Pitru Paksha special Shraddha is also related to Mahabharata on the basis of genealogy even today in Pihova

पितृ पक्ष विशेष: पिहोवा में आज भी वंशावली के आधार पर होता है श्राद्ध, महाभारत से भी जुड़ा है किस्सा

पिहोवा (हरियाणा) | 10 सितंबर 2025 : पितृ पक्ष के अवसर पर हरियाणा के पिहोवा तीर्थ में आज भी वंशावली के आधार पर श्राद्ध और पिंडदान की परंपरा जीवित है। यह स्थान न केवल धार्मिक रूप से, बल्कि इतिहास और संस्कृति की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां के पुरोहितों के पास 300 से 400 वर्ष पुरानी बहियाँ (वंशावली अभिलेख) सुरक्षित हैं, जिनमें श्रद्धालुओं के पूर्वजों का विवरण दर्ज होता है।

📜 महाभारत से जुड़ा पिहोवा का किस्सा

  • महाभारत के अनुसार, युधिष्ठिर ने महायुद्ध के बाद अपने परिजनों और वीरगति को प्राप्त योद्धाओं का श्राद्ध यहीं पिहोवा में किया था
  • भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें यही स्थान सुझाया था, जिसे पृथुदक नगरी कहा जाता है
  • यहां श्राद्धदेव जी का मंदिर स्थित है, जिसे धर्मराज यमराज की उपस्थिति वाला स्थान माना जाता है

धार्मिक मान्यता है कि इस स्थान पर किए गए कर्मकांड से मृतात्माओं को मोक्ष प्राप्त होता है और वे जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। यहां के पुरोहितों के पास महाभारत काल से जुड़ी हुई वंशावलियां सुरक्षित हैं, जिनके आधार पर वे पीढ़ियों से श्राद्ध कर्म करवाते आ रहे हैं।

Pitru Paksha special: Shraddha is also related to Mahabharata on the basis of genealogy even today in Pihova

महाभारत में उल्लेख है कि ‘पुण्यामाहु कुरुक्षेत्र कुरुक्षेत्रात्सरस्वती, सरस्वत्माश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथुदकम्’ अर्थात कुरुक्षेत्र नगरी पवित्र है, सरस्वती तीर्थ उससे भी पवित्र है और पृथूदक अर्थात वर्तमान पिहोवा इन सबमें सर्वश्रेष्ठ है।

🧾 वंशावली आधारित श्राद्ध की परंपरा

  • पिहोवा के लगभग 250 तीर्थ पुरोहितों के पास वंशावली बहियाँ हैं, जिनमें गुरुनानक देव जी, महाराजा रणजीत सिंह, और कई फिल्मी हस्तियों के पूर्वजों का विवरण दर्ज है
  • श्रद्धालु जब यहां श्राद्ध करने आते हैं, तो पुरोहित उनकी पारिवारिक बहियों से पूर्वजों का नाम, हस्ताक्षर और इतिहास दिखाते हैं
  • यह परंपरा बंटवारे के बाद बिछड़े परिवारों को जोड़ने में भी सहायक रही है

वामन पुराण में कहा गया है कि गंगा, यमुना, नर्मदा और सिंधु चारों नदियों के स्नान का फल अकेले पिहोवा में ही प्राप्त हो जाता है।

माना जाता है कि सरस्वती नदी का जल पीने से मोक्ष मिलता है और यदि कोई व्यक्ति बारह माह तक इसका सेवन करता है तो उसे देवगुरु बृहस्पति जैसी विद्या और शक्ति प्राप्त होती है। इसी तीर्थ में राजा ययाति ने सौ यज्ञ किए थे।

धार्मिक मान्यता यह भी है कि जो साधक यहां सरस्वती सरोवर के तट पर जप करते हुए देह त्याग करता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करता है।

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ऐसा कहा जाता है कि गंगा के जल में अस्थि प्रवाह से मुक्ति होती है और काशी में मृत्यु होने से मोक्ष प्राप्त होता है, किंतु पिहोवा तीर्थ की महत्ता इससे भी अधिक है।

मान्यता है कि यहां जल, स्थल या आकाश किसी भी माध्यम से मृत्यु होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इसे गंगा द्वार से भी अधिक पवित्र और प्रभावी तीर्थ माना गया है। पुराणों के अनुसार, इस तीर्थ की रचना स्वयं प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि के आरंभ में की थी।

पृथुदक शब्द का संबंध महाराजा पृथु से जोड़ा जाता है, जिन्होंने अपने पिता का श्राद्ध यहीं किया था। महाभारत के अनुसार, ब्रह्माजी ने पिहोवा की आठ कोस भूमि पर बैठकर सृष्टि की रचना की थी। गंगा पुत्र भीष्म पितामह की सद्गति भी यहीं पृथुदक में हुई थी।

🗣️ स्थानीय मान्यता और श्रद्धा

  • ऐसा माना जाता है कि अगर कोई व्यक्ति गया जी में पिंडदान करने जाता है, तो उसे पहले पिहोवा में पृथुदक बेदी की पूजा करनी चाहिए
  • यहां श्राद्ध करने से पितरों को विशेष शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है
  • पितृ पक्ष के दौरान यहां हजारों श्रद्धालु देशभर से आते हैं

महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर लाखों अकाल मृत्यु प्राप्त लोगों की आत्मा को लेकर चिंतित थे। उन्होंने जब यह चिंता श्रीकृष्ण को बताई, तब श्रीकृष्ण ने पिहोवा में सरस्वती तीर्थ पर दीपक जलाया।

युधिष्ठिर ने उस दीपक में तेल अर्पित किया ताकि मृत आत्माओं की शांति हो सके। आज भी उस दीपक में तेल चढ़ाने की परंपरा जारी है और श्रद्धालु अकाल मृत्यु प्राप्त आत्माओं की मुक्ति के लिए तेल अर्पित करने आते हैं।

पिहोवा का कार्तिकेय मंदिर भी प्रसिद्ध है। यहां की मान्यता है कि स्त्रियां इस मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं। लोगों का मानना है कि यदि कोई स्त्री यहां प्रवेश करती है तो उसे सात जन्मों तक विधवा होना पड़ता है।

एक कथा के अनुसार, जब कार्तिकेय ने क्रोधित होकर अपना मांस और रक्त अग्नि को अर्पित कर दिया, तब भगवान शंकर ने उन्हें पिहोवा जाने का आदेश दिया। वहां ऋषि-मुनियों ने उनके ज्वलंत शरीर पर सरसों का तेल अर्पित किया। उसी समय से यहां कार्तिकेय पिंडी रूप में विराजमान हैं और तेल चढ़ाने की परंपरा चल रही है।

लोग मानते हैं कि पिहोवा में प्रेतबाधा और अकाल मृत्यु से उत्पन्न दोषों का निवारण होता है। यहां श्राद्ध और पिंडदान करने से मृतक को सद्गति मिलती है।

वामन पुराण के अनुसार, भगवान शंकर ने भी पिहोवा में स्नान किया था। यही कारण है कि आज भी देशभर से श्रद्धालु यहां आते हैं और पंडों तथा पुरोहितों की देखरेख में श्राद्ध कर्म संपन्न करते हैं।

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