत नहीं
मैं फिर मिट्टी हो जाऊँगा,
उसी में विलीन,
जहाँ न मैं हूँ
न मेरा नाम,
बस भगवान की
शाश्वत शांति है।
यही समर्पण है,
यही साधना,
अहं के विसर्जन में ही
आत्मा का उत्सव है।

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