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अशोक वर्मा “हमदर्द” की कविता : उड़ने का अंदाज बदल

।।उड़ने का अंदाज बदल।।
अशोक वर्मा “हमदर्द”

हिम्मत की लौ जलाने चल, डर की ये परतें छील जरा,
शब्दों में आग भर दे अब, चुप्पी की तू जुबान बदल।
जो गर्दिश में हैं आसमां, उन्हें बुलंदी की बात सुना,
कैद पंखों को दे परवाज़, उड़ने का अब अंदाज बदल।

भीड़ से हटकर चल तू अब, सोच को एक आयाम दे,
जो लकीरें हैं जमीन की, उन्हें छूकर आसमान बदल।
सपनों की जो माटी है, उसमें अपने कर्म बो जरा,
तकदीर को नई राह दिखा, तकदीर का अल्फाज बदल।

सरहद पर जो सीना ताने, बर्फ में भी मुस्कान लिए,
उन वीरों के संकल्पों को अब जन-जन की पहचान बना।
शौर्य की वो गाथाएँ, जो रक्त से लिखी गईं शान से,
उनके साहस की लौ बन, अंधेरों का तू राज बदल।

भारत माँ की जय बोलकर, रणभूमि में जो लड़े कभी,
उनके सपनों का भारत अब, अपने कर्म से ताज बदल।
गौरव की भाषा सीख जरा, हाथों में ले विश्वास जलाल,
अब वंदेमातरम् का नारा, बन जाए नई आवाज, बदल।

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अशोक वर्मा “हमदर्द”, लेखक

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