कोलकाता। भारतीय खाद्य निगम, मंडल कार्यालय, मुर्शिदाबाद द्वारा दिनांक 30.09.2026 को कार्यालय के अधिकारियों एवं कर्मचारियों में राजभाषा हिंदी के प्रति जागरूकता, भाषिक संवेदनशीलता तथा कार्यस्थल पर हिंदी के प्रभावी प्रयोग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से एक दिवसीय हिंदी कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का मुख्य विषय “कार्यालय में भाषिक समरसता और हिंदी की भूमिका” था।
यह कार्यशाला मंडल प्रबंधक सौरभ पोरवाल के कुशल मार्गदर्शन, निर्देश एवं प्रेरणा से आयोजित की गई। उनके नेतृत्व में कार्यालयीन कार्यों में राजभाषा हिंदी के प्रयोग को अधिकाधिक प्रभावी एवं सहज बनाने तथा अधिकारियों एवं कर्मचारियों में भाषिक समरसता की भावना विकसित करने की दिशा में निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।
कार्यशाला में डॉ. बिक्रम कुमार साव, सहायक प्रोफेसर, बैरकपुर राष्ट्रगुरु सुरेंद्रनाथ महाविद्यालय, बैरकपुर, कोलकाता मुख्य अतिथि एवं विषय-विशेषज्ञ के रूप में उपस्थित रहे। डॉ. साव ने अपने संबोधन में कार्यालयीन परिवेश में भाषिक समरसता की आवश्यकता पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डालते हुए हिंदी को केवल संप्रेषण का माध्यम न मानकर कार्यालयीन कार्य-संस्कृति, सहभागिता और प्रशासनिक दक्षता का सशक्त माध्यम बताया।
उन्होंने कहा कि किसी भी बहुभाषी कार्यस्थल की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वहाँ विभिन्न भाषाओं के प्रति सम्मान एवं सह-अस्तित्व की भावना विद्यमान हो। हिंदी का प्रयोग किसी अन्य भाषा के निषेध अथवा प्रतिस्थापन के रूप में नहीं, बल्कि भाषिक समन्वय एवं सहज प्रशासनिक संप्रेषण के माध्यम के रूप में किया जाना चाहिए। उन्होंने कार्यालयीन पत्राचार, टिप्पण-लेखन, प्रतिवेदन, आदेश एवं दैनिक कार्य-व्यवहार में सरल, सुबोध एवं प्रांजल हिंदी के प्रयोग पर विशेष बल दिया।
विषय पर चर्चा के दौरान डॉ. साव ने यह भी रेखांकित किया कि राजभाषा हिंदी के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए केवल नियमों एवं लक्ष्यों की पूर्ति पर्याप्त नहीं है, बल्कि अधिकारियों एवं कर्मचारियों में भाषा के प्रति आत्मीयता, सकारात्मक दृष्टिकोण और व्यवहारगत सहजता विकसित करना भी आवश्यक है। उन्होंने प्रतिभागियों को कार्यालयीन हिंदी को अधिक व्यावहारिक, सरल एवं प्रभावशाली बनाने के लिए विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से मार्गदर्शन प्रदान किया।
अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि भाषा जोड़ने के लिए होती है, तोड़ने के लिए नहीं। आज जब हम कहते हैं कि हिंदी को राष्ट्रीय स्वीकार्यता चाहिए, तो हमें समझना होगा कि स्वीकार्यता माँगने से नहीं, समरसता से मिलती है।
भाषिक समरसता का अर्थ है – सभी भाषाओं का समान सम्मान। हम अक्सर भूल जाते हैं कि हिंदी किसी की प्रतिद्वंद्वी नहीं है। बांग्ला मेरी मातृभाषा है तो हिंदी मेरी संपर्क भाषा है। दोनों में कोई टकराव नहीं है। टकराव तो तब पैदा होता है जब हम क्षेत्रीयता के अंधकार में सोचते हैं कि “मेरी ही भाषा महान है।”
भारतीय खाद्य निगम का उदाहरण लें। हमारा अनाज पंजाब में पैदा होता है, बंगाल उड़ीसा में बँटता है, पर उसका रिकॉर्ड हिंदी में लिखा जाता है। यह थोपना नहीं, यह सुविधा है।
इसलिए यदि हमें हिंदी को सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय बनाना है, तो हमें “हिंदी भी और बांग्ला भी,उड़िया भी और तमिल भी” के भाव से सोचना होगा। समरसता आएगी, तो स्वीकार्यता स्वतः आएगी।
कार्यशाला में उपस्थित अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने विषय में सक्रिय रुचि प्रदर्शित की तथा विभिन्न भाषिक एवं कार्यालयीन संदर्भों से संबंधित प्रश्न एवं जिज्ञासाएँ प्रस्तुत कीं। विषय-विशेषज्ञ द्वारा प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए राजभाषा हिंदी के व्यवहारिक प्रयोग से संबंधित उपयोगी सुझाव दिए गए। इससे कार्यशाला संवादपरक, ज्ञानवर्धक एवं सहभागितापूर्ण रही।
कार्यशाला का संचालन धर्मेंद्र साव द्वारा किया गया। उन्होंने कार्यशाला के उद्देश्य एवं प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए अतिथि वक्ता का परिचय प्रस्तुत किया तथा प्रतिभागियों को विषय से जोड़ते हुए कार्यक्रम को सुव्यवस्थित रूप से संचालित किया। अंत में उन्होंने सभी उपस्थित अधिकारियों एवं कर्मचारियों तथा मुख्य अतिथि के प्रति आभार व्यक्त किया।
समग्र रूप से कार्यशाला ज्ञानवर्धक, विचारोत्तेजक एवं उद्देश्यपरक रही। कार्यशाला के माध्यम से कार्यालय में हिंदी के प्रयोग को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने, भाषिक समरसता को सुदृढ़ करने तथा राजभाषा हिंदी के सहज एवं प्रभावी प्रयोग को प्रोत्साहन देने की दिशा में सार्थक पहल हुई।
यह कार्यशाला कार्यालयीन कार्य-संस्कृति में हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग एवं राजभाषा नीति के प्रभावी अनुपालन की दिशा में एक उपयोगी एवं महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुई।
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