हिंदी साहित्य परिषद्, कर्नाटक इकाई के तत्वावधान में भव्य काव्यगोष्ठी का आयोजन

रीमा पांडेय, कोलकाता। हमारे राष्ट्रगान वन्देमातरम के रचयिता बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय जी की जयंती के शुभ अवसर पर हिंदी साहित्य परिषद् की कर्नाटक ईकाई के तत्वाधान में ईकाई के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ० रंजीत कुमार जी के संयोजन में आयोजित ऑनलाइन काव्य गोष्ठी, जिसका सिंहनाद था -“सामाजिक एवं राष्ट्रीय चेतना के स्वर” – 27 जून, 2021 को बड़ी ही धूम धाम से संपन्न हुई। कार्यक्रम का प्रारम्भ बिहार के राजीव नंदन मिश्रा ’नन्हे’ ने मंगलाचरण के साथ किया। इसके पश्चात बेंगलूरू की श्रीमती शिप्रा शगुन ने स्वरचित गणेश वन्दना प्रस्तुत कर कार्यक्रम का शंखनाद किया।

कार्यक्रम के संचालन का भार बड़ी ही कुशलता के साथ सम्भाला था डॉ० अर्चना त्रिपाठी ने। परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय शुक्ला ने परिषद् की गतिविधियों से अवगत करवाते हुए कहा कि – जब तक उत्तर भारत और दक्षिण भारत एक दूसरे का साहित्य नहीं पढेंगे तब तक दोनों क्षेत्रों के बीच की खाई को नहीं पाटा जा सकता। साहित्य ही एक ऐसा साधन है जिससे उत्तर और दक्षिण भारत को पुनः आपस में जोड़ा जा सकता है।

इसके पश्चात कार्यक्रम के संयोजक डॉ० रंजीत कुमार ने सभी आमंत्रित गणमान्य अतिथियों, कार्यकारिणी के सदस्यों एवं उपस्थित साहित्यकारों से सबका परिचय करवाते हुए, विशेष रूप से कैलिफोर्निया से जुड़ी श्रीमती मंजू मिश्र एवं बहरीन से जुड़ी श्रीमती अनुपम रमेश किंगर की साहित्यिक उपलब्धियों से परिषद् को अवगत करवाया साथ ही उन्होनें बाल चेतना पर आधारित साहित्य सृजन के लिए सभी से आग्रह भी किया।

इसके बाद डॉ० सूर्य बलि प्रसाद ने कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ० विनोद कुमार मिश्र, जो कि विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरिशस के महासचिव हैं, उनसे सभी का परिचय करवाया। डॉ० विनोद कुमार मिश्र जी ने बंकिम चन्द्र जी को याद करते हुए सभी से अतीत की श्रेष्ठता को वर्तमान में डालने का विशेष आग्रह किया।
इसके पश्चात डॉ० सुनीता शाह ने आगरा की सुविख्यात कवयित्री एवं कार्यक्रम की मुख्य अतिथि – डॉ० ज्योत्सना शर्मा का परिचय देते हुए उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। डॉ० ज्योत्सना शर्मा ने कहा हमें बंकिम चन्द्र जी के विचारों और देशप्रेम की भावना को सदैव जीवित रखना होगा और आज के इस कोरोना काल का सामना हमें हौसले और हिम्मत के साथ डटकर करना होगा।

इसके बाद डॉ० मुकुल भूषण सिंह ने हैदराबाद के शिक्षाविद साहित्यधर्मी एवं कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर डॉ० ऋषभदेव शर्मा का सबसे परिचय करवाया। डॉ० ऋषभदेव ने सबको स्पष्ट किया कि बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय जी ने ही सर्वप्रथम देश में स्वाधीनता संग्राम को एक ज्वलंत रूप देते हुए हमारे देश की धरती को भारत माता का रूप दिया था। वन्देमातरम का नारा देकर जन जन में राष्ट्रीय चेतना जगाई थी।

आमंत्रित अतिथियों के वक्तव्यों के पश्चात, बेंगलूरू के सत्यप्रकाश निगम ने हारमोनियम पर ‘निराला’ जी की सुप्रसिद्ध सरस्वती वन्दना का सुमधुर गायन कर, काव्य गोष्ठी का प्रारम्भ किया, जिसमें राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई दिग्गज कलमकारों ने प्रतिभागिता की।
काव्य पाठ का प्रारम्भ करते हुए श्रीमती सुनीता सैनी ने ढोलक की थाप पर स्वागत गीत – ‘भारत की संस्कृति का परचम लहराते हैं’ – प्रस्तुत किया, फिर श्री ईश्वर करुण ने अपनी मधुर आवाज़ में – ‘विश्व की संस्कृति का जो सिरमौर है’ कविता प्रस्तुत कर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम को बांधते हुए डॉ० ऋषभदेव ने बेहद उम्दा दोहे सुनाये जैसे – ‘भूख निगलती प्राण को, सूख रहे कंकाल, विक्रम को ढोने पड़े, ज्यों लाखों बेताल’।
डॉ० ज्योत्सना शर्मा ने अपनी कविता – ‘डोर जब टूटे साँसों की, तिनके का सहारा बहुत होता है’ – से सभी में ऊर्जा भर दी। डॉ० विनोद कुमार मिश्र की ग़ज़ल – ‘अदावत का बढ़ता अन्धेरा मिटाने, चराग़े मोहब्बत जलाकर तो देखो’ ने सबको भाव विभोर कर दिया।
कार्यक्रम की शोभा बढाते हुए प्रमुख रचनाओं में –
कोलकाता के संजय शुक्ला जी की – अगर फलक को जिद है बिजलियाँ गिराने की, डॉ० रंजीत कुमार की – जन जन का सपना साकार हो जाएगा।

मौरीसस की अध्यक्षा सविता तिवारी की – नदी विराट पर्वत विराट, डॉ० शकुन्तला सरूपरिया की – देंगे हम इस मुल्क पर कुर्बानी, डॉ० सुनीता शाह की – वो वसंत की मादकता, जनाब असलम चिश्ती की – चाहा था कभी तुझको, ये बात भुला देना, भोपाल के गीतेश्वर बाबू घायल जी की – तल्ख़ अलफ़ाज़ जब उसकी जबान से निकले, रांची के नेहाल सरायवी की – उनकी उल्फत से कुछ गिला तो नहीं, आलोक चौधरी जी की – एक बार तू वन्दे मातरम् बोल ज़रा, श्रीमती रीमा पांडे की – मैं हूँ तेरी बिटिया बिसारो न माँ, श्रीमती मौसमी प्रसाद की – जब कुछ अनकहे अनछुए एहसास, राजीव नंदन मिश्रा ‘नन्हे’ की – दिव्य अनुपम छटा जहाँ की, डॉ० मुकुल भूषण सिंह की – देश को श्याम आज बांसुरी की चाह नहीं एवं संचालिका डॉ० अर्चना त्रिपाठी की कविता – कहाँ है मेरा वसंत – विशेष रूप से सराही गयी।

साथ ही अन्य गणमान्य साहित्यकारों की रचनाएँ, जैसे – डॉ० सरोज सिंह की – है बहुत हुआ वंदन क्रंदन, डॉ० मधु अगरवाल की – शहीदों के क़दम चूमे, वो राहें भी मुक़द्दस हैं, डॉ० सूर्य बलि प्रसाद की – बंद मुट्ठी से रेत की खिसकन, विकास प्रताप सिंह की – मुझे रचना एक संसार अमर, विजेन्द्र सैनी की – जिसको कभी हमने दूध पिलाया था, श्रीमती ममता सिंह की – एहितियातन बस इतना किया जाए, डॉ० संगीता शर्मा अधिकारी की – जाने कैसी आई ये महामारी है, तथा प्रेम हरि जी की रचना – याद की तेरी गठरी खुली – सबको बहुत भाई।

परिषद् के राष्ट्रीय सलाहकार डॉ० गिरधर राय एवं झारखण्ड ईकाई की अध्यक्षा स्नेहा राय ने भी उपस्थित रहकर सभी प्रतिभागियों का हौसला बढाया।
अंत में कार्यक्रम की सफलता के लिए डॉ० मुकुल भूषण सिंह ने सभी प्रतिभागियों एवं गणमान्य अतिथियों को विशेष रूप से धन्यवाद ज्ञापन करते हुए आशा जताई कि भविष्य में इसी तरह, सामाजिक एवं राष्ट्रीय चेतना पर आधारित और भी साहित्यिक कार्यक्रम किये जायेंगे एवं हिंदी भाषा को जन जन तक पहुंचाने के लिए ठोस कदम उठाये जायेंगे।

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