विनय कुमार, कोलकाता | 04, दिसंबर, 2025 : तटीय कर्नाटक और कासरगोड के घने जंगलों में सदियों से एक परंपरा सांस लेती है—जहां देवता इंसानों से संवाद करते हैं, और इंसान देवताओं की भाषा समझते हैं।
और यही संवाद आज ‘कांतारा’ फिल्म के बाद देश दुनिया के जनमानस में चर्चाओं का विषय बना हुआ है।
यह परंपरा है पंजुरली दैव (Panjaruli Daiva) और गुलिगा दैव (Guliga Daiva) की लेकिन इन पात्रों का वास्तविक इतिहास क्या है? लोग इन्हें किस रूप में मानते हैं?

इन दैवी अनुष्ठानों में ऐसा क्या है, जिसे आज तक रहस्य माना जाता है? आइये विस्तार जानते है इस रिपोर्ट में –
● इतिहास: जंगलों की ‘रक्षा’ के देवता
पंजुरली का इतिहास कर्नाटक के भूताराधना (Bhootaradhane) या दैवत पूजन से जुड़ा है। माना जाता है कि पंजुरली असल में वराह (सूअर) के रूप में प्रकट हुए वन-रक्षक दैव हैं।
किवदंतियों में बताया गया है कि भगवान विष्णु के वराह अवतार ने जब पृथ्वी को बचाया, तो उनके ‘वराह’ रूप से उत्पन्न कई रक्षक आत्माओं को जंगल, खेती और गांवों की रक्षा का दायित्व मिला।
- इन्हें ‘पंजुरली दैव’ कहकर पुकारा गया — पंजुरली यानी जंगलों का रक्षक, फसलों का संरक्षक।
- यह मान्यता सदियों से तुलु भाषा बोलने वाले समुदायों में चली आ रही है।
दूसरी ओर, गुलिगा की उपस्थिति अपेक्षाकृत कठोर, रहस्यमयी और डरावनी मानी जाती है। लोककथाओं में गुलिगा को अक्सर शिव या शनि के उग्र रूप का प्रतिनिधि माना गया है — एक ऐसा देवता जो न्याय करता है, और गलत करने वालों को दंड भी देता है।
● कैसे शुरू हुई आस्था:
यह परंपरा किसी राजा या महंत द्वारा शुरू नहीं की गई। यह जनजातीय समुदायों की जैविक मान्यता के रूप में पैदा हुई — जहाँ जंगल सिर्फ संसाधन नहीं बल्कि जीवित ‘दैव’ माने गए।
लोगों का विश्वास है कि—यदि गांव में सूखा पड़े फसल बर्बाद हो जाए, जानवरों पर संकट आए, या जंगल का अपमान किया जाए तो पंजुरली को ‘कूपित’ माना जाता है, और विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं।
कोड्लिपेट गाँव के पूर्व सरपंच शिवा नायक (65) बताते है, “मेरे दादा के ज़माने से यही चलता आ रहा है। 1984 में हमारे गाँव में चोरी हुई थी। गुलिगा दैव ने एक ही रात में चोर का नाम बता दिया। सुबह पुलिस आई तो चोरी का सामान उसी के घर से मिला। हम आज भी कोर्ट से पहले दैव के पास जाते हैं।”
गुलिगा दैव की पूजा तब की जाती है जब न्याय चाहिए — पुराने विवाद हों, भूमि पर झगड़ा हो, या कोई सामाजिक अन्याय हुआ हो। गुलिगा को “सत्य का साक्षी” भी कहा जाता है।
- भूताराधना परंपरा की जड़ें
यह पूजा द्रविड़ जनजातीय परंपरा का हिस्सा है, जो ब्राह्मणिक हिंदू धर्म से पहले की है। पुरातात्विक और मानवशास्त्रीय अध्ययनों में इसे 8वीं-9वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक ले जाया जाता है। (संदर्भ: “Spirit Possession in South India”, Prof. Heleena Basu, 2014)
जब देवता सचमुच “बोलते” हैं
हर साल अप्रैल-जून के बीच दक्षिण कन्नड़, उडुपी और कासरगोड में 4,000 से 5,000 कोला आयोजित होते हैं। (Source : कर्नाटक जनपद अकादमी आर्काइव, 2023) प्रक्रिया:
- कलाकार (मुख्यतः बिल्लवा, पंबदा, नलिके समुदाय) महीनों सात्विक जीवन जीते हैं।
- रात 9 बजे से सुबह 6 बजे तक ढोल-चेंडे, मशाल और ताड़ी के बीच नृत्य।
- ट्रांस की अवस्था में कलाकार की आवाज़, चाल और व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है।
- लोग दैव से सीधे सवाल पूछते हैं — ज़मीन विवाद, बीमारी, सूखा, चोरी। दिए गए निर्णय गाँव में अंतिम माने जाते हैं।
वैज्ञानिक व्याख्या: लंबी साधना, हाइप्नोटिक ड्रम बीट्स (120-140 bpm) और सामूहिक ऊर्जा मिलकर डिसोसिएटिव ट्रांस स्टेट पैदा करती है — जो नकली करना लगभग असंभव है। (संदर्भ: “Ritual Trance in South Kanara”, Dr. Peter J. Claus, 1975 & 2021 अपडेट)
● अनुष्ठान: जब देवता ‘मनुष्य’ के शरीर में उतरते हैं
कांतारा में दिखाया गया दृश्य पूरी तरह कल्पना नहीं है। तटीय कर्नाटक में हर वर्ष भव्य ‘भूत कोला’ या ‘दैवत नृत्य’ आयोजित किया जाता है। इसमें होता क्या है?
- अनुष्ठानिक कलाकार महीनों तक उपवास, तपस्या और साधना करते हैं।
- विशेष वेशभूषा — मुकुट, चेहरे पर रंग, भारी आभूषण — सब पारंपरिक तरीके से तैयार किए जाते हैं।
- मंत्रोच्चार, ढोल, ताशा, अग्नि और नृत्य के बीच माना जाता है कि दैव उस कलाकार के शरीर में ‘अधिष्ठित’ हो जाता है।
स्थानीय शिक्षिका और भक्त लक्ष्मी (42 वर्ष) बताती है, “लोग बाहर से आकर कहते हैं अंधविश्वास। लेकिन जब उनकी बेटी की शादी टूटने वाली होती है और गुलिगा दैव एक रात में सारी गुत्थी सुलझा देते हैं, तो वही लोग अगले साल सबसे पहले चढ़ावा चढ़ाने आते हैं।”
यही कारण है कि ग्रामीण आज भी दैव के सामने झुककर प्रश्न पूछते हैं — जमीन का झगड़ा कैसे सुलझेगा? घर में संकट क्यों है? बारिश क्यों नहीं हो रही? और दैव की ओर से कलाकार उत्तर देता है। ग्रामीण मानते हैं कि उस समय कलाकार बोल नहीं रहा — दैव बोल रहा है।
● क्या है रहस्य? दैव के ‘स्वर’ की वैज्ञानिक और धार्मिक व्याख्या
इस परंपरा का सबसे रहस्यमय पहलू है कि अनुष्ठान के दौरान कलाकार की आवाज, भाषण और व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है। जनता की धारणा:
- यह दैवी प्रवेश है
- देवता द्वारा दिया गया ज्ञान
- न्याय और सत्य का दैवी संदेश
“पंजुरली और गुलिगा तुलु पाद्दणों के सबसे पुराने दैव हैं। इनकी कथाएँ 8वीं-9वीं शताब्दी की हैं। ये केवल देवता नहीं, सामुदायिक न्याय और पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक हैं। पंजुरली जंगल का रक्षक है, गुलिगा न्याय का। दोनों मिलकर तुलुनाडु का संतुलन बनाए रखते हैं।” – प्रो. चिन्नप्पा गौड़ा, तुलु लोकसाहित्य विशेषज्ञ, मंगलुरु विश्वविद्यालय (सेवानिवृत्त)
शोधकर्ताओं की धारणा: महीनों की साधना + रोल-प्ले + वातावराण से ट्रांस-स्टेट (समाधि जैसी अवस्था) बनती है। नृत्य और ढोल की आवृत्ति मनोवैज्ञानिक अवस्था बदल देती है लेकिन यह स्वीकार किया जाता है कि — इस ट्रांस को दोहराना या नकली तरीके से करना लगभग असंभव माना जाता है। इसीलिए गांव वाले इसे आज भी पवित्र मानते हैं।
डॉ. पीटर जे. क्लॉस, अमेरिकी मानवशास्त्री (50 साल से भूताराधना पर शोध कर रहे) बताते हैं- “मैंने 1974 में पहला कोला देखा था। जो ट्रांस स्टेट कलाकार में आती है, उसे नकली नहीं किया जा सकता। महीनों की साधना, ड्रम की 130-140 बीट्स प्रति मिनट, ताड़ी का नियंत्रित सेवन — ये सब मिलकर एक गहरी डिसोसिएटिव अवस्था बनाते हैं। लेकिन स्थानीय लोग इसे दैवीय प्रवेश ही मानते हैं, और यह उनकी सामाजिक व्यवस्था का आधार है।”
● सामाजिक प्रभाव: ‘कांतारा’ के बाद परंपरा की वापसी
फिल्म के रिलीज के बाद— भूत कोला देखने वालों की संख्या बढ़ी, कलाकारों और पुजारियों को सम्मान मिला, कई परंपराएँ जो खत्म होने की कगार पर थीं, उन्हें नया जीवन मिला, युवा पीढ़ी अपनी जड़ों के बारे में जानने लगी परंपरा को लेकर स्थानीय समुदायों का स्पष्ट संदेश है: यह कोई मनोरंजन नहीं, यह आस्था का प्रश्न है।
- कलाकारों की ज़ुबानी
विश्वनाथ पंबदा (38 वर्ष), तीसरी पीढ़ी के गुलिगा कलाकार “जब मैं गुलिगा बनता हूँ, मुझे कुछ याद नहीं रहता। सुबह लोग बताते हैं कि मैंने क्या-क्या कहा। एक बार मैंने किसी को थप्पड़ मारा था — बाद में पता चला उसने अपनी पत्नी को पीटा था। मुझे खुद अफ़सोस हुआ, लेकिन गाँववालों ने कहा — गुलिगा ने न्याय किया।”
अनिल बिल्लवा (29 वर्ष), नया पंजुरली कलाकार “कांतारा आने से पहले हम छिपकर करते थे। लोग शहर में कहते थे — ये जादू-टोना है। अब वही रिश्तेदार वीडियो मांगते हैं। पिछले साल मुझे दुबई से एक तुलु परिवार ने बुलाया — वहाँ भी कोला करवाया।”
● विवाद भी रहे हैं
कुछ समूहों ने चिंता जताई कि—
- फिल्मों में दैव परंपरा का व्यावसायीकरण हुआ
- असली रीतियों को तोड़-मरोड़ कर दिखाया गया
- कुछ जातिगत और सामाजिक संवेदनशीलताओं की अनदेखी हुई फिर भी, अधिकांश लोग मानते हैं कि चर्चा शुरू होना ही सबसे बड़ी जीत है।
● निष्कर्ष: जंगल, देवता और मानव — तीनों का एक पवित्र गठजोड़
पंजुरली और गुलिगा की परंपरा दक्षिण भारत की वह विरासत है, जहाँ जंगल को ईश्वर का घर माना गया और ईश्वर को गांव का रक्षक। आज भी दक्षिण कन्नड़-उडुपी में हर रात कहीं न कहीं कोई न कोई कोला चल रहा होता है। कांतारा चैप्टर 1 आने वाला है, जिसमें पंजुरली और गुलिगा का प्राचीन युद्ध दिखाया जाएगा।
गाँववाले कहते हैं — “फ़िल्म चाहे जितनी भी कमाल कर ले, असली पंजुरली-गुलिगा तो अभी भी हमारे जंगल में नाच रहे हैं।”
कांतारा सिर्फ एक फिल्म नहीं थी — यह उस “जीवित आस्था” का सिनेमाई संसार था, जो आज भी तटीय गांवों की सांसों में धड़कती है। जब तक तुलुनाडु के जंगल हैं, तब तक ये देवता भी रहेंगे। और जब तक ये देवता हैं, तब तक गाँवों में न्याय और आस्था का अपना एक अलग कोर्ट चलता रहेगा — बिना वकील, बिना फ़ाइल, सिर्फ़ ढोल की थाप और लाल मशालों के बीच।
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स्रोत (सत्यापित और प्रकाशित)
- The Hindu – “Bhoota Kola: A Sacred Ritual of Tulu Nadu”
- Deccan Herald – “Spirit worship in Coastal Karnataka: The world of Daiva and Guliga”
- Udupi Heritage Museum Notes – Documentation on Panjurli Daiva
- Kantara (2022) – Rishab Shetty Interviews on real Daiva inspirations
- Tuluva Culture Research Centre – Field notes on Bhoota Kola traditions
- Indian Express – “Decoding Panjurli: Kantara’s forest deity and its cultural roots”
- Times of India – Articles on Daiva Kola rituals in Tulunadu










