।।पाषाण में प्राण।।
आदित्य त्रिपाठी
जहाँ सभ्यता की धार
खुद को ही काटने में लगी,
जहाँ चेतना की पुकार
कोने में सिमट कर ठगी।
इक दौड़ है जमाने की
हर प्राण को पत्थर बनाने की,
पर सुनो! एक कहानी है
सदियों पुरानी भारत की।
यह देश जहाँ हर शिला में भी
धड़कन जगाई जाती है,
यह भूमि जहाँ पाषाण में भी
प्राण-प्रतिष्ठा कराई जाती है।
वो विश्व है जो कंचन को ही
ईश्वर का रूप मानता है,
वो दौड़ रहा बस भौतिकता में
आत्मिक सुख को न जानता है।
उसने मनुज के भीतर के
सारे भाव निचोड़ दिए हैं,
रिश्तों की ऊष्मा खोकर
हर बंधन तोड़ दिए हैं।
वहाँ भावना की परिभाषा
बस लाभ-हानि से तौली जाती है,
वहाँ जीवन की परिभाषा
बस कठोरता से बोली जाती है।
उन्होंने स्वार्थ की नींव पर
एक विशाल महल खड़ा किया,
और चेतन को भी आखिर
एक जड़ सा पदार्थ बना दिया।
पर ये भारत है!
जहाँ आस्था की
गंगा अनवरत बहती है,
जहाँ एक मूर्ति में पूरी
सृष्टि समाई रहती है।
यहाँ मूरत को गढ़ने वाला
पहले अपनी आत्मा निचोड़ता है,
फिर मंत्रों के बल से उसमें
ईश्वरीय ऊर्जा जोड़ता है।
वो नहीं पत्थर
जिसे तुम मौन और बेजान समझते हो,
वो तो रूप है उस दिव्य शक्ति का
जिसे तुम अनजान समझते हो।
देखो! अजंता की गुफाएँ
कहती हैं प्रेम की वाणी,
सुनो! मंदिरों के गर्भगृह में
है एक अमर कहानी।
यहाँ शैव हैं, तो यहाँ शाक्त हैं
यहाँ राम और कृष्ण हैं,
हर शिलाखंड में देखो
हमारे युगों के दर्शन हैं।
हमने निर्गुण को भी रूप दिया
और पत्थर को भी स्वर दिया है,
हमने जड़ता के अँधियारे में
एक प्रकाश अमर भर दिया है।
हाँ! हम वो हैं जो पत्थर को भी
भगवान बना सकते हैं,
हम वो हैं जो टूटे हुए को भी
सम्मान दिला सकते हैं।
ये संस्कार है ये संस्कृति है
ये है हमारी पहचान,
इस आस्था के बल पर ही
भारत है सबसे महान।
जब तक ये प्राण-प्रतिष्ठा है
तब तक भारत अमर रहेगा,
ये प्रेम और श्रद्धा का दीपक
हर कोने में जलता रहेगा।

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