वाराणसी। पितरों की आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किया गया अर्पण श्राद्ध कहलाता है। पितृपक्ष के दिनों में अपनी सामर्थ्य के अनुसार पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण एवं दान-पुण्य अवश्य करना चाहिए। पितृपक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से आरम्भ होकर अश्विन अमावस्या तक चलता है।
इन दिनों अपने पितरों की मृत्यु तिथि पर पिण्डदान, तर्पण, ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र, फल-मिष्ठान्न सहित दक्षिणा दान करना तथा गरीबों को भोजन कराना अनिवार्य माना गया है। कहा जाता है कि जितना दान किया जाता है, उतना ही पितरों तक पहुँचता है।
श्राद्ध से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होकर मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है तथा पितर प्रसन्न होकर आरोग्य, धन, संपदा और मोक्ष सहित विविध सुखों का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

पंडित श्री मनोज कृष्ण शास्त्री ने बताया कि किसी परिजन की मृत्यु जिस तिथि को हुई हो, उसका श्राद्ध उसी तिथि को किया जाता है। जिनकी अकाल मृत्यु (दुर्घटना या आत्महत्या) हुई हो, उनका श्राद्ध चतुर्दशी को किया जाता है।
साधु-संत और संन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी को किया जाता है। जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है, जिसे सर्वपितृ श्राद्ध कहा जाता है।
पितृपक्ष श्राद्ध की तिथियां (सन् 2025)
पूर्णिमा श्राद्ध – 07 सितम्बर (रविवार) : दोपहर 12:50 बजे से पहले कर लें क्योंकि इसी दिन दोपहर 12:57 बजे से चंद्रग्रहण का सूतक काल प्रारंभ हो जाएगा।
प्रतिपदा श्राद्ध – 08 सितम्बर (सोमवार)
द्वितीया श्राद्ध – 09 सितम्बर (मंगलवार)
तृतीया श्राद्ध – 10 सितम्बर (बुधवार)
चतुर्थी श्राद्ध – 10 सितम्बर (बुधवार)
पंचमी श्राद्ध – 11 सितम्बर (गुरुवार), दोपहर 12:46 के बाद
षष्ठी श्राद्ध – 12 सितम्बर (शुक्रवार)
सप्तमी श्राद्ध – 13 सितम्बर (शनिवार)
अष्टमी श्राद्ध – 14 सितम्बर (रविवार)
नवमी श्राद्ध – 15 सितम्बर (सोमवार)
दशमी श्राद्ध – 16 सितम्बर (मंगलवार)
एकादशी श्राद्ध – 17 सितम्बर (बुधवार)
द्वादशी श्राद्ध – 18 सितम्बर (गुरुवार)
त्रयोदशी श्राद्ध – 19 सितम्बर (शुक्रवार)
चतुर्दशी श्राद्ध – 20 सितम्बर (शनिवार)
अमावस्या (सर्वपितृ श्राद्ध एवं पितृ विसर्जन) – 21 सितम्बर (रविवार)
विशेष नोट : अश्विन कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 10 सितम्बर को दोपहर 03 बजकर 39 मिनट से लेकर उसी दिन शाम 04 बजकर 07 मिनट तक अपराह्न काल में स्पर्श कर रही है। इसलिए चतुर्थी का पार्वण श्राद्ध 10 सितम्बर (बुधवार) को ही होगा, क्योंकि 11 सितम्बर को चतुर्थी तिथि अपराह्न से पहले ही समाप्त हो रही है।
इसी प्रकार तृतीया तिथि का श्राद्ध भी 10 सितम्बर (बुधवार) को ही होगा, क्योंकि तृतीया तिथि दोपहर 01 बजकर 39 मिनट से 03 बजकर 39 मिनट तक अपराह्न काल में व्याप्त है।
श्राद्ध पूजा की सामग्री : पलाश के पत्ते, कुशा, रोली, सिंदूर, फल, मिष्ठान्न, लौंग, इलायची, सुपारी, रक्षा सूत्र, चावल, जनेऊ, कपूर, हल्दी, देसी घी, शहद, काला तिल, तुलसी पत्ता, पान पत्ता, जौ, हवन सामग्री, गुड़, मिट्टी का दीया, रुई की बत्ती, अगरबत्ती, दही, जौ का आटा, गंगाजल, दक्षिणा, खजूर, केला, सफेद पुष्प, उड़द, गाय का दूध, खीर, शक्कर, वस्त्र, स्वांक का चावल, मूंग, पुष्प, गन्ना।
यदि किसी कारणवश श्राद्ध कर्म संपन्न न हो सके, तो पितरों की तृप्ति हेतु श्राद्ध तिथि के दिन यथाशक्ति अन्न-राशि, वस्त्र अथवा दक्षिणा ब्राह्मणों एवं दीन-दुखियों को अर्पित करनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति श्राद्ध विधि करने में समर्थ न हो, तो पितरों के निमित्त श्रद्धा- भावपूर्वक तिलजल या जलांजलि अर्पित करने मात्र से भी पितृगण संतुष्ट हो जाते हैं।
ज्योतिर्विद रत्न वास्तु दैवज्ञ
पंडित मनोज कृष्ण शास्त्री
मो. 99938 74848
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