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पितृपक्ष विशेष : ‘श्रद्धया इदं श्राद्धम्‌’ और गयाजी धाम

पितृपक्ष में श्राद्धकर्म और गयाजी धाम

श्रीराम पुकार शर्मा हावड़ा। ‘श्रद्धया इदं श्राद्धम्‌’ अर्थात, जो कार्य श्रद्धाभाव से किया जाय, वही ‘श्राद्ध’ है। सनातन हिन्दू धर्म में ‘पितृ पक्ष’ को अन्य धार्मिक त्योहारों की भाँति ही विशेष महत्व प्रदान किया गया है। इसे ‘श्राद्ध पक्ष’ भी कहा जाता है। प्रेत और पितर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक, जो तर्पण अर्पित किया जाए, वह ‘श्राद्ध’ है। हमारे धर्म व संस्कृति में माता को धरती से भी भारी, तो पिता को आसमान तुल्य विराट माना गया है। अतः उन्हें ईश्वर के समतुल्य विशिष्ट स्थान प्रदान किया गया है । हिंदू धर्म संगत शास्त्रों-पुराणों में पितरों (मृत परिजनों) को उद्धार करने के लिए पुत्र या उसके समकक्ष पारिवारिक पात्र द्वारा, उनकी श्राद्ध-सेवा को अनिवार्य बताया गया है।

भरत जी के द्वारा पिता महाराज दशरथ के मरणोपरांत ‘दशगात्र विधान’ (मृत्यु के बाद 10 दिनों तक चलने वाली धार्मिक प्रक्रिया) का उल्लेख महर्षि बाल्मीकि के “रामायण” में और उसी के अनुरूप धार्मिक तथा सांस्कृतिक मर्यादवादी गोस्वामी तुलसीदास ने अपने “श्रीरामचरितमानस” में भी ‘भरत कीन्हि दशगात्र विधाना’ कह कर किया है, जबकि श्रीराम के द्वारा अपने पिता दशरथ को चित्रकूट में मंदाकिनी नदी के तट पर और वीर जटायु को गोदावरी नदी के तट पर जलांजलि देते हुए तर्पण करने का उल्लेख कई शास्त्रों में है।

हमारे सनातन धर्म-दर्शन के अनुसार, जिसका भी जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु परम निश्चित है। तत्पश्चात, उसके कर्मों के अनुकूल ही उसका पुनर्जन्म भी निश्चित है। कुछ ही दिव्यात्माएँ होती हैं, जिन्हें ‘मोक्ष’ की प्राप्ति हो जाती है और फिर वे जन्म-मरण के बंधनों से सर्वदा के लिए मुक्त हो जाती हैं। ऐसे व्यक्ति या परिजन, जो इस धरती पर जन्म लेने के बाद जीवित नहीं है, उन्हें ही ‘पितर’ कहा जाता है। ये विवाहित, अविवाहित, बच्चा, बुजुर्ग, स्त्री, पुरुष कोई भी हो सकते हैं। ‘पितरों’ की आत्मा की शांति के लिए भाद्रपद महीने के पितृ पक्ष में उनको तर्पण किया जाता है। पितृ पक्ष की समाप्ति के साथ ही सभी ‘पितर’ पृथ्वीवासी अपने सभी परिजनों को नित्य उत्कर्ष का आशीर्वाद देते हुए, वापस यमलोक गमन करते हैं।

भारतीय आध्यात्मिक शास्त्रों के अनुसार, मनुष्य पर तीन प्रकार के विशेष ‘ऋण’ बताए गए हैं – पितृऋण, देवऋण तथा ऋषिऋण। जिनमें से ‘पितृऋण’ को ही सर्वोपरि माना गया है। ‘पितृऋण’ में पिता के अतिरिक्त माता तथा वे सब बुजुर्ग सम्मिलित हो जाते हैं, जिन्होंने हमें अपना जीवन धारण करने तथा उसको विकसित करने में, किसी न किसी तरह से अपना सहयोग दिया है। इसी तरह से ‘मत्स्य पुराण’ में तीन प्रकार के प्रमुख श्राद्ध बताये गए हैं, – नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य श्राद्ध।

मृत्यु के उपरांत भी, लोग अपने जन्मदाता माता-पिता सहित अपने ‘पितरों’ को विस्मृत न कर देवें, इसलिए प्रतिवर्ष उनका श्राद्ध करने का एक विशेष धार्मिक विधान बताया गया है। वह विशेष ‘श्राद्ध’ भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन के अमावस्या तक किया जाता है, जिसे ‘पितृ पक्ष’ भी कहा जाता है। इन दिनों हम अपने ‘पितरों’ की श्राद्ध-सेवा करते हुए, उनकी आत्मा की परम शांति और स्वर्गीय सुख की कामना करते हैं।

ऐसी मान्यता है कि यमराज भी ‘श्राद्ध पक्ष’ में आत्मा को अपने बंधन से मुक्त कर देते हैं, ताकि वे अपने जीवित परिजनों के पास जाकर उनका तर्पण-सेवा ग्रहण कर सकें। ‘पितृ पक्ष’ में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पितरों के लिए तर्पण किया जाता हैं। जिस तिथि को माता-पिता का देहांत हुआ होता है, पितृ पक्ष की उसी तिथि को उनका श्राद्ध-कर्म किया जाता है। यह एक तरह से ‘पार्वण श्राद्ध’ भी है, जो पितृ पक्ष के अमावास्या या फिर उनकी मृत्यु तिथि आदि पर किया जाने वाला श्राद्ध है और यह श्राद्ध ‘विश्वेदेवसहित’ होता है।

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आध्यात्मिक ग्रंथों के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक उसकी आत्मा अति सूक्ष्म और अगोचर रूप में हमारे इर्द-गिर्द या फिर घर-द्वार के आस-पास ही रहती है, जिसे ‘प्रेत’ भी कहा जाता है। उस समय भी उसके अन्दर मानवीय मोह, माया, भूख और प्यास का अतिरेक रहता है। परंतु सपिण्डन के बाद वह प्रेत, मानवीय अतिरेक से मुक्त होकर अपने पित्तरों में जाकर सम्मिलित हो जाता है।

जिस तिथि पर हमारे परिजनों की मृत्यु हुई होती है, उसी को ‘पितृ पक्ष’ में ‘श्राद्ध की तिथि’ कहा जाता है। उसी तिथि पर अपने पितरों को स्मरण कर तर्पण करना उचित माना गया है, परंतु बहुत से लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि की जानकारी न होने की स्थिति में आश्विन अमावस्या (महालया) या किसी भी अमावस्या को तर्पण करना भी उचित माना गया है। अपने-अपने तर्पण का भाग लेकर ‘पितर’ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पुनः उसी ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ वापस यमलोक चले जाते हैं।

महाभारत के ‘अनुशासन पर्व’ में उल्लेखित एक कथा के अनुसार माना जाता है कि महर्षि निमि ने सबसे पहले श्राद्ध की शुरुआत की थी और उन्हें श्राद्ध का उपदेश अत्रि मुनि ने दिया था। महर्षि निमि के बाद दूसरे महर्षि भी श्राद्ध कर्म करने लगे, जिसके बाद धीरे-धीरे इसका प्रचलन सनातनी मानव समाज में हो गया।

फिर जब बात आती है ‘श्राद्ध कर्म’ या ‘पिंडदान’ की, तब इसके लिए शास्त्रीय मान्यता और लोक आस्था के अनुसार, ‘सर्व विष्णुमयं जगत’ में गयाजी में भगवान नारायण के चरण, प्रयागराज (वेणीमाधव) तीर्थ में भगवान नारायण का हृदय व बदरीकाश्रम (ब्रह्मकपाली) तीर्थ में भगवान नारायण का सिर विद्यमान है। फलतः ये तीनों तीर्थ स्थानों में पितरों के श्राद्ध, तर्पण व पिंडदान का विधान है। उनके अलावे अन्य 55 विभिन्न स्थानों का भी नाम आता है। लेकिन उन सब में, बिहार राज्य में फल्गु नदी के किनारे स्थित प्राचीन नगर ‘गयाजी तीर्थ’ को सर्वोपरि माना गया है।

‘पितृतीर्थ गयाजी’ की कीर्तिकथा श्रीमद्भागवत, वायुपुराण, कूर्मपुराण, अग्निपुराण, गरुड़पुराण से लेकर रामायण और महाभारत तक सादर से गाई गई है। यहाँ पर भगवान विष्णु जी ने असुर गयासुर का वध किया था। तब से इस स्थान का नाम भारत के प्रमुख तीर्थस्थानो में प्रतिष्ठित है और बड़ी ही श्रद्धा भाव से इसे ‘गयाजी’ कहकर संबोधित किया जाता है । भारत में हीं नहीं, वरन सम्पूर्ण विश्व में ही ‘गयाजी धाम’ श्राद्ध-तर्पण हेतु विशेष प्रसिद्द और पवित्र स्थान माना गया है। गयाजी के ‘विष्णुपद मन्दिर’ जहाँ स्वयं भगवान विष्णु अपने चरण चिन्ह सहित सदैव मौजूद रहते हैं।

इसी तरह से गयाजी तीर्थ का माहात्म्य फल्गू नदी से ही महिमा मण्डित है, जो गयाजी के पूर्व दिशा में उतर-प्रवाहिनी है। फल्गू को गयाजी का प्रथम तीर्थ माना गया है। गयाजी पहुँचकर सर्वप्रथम फल्गू तीर्थ में ही श्राद्ध संपन्न होता है। इसे गयाजी का ‘शिरोभाग’ और ‘आभ्यंतर तीर्थ’ भी कहा जाता है। इसी फल्गु नदी में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने स्वयं अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध-पिंड दान किया था।

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इसके बाद कौरवों ने भी इसी स्थान पर अपने ‘पितरों’ का श्राद्ध कर्म किया था। गयाजी में ‘पिंडदान’ करने से जीवात्मा को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। अतः गयाजी को ‘मोक्ष की भूमि’ भी कहा गया है। यहाँ पिंडदान करने से व्यक्ति ‘पितृऋण’ से मुक्त हो जाता है। यहाँ पर पितृ पक्ष के दौरान हर साल एक विराट मेला का आयोजन होता है, जिसे ‘पितृपक्ष मेला’ कहा जाता है, जिसमें देश-देशान्तर से लाखों लोग शामिल होते हैं और अपने ‘पितरों’ को श्राद्ध तर्पण किया करते हैं।

गयाजी में बालू से निर्मित ‘पिंडदान’ करने का भी महत्व वाल्‍मीक‍ि रामायण में वर्णित है। उसके अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण पिंडदान करने के लिए गयाजी धाम पहुँचे थे। भगवान राम अपने अनुज लक्ष्मण सहित श्राद्ध कर्म हेतु आवश्यक सामग्री लेने नगर की ओर चले गए, तभी आकाशवाणी हुई कि पिंडदान का समय निकला जा रहा है। ऐसे में माता सीता को राजा दशरथ ने दर्शन दिए और पिंडदान के लिए कहा। सीता माता भला क्या करतीं? उन्होंने ‘पिंडदान’ संबंधित वस्तुओं के बदले फल्गु नदी, वटवृक्ष, केतकी के फूल, कौआ और गाय को साक्षी मानकर फल्गु नदी के ही बालू से पिंड बनाकर, फल्गु नदी के किनारे ‘पिंडदान’ कर दिया। ‘पिंडदान’ से राजा दशरथ की आत्मा को शांति मिली और वे आशीर्वाद देकर बैकुंठ गमन किए।

मान्यता है, तभी से गया में फल्गु नदी के तट पर बालू का ‘पिंडदान’ देने की परंपरा चल पड़ी है, जो आज भी अनवरत प्रचलित है। गयाजी के फल्गु नदी में ‘बालुका पिंडदान’ का महत्व चावल के ‘पिंडदान’ के बराबर ही माना गया है। वैसे तो ‘श्राद्धकर्म’ हेतु ‘पिंडदान’ का शास्त्रीय समय ‘पितृपक्ष’ निश्चित है, परंतु विविध धार्मिक शास्त्रों में ‘गया सर्वकालेषु पिण्डं दधाद्विपक्षणं’ कहकर गयाजी में सदैव ‘पिंडदान’ करने की धार्मिक अनुमति दे दी गई है।

गयाजी शहर में फल्गु नदी के किनारे भगवान विष्णु जी को समर्पित ‘विष्णुपद मंदिर’ स्थित है। इसमें भगवान विष्णु के 13 इंच लंबा पद चिन्ह है। शताब्दियों पहले यहाँ पर एक छोटा-सा मंदिर हुआ करता था। सन् 1766-1787 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। इस मंदिर की ऊँचाई लगभग 100 फुट है, जिसमें 58 वर्ग फुट का मंडप बना हुआ है। मंदिर का शिखर, पत्थरों की नक्काशी और चरण पादुका अत्यंत दर्शनीय हैं । मंदिर के शीर्ष पर स्वर्ण-ध्वज-कलश स्थापित है, जिसे बहुत दूर से ही देखा जा सकता है।

गयाजी शहर से उत्तर-पश्चिम में लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर लगभग 950-975 फीट की ऊँचाई वाला ‘प्रेतगिरि’ नामक एक पर्वत है। इसकी चोटी पर ‘प्रेतशिला’ नाम की वेदी स्थित है। वहाँ तक, लगभग 400 सीढ़ियाँ चढ़कर लोग, प्रेतशिला-वेदी पर पिंडदान करने के लिए जाया करते हैं। प्रेतगिरि पर्वत की चरण-भूमि पर ‘ब्रह्मकुंड’ नामक एक तालाब और उसके किनारे शिव मंदिर है। कुछ लोग इसी ब्रह्मकुंड के किनारे भी, अपने पितरों के श्राद्धकर्म को करते हैं। हिंदू संस्कारों में पंचतीर्थ वेदी में प्रेतशिला की भी गणना की जाती है। इसके अलावे गयाजी के वैतरणी, सीताकुंड, नागकुंड, पांडुशिला, रामशिला, मंगलागौरी, कागबलि आदि स्थानों में भी पिंडदान किए जाते हैं।

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‘पितृ पक्ष’ में कौआ को भी विशेष महत्व प्रदान किया गया है। माना जाता है कि श्राद्ध के पितृ-पक्ष के दिनों में हमारे ‘पितर’ कौवों के रूप में नियत तिथि पर हमारे पास पधारते हैं और जल-अन्न ग्रहण करते हैं। यही वजह है कि श्राद्ध का प्रथम अंश कौओं को दिया जाता है। इसी तरह माना गया है कि आपके पितर चीटियों के रूप में अपने वशंजों से मिलने आते हैं। इसीलिए पंचबलि भोग को गाय, कुत्ते, कौए, देव और चीटियों के लिए अलग-अलग पत्तलों में निकाला जाता है। इनके भोग ग्रहण करने पर ‘पितरों’ को अन्न प्राप्त हो जाता है । श्राद्ध का भोजन सात्विक होना चाहिए। इसमें शुद्धता को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
(7 सितंबर से 21 सितंबर, 2025, पितृपक्ष विशेष)

श्रीराम पुकार शर्मा,
अध्यापक व स्वतंत्र लेखक
ई-मेल सूत्र – rampukar17@gmail.com

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