अशोक वर्मा “हमदर्द”, कोलकाता। भारत एक ऐसा देश है, जहाँ विविधता उसकी पहचान है और यही विविधता उसकी शक्ति भी रही है। अनेक भाषाएँ, वेशभूषा, खान-पान और संस्कृति भारत की आत्मा में बसती है। परंतु यही विविधता, यदि असावधानी से संभाली जाए या दुर्भावनापूर्ण मंशा से भड़काई जाए, तो यह राष्ट्र के लिए विघटनकारी बन सकती है।
हाल के वर्षों में भाषाई अस्मिता के नाम पर जो आंदोलन, बहसें और टकराव उभर कर आए हैं, वे केवल सामान्य असहमति नहीं हैं – उनमें एक गहरी राजनीतिक चाल, विभाजनकारी सोच और सुनियोजित षड्यंत्र की गंध साफ दिखाई देती है। यह एक ऐसा चक्र है, जिसे यदि समय रहते न रोका गया, तो भारत को फिर से खंड-खंड करने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो भारत को कई बार टुकड़ों में बाँटने की कोशिश की गई है – धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर, और अब भाषा के नाम पर। यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि भारत की एकता केवल राजनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक चेतना से बंधी हुई है, जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के भाव से प्रेरित रही है। जब कोई राष्ट्र अपने ही आंतरिक स्तंभों को तोड़ने लगे – जैसे भाषा, धर्म, जाति – तो उसकी आत्मा घायल हो जाती है और यही भारत विरोधी शक्तियों का प्रमुख उद्देश्य है।
भाषा का प्रश्न भारत में नया नहीं है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन एक राजनीतिक आवश्यकता बन चुकी थी। यह कार्य इसलिए किया गया ताकि प्रशासनिक कार्य सुगम हो और लोग अपनी मातृभाषा में संवाद कर सकें। परंतु उस समय भी यह आशंका प्रकट की गई थी कि कहीं भाषा के नाम पर अलगाववादी भावनाएँ जन्म न ले लें।
दुर्भाग्यवश, आज वह आशंका कई राज्यों में साकार होती दिख रही है। कोई हिंदी के विरोध में उतर आया है, कोई बंगाली अस्मिता की दुहाई देता है, कोई तमिल को ब्राह्मणवाद से जोड़कर प्रस्तुत करता है और कोई मराठी बनाम उत्तर भारतीयों की लड़ाई खड़ी करता है। प्रश्न यह है कि ये आवाज़ें अचानक इतनी मुखर क्यों हुई? क्या यह मात्र संयोग है या इसके पीछे कोई गहरी रणनीति है?
हमें यह समझना होगा कि भारत को बाहरी दुश्मनों से उतना खतरा नहीं जितना आंतरिक विघटन से है। और भाषा एक ऐसा मुद्दा है जिससे भावनाएं तीव्रता से जुड़ी होती हैं। यह वही मार्ग है जिस पर चलते हुए 1947 में हमें विभाजन का भयावह परिणाम देखना पड़ा। उस समय धर्म को केंद्र बनाकर देश को बाँटा गया, और आज भाषा को मोहरा बनाकर राष्ट्र की अखंडता को कमजोर करने का प्रयास हो रहा है।
भारत की सांस्कृतिक चेतना में ‘संस्कृत’ जैसी एक ऐसी भाषा थी जिसने सभी प्रांतों और भाषाओं को एक सूत्र में बाँध रखा था। वह किसी एक राज्य की नहीं थी, वह सम्पूर्ण भारतवर्ष की थी। कालांतर में हिंदी ने जनसंचार की एक साझा भाषा के रूप में भूमिका निभानी शुरू की, परंतु दुर्भाग्यवश उसे भी राजनीतिक रंग देकर खलनायक बना दिया गया। भारत में हिंदी का विरोध कोई भाषाई मुद्दा नहीं रहा, यह अब राजनीतिक अस्त्र बन गया है। इस हथियार का प्रयोग वे शक्तियाँ कर रही हैं जो नहीं चाहतीं कि भारत एक सशक्त राष्ट्र बने।
भाषा के नाम पर उपजे विवादों को जब ध्यानपूर्वक देखा जाए, तो यह प्रतीत होता है कि यह सिर्फ प्रशासनिक या भावनात्मक प्रश्न नहीं हैं, बल्कि यह एक साजिश है, एक प्रयोगशाला में तैयार की गई योजना, जिसका उद्देश्य है – भारत को टुकड़ों में बाँटना। जिस प्रकार से सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया और राजनीतिक भाषणों में ‘हम बनाम वे’ की भाषा बोली जा रही है।
उससे यह स्पष्ट होता है कि कहीं न कहीं यह आग लगाई जा रही है और फिर उसे हवा दी जा रही है। कुछ दल, जो वोट बैंक की राजनीति में डूबे हैं, वे इस विघटनकारी प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं, तो वहीं कुछ अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियाँ, जो भारत की प्रगति से भयभीत हैं, वे इस विभाजन को पोषण दे रही हैं।
भारत के जो राज्य अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करते थे, अब वहां के कुछ वर्ग ‘हिंदी हटाओ’, ‘उत्तर भारतीय भगाओ’, ‘दिल्ली का शासन नहीं चाहिए’ जैसी बातें कहने लगे हैं। क्या यह सहज रूप से उत्पन्न हुआ जन-संकल्प है, या फिर इस सोच को किसी ने पाला-पोसा है?
हमें यह मानने से इंकार नहीं करना चाहिए कि एक विशेष अंतर्राष्ट्रीय लॉबी लगातार यह प्रयास कर रही है कि भारत आंतरिक रूप से कमजोर हो, जिससे वह वैश्विक मंच पर चीन या अमेरिका जैसे देशों की चुनौती न बन पाए। और इस लॉबी का सबसे प्रभावशाली हथियार बन चुका है – भाषा आधारित असंतोष।
भारत की शिक्षा नीति में जो नई रूपरेखा लाई गई है, उसमें मातृभाषा को प्राथमिकता दी गई है। यह स्वागत योग्य निर्णय है, परंतु इसे भी कुछ तत्वों द्वारा ‘हिंदी थोपने’ के रूप में प्रचारित किया गया। यही भ्रम फैलाना इस योजना का मूल उद्देश्य है। लोग यह भूल जाते हैं कि यदि कोई बच्चा अपनी भाषा में सोचता है, पढ़ता है, तो उसका सर्वांगीण विकास होता है, परंतु इसका मतलब यह नहीं कि एक भाषा को दूसरी के विरुद्ध खड़ा कर दिया जाए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भाषाओं के बीच द्वंद्व नहीं, संवाद की स्थिति उत्पन्न करें। एक बंगाली हिंदी सीखे तो उसका अपमान नहीं, उत्साह होना चाहिए। एक तमिल छात्र यदि संस्कृत पढ़ना चाहता है, तो उसमें कोई खतरा नहीं, अपितु समृद्धि है। पंजाबी यदि गुजराती में रुचि दिखाए, तो वह एकता की मिसाल होनी चाहिए, न कि संदेह का कारण। लेकिन इन सभी स्वाभाविक संवादों को अब “राजनीतिक षड्यंत्र” का नाम देकर तोड़ा जा रहा है और यह सब इसलिए ताकि हिंदू समाज, जो विविधताओं में एकता का आदर्श है, वह आपस में ही उलझा रहे।
यह भी विचारणीय है कि इन भाषाई टकरावों का लाभ किन्हें मिल रहा है। यह देखना महत्वपूर्ण है कि जब-जब भारत राष्ट्रीय एकता की दिशा में आगे बढ़ता है, जब-जब राम मंदिर का निर्माण होता है, जब-जब कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया जाता है, जब-जब नागरिकता कानून में संशोधन होता है, तभी क्यों देश में भाषाई, जातीय और प्रांतीय आंदोलनों को हवा दी जाती है?
यह संयोग नहीं है। यह पूरी तरह एक रणनीति का हिस्सा है। इन टकरावों के कारण न केवल राष्ट्रीय ऊर्जा व्यर्थ होती है, बल्कि विकास की रफ्तार भी धीमी हो जाती है। उद्योगों का निवेश घटता है, राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है, और अंततः इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है।
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत के विरुद्ध जो भी षड्यंत्र रचे गए हैं, उनका मूल उद्देश्य सदैव यही रहा है – हिंदुओं को विभाजित करो, उन्हें जाति, क्षेत्र, भाषा और उपासना पद्धति के नाम पर बाँटो। इस पूरे षड्यंत्र में भाषा अब एक नया मोर्चा बन चुकी है। भारत के हिंदू जब तक एकसूत्र में बंधे रहते हैं, तब तक उन्हें कोई तोड़ नहीं सकता। इसीलिए उनकी एकता को खंडित करने के लिए नित नए प्रयोग किए जा रहे हैं। और दुर्भाग्य से इस प्रयोग में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी, मीडिया संस्थान और राजनैतिक दल शामिल हैं।
भारत को चाहिए कि वह इस खेल को समय रहते समझे। इसके लिए सबसे पहले आवश्यक है कि इस पूरे मामले की गहन जांच हो। यह केवल एक सांस्कृतिक विषय नहीं है, यह राष्ट्र की सुरक्षा और अस्मिता का प्रश्न है। देश के खुफिया तंत्र को, नीति-निर्माताओं को, और मीडिया को यह देखना होगा कि क्या वास्तव में भारत को भाषाओं के नाम पर तोड़ने की कोई वैश्विक योजना संचालित की जा रही है?
क्या यह एक नया “ब्रेक इंडिया प्रोजेक्ट” है जिसमें विदेशी फंडिंग के द्वारा प्रांतों में अलगाववादी विचारों को जन्म दिया जा रहा है? क्या यह भारत के राज्यों को ‘अलग राष्ट्र’ की मानसिकता में ढालने का प्रयास है?
इस प्रश्न का उत्तर हम तभी दे पाएंगे जब हम खुद जागरूक होंगे, सतर्क होंगे और इस आग को फैलने से रोकेंगे। भाषाओं को लेकर गर्व की भावना होनी चाहिए, परंतु वह गर्व कभी घृणा में न बदले, यह देखना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। हिंदी भारत की आत्मा है, परंतु वह तमिल, बंगाली, मराठी या तेलुगू की विरोधी नहीं है – वह उन सबकी बहन है। यदि यह चेतना हम सबमें जाग्रत हो जाए, तो कोई भी शक्ति हमें बाँट नहीं सकती।
भारत को एक रखना है तो भावनाओं को नहीं, विवेक को आगे रखना होगा। भाषा कोई दीवार नहीं, सेतु बने- यही हमारी संस्कृति की शिक्षा है। और यदि कोई उस सेतु को तोड़ने की साजिश कर रहा है, तो उसे उजागर करना ही राष्ट्रधर्म है।
(स्पष्टीकरण : इस आलेख में दिए गए विचार लेखक के हैं और इसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है।)

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