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अशोक वर्मा “हमदर्द” की कविता : बेरोजगारी – एक जीवित नर्क

।।बेरोजगारी – एक जीवित नर्क।।
अशोक वर्मा “हमदर्द”

नर्क देखना है तो
आग की लपटों में मत झाँकिए,
न किसी पुराण की कथा में उतरिए,
बस एक दिन
बेरोजगार होकर जी कर देखिए।
सुबह होगी
पर आपके लिए नहीं।
घड़ी की सुइयाँ चलेंगी
पर समय ठहर जाएगा
आपकी जेब की खाली सिलवटों में।
घर के आँगन में
आपकी आहट तो होगी,
पर स्वागत नहीं।
नजरें आप पर पड़ेंगी
पर ठहरेंगी नहीं
जैसे आप कोई अनावश्यक वस्तु हों
जिसे कोने में रख दिया गया हो।
आपकी डिग्रियाँ
दीवार पर टँगी रहेंगी
फ्रेम में कैद सपनों की तरह।
ज्ञान,
जो कभी आपकी पहचान था,
अब एक बोझ बन जाएगा
क्योंकि बाजार को बुद्धि नहीं,
बिकाऊ चेहरा चाहिए।
रिश्तेदार पूछेंगे
“क्या पढ़ रहे हो?”
वे पूछेंगे
“कर क्या रहे हो?”
और यह ‘क्या’
आपकी आत्मा में
किसी कील की तरह धँस जाएगा।
अपने भी
आपकी आँखों में सपने नहीं खोजेंगे,
वे आपकी कमियाँ गिनेंगे
“थोड़ा और कोशिश करते…”
“थोड़ा समझदारी दिखाते…”
“फलाँ के बेटे को देखो…”
आप समझाना चाहेंगे
कि समय कठोर है,
व्यवस्था जटिल है,
मौके सीमित हैं
पर आपकी सफाई
आपकी ही अदालत में
सबसे कमजोर दलील बन जाएगी।
यह समाज
सद्गुणों की माला नहीं जपता,
यह सिक्कों की खनक पर नाचता है।
यहाँ मूल्य नहीं,
मूल्यांकन चलता है।
जिसकी जेब में आवाज है
उसकी बात में वजन है।
चाहे वह आवाज
ईमान से आई हो
या छल से,
किसी को फर्क नहीं पड़ता।
चरित्र
अब चरित्र प्रमाण पत्र में रह गया है,
जीवन में नहीं।
सम्मान
अब संस्कार से नहीं,
सैलरी से मापा जाता है।
बेरोजगार होना
सिर्फ काम का न होना नहीं,
यह धीरे-धीरे
स्वाभिमान के क्षरण की प्रक्रिया है।
आप जीते हैं,
पर हर दिन थोड़ा-थोड़ा
मरते हैं।
आप मुस्कुराते हैं
ताकि घर में चिंता न फैले,
पर भीतर
एक शून्य फैलता जाता है
जैसे कोई सूखा कुआँ
जिसमें आवाज भी गिरकर
लौट कर नहीं आती।
और तब समझ आता है
नर्क कोई परलोक नहीं,
वह यहीं है,
इस समाज की आँखों में,
जो इंसान को नहीं,
उसकी आय को देखती हैं।
पर सुनो
इस अँधेरे के भीतर भी
एक सत्य छिपा है।
जो इस अग्नि से गुजरता है,
वह जान लेता है
कि उसका असली मूल्य
दूसरों की तालियों से नहीं,
अपने धैर्य से तय होता है।
बेरोजगारी
तुम्हें तोड़ती है,
पर यदि तुम टिक गए
तो वही तुम्हें
इस समाज से बड़ा बना देगी।
क्योंकि सिक्कों की खनक
क्षणिक है,
पर संघर्ष की ध्वनि
पीढ़ियों तक सुनाई देती है।
मुझे गर्व है कि मैं
बेरोजगार पर
एक विद्वान बेटे का
बाप हूं,
जिसकी विद्वता को
एक दिन
दुनियां पूजेगी।

Ashok verma
अशोक वर्मा “हमदर्द”, लेखक

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