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कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

“राष्ट्रीयता हमारे अंतर्मन की संवेदना का प्रबल अंश है”

कोलकाता न्यूज डेस्क: कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय था – “आधुनिक हिंदी कविता : राष्ट्रीयता के बदलते स्वरूप”

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन, राष्ट्र वंदना और अतिथियों एवं वक्ताओं के स्वागत के साथ हुई। विभाग के अध्यापक डॉ. राम प्रवेश रजक ने संगोष्ठी के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए संचालन का कार्यभार संभाला।

स्वागत वक्तव्य देते हुए विभागाध्यक्षा प्रोफेसर राजश्री शुक्ला ने कार्यक्रम के प्रथम सत्र के अध्यक्ष, सभी वक्ताओं एवं श्रोताओं का स्वागत किया। उन्होंने भारत को विश्व का अनूठा देश कहते हुए कहा कि भारत एक ऐसा देश है जहां राष्ट्र को माता से संबोधित किया जाता है।

मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं में व्यक्त विचारों एवं पंकज उधास के गज़ल के माध्यम से उन्होंने कहा कि – “राष्ट्रीयता हमारे अंतर्मन की संवेदना का बहुत प्रबल अंश है, इसलिए हम इस राष्ट्रीयता की चेतना से अपने आप को समृद्ध करते हैं।”

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प्रथम सत्र के प्रमुख वक्ता एवं उनके विचार

प्रथम सत्र में वक्ता के रूप में उपस्थित डॉ. इतु सिंह ने विषय पर अपने विचार रखा और गंभीरता से राष्ट्रीयता के संदर्भ में identity की विशेषताओं को रेखांकित किया। उन्होंने स्वाधीनता के बाद समकालीन हिंदी कविता में जनतंत्र और राष्ट्रीयता के संदर्भों पर विविध प्रकार के सवाल उठाए। मसलन कोई राष्ट्र जन विरोधी कार्य करता है तो क्या वह राष्ट्र कहलाएगा? या फिर राष्ट्र होने की सही परिभाषा क्या है? आदि।

ऐसे प्रश्नों पर साठोत्तरी रचनाकारों ने अपना हस्तक्षेप किया है। धूमिल, मुक्तिबोध, त्रिलोचन, नागार्जुन, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, भवानी प्रसाद मिश्र, उदय प्रकाश, विनोद कुमार शुक्ला जैसे रचनाकारों ने सत्ता के विरुद्ध कई प्रश्नों के माध्यम से अपनी कविताओं में आवाज बुलंद की है।

इन कवियों के अंदर की जो बेचैनी दिखाई देती है वह उनकी सिर्फ व्यक्तिगत बेचैनी नहीं बल्कि राष्ट्र के जन की बेचैनी ही उनकी कविताओं में मुखरित हुई है।

Emergency के दौर के कवियों ने भी राष्ट्रहित में अपनी रचनाओं को प्रस्तुत किया है। आज भी उन रचनाकारों की चिंताएं और प्रश्न प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा – “अब लड़ने के लिए हमारे सामने अंग्रेज नहीं हैं बल्कि पंक्ति में खड़ा अंतिम आदमी अगर पीड़ित है तो उस पीड़ित के लिए लड़ाई करने की जरूरत है।”

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द्वितीय वक्ता के रूप में डॉ. इंदिरा चक्रवर्ती ने कहा कि – “राष्ट्रवाद वह भावना है जो व्यक्ति को अपने देश, अपनी मातृभूमि सभ्यता, संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से जोड़ती है, जिस भावना के कारण वह अपने देश के प्रति समर्पित रहता है।”

उन्होंने हिंदी साहित्य के आदिकालीन, भक्तिकालीन, रीतिकालीन राष्ट्रीयता के स्वरूप को विवेचित करते हुए आधुनिक हिंदी कविता के राष्ट्रवादी स्वरों से श्रोताओं को अवगत कराया। राष्ट्रवाद समाज के सभी वर्गों की हितों की बात करता है और यह भावना संपूर्ण आधुनिक हिंदी कविता की केंद्र बिंदु है। छायावादी, प्रतिवादी, प्रयोगवादी और समकालीन कवियों की कविताओं का हवाला देते हुए उन्होंने अपने विचारों को स्पष्ट किया।

राष्ट्रवाद में आज लघुमानव और आम आदमी जुड़ा है। रघुवीर सहाय, कुंवर नारायण, मदन कश्यप, अरुण कमल की कविताओं में इसके बृहत्तर स्वरूप को देखा जा सकता है।

राष्ट्रवाद क्षेत्रीयता, धर्मांधता, जातीयता से ऊपर की चीज है। देश में जो विभेदात्मकता आज दिखाई दे रहा है उसका असर आधुनिक हिंदी कविता पर पड़ा है। AI के दौर में राष्ट्रीयता के स्वरूप को भी उन्होंने विश्लेषित किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीयता में सामूहिकता और व्यक्तिकता दोनों समाहित है।

प्रथम सत्र के तृतीय वक्ता डॉ. वेदरमण पांडे ने ‘राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रीयता’ को परिभाषित करते हुए भारतबोध और आर्यावर्त की अवधारणा को श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि – “1947 की स्वाधीनता 1857 की क्रांति की उपलब्धि है।”

रामविलास शर्मा के विचारों, निराला की कविताओं आदि के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रीयता के बदलते स्वरूप को व्याख्यायित किया। उन्होंने कहा कि भारतेंदु, गुप्त, प्रसाद, निराला, पंत से होते हुए स्वाधीनता के बाद के कवि और रचनाकारों की रचनाओं में हम इसके बदलते स्वरूप को देख सकते हैं।

प्रथम सत्र की अध्यक्षता कर रहे आदरणीय आचार्य प्रेमशंकर त्रिपाठी ने भारतीयों के राष्ट्रीयताबोध पर गर्व करते हुए आयोजकों को विषय पर राष्ट्रीय परिचर्चा रखने हेतु साधुवाद दिया और आधुनिककाल के कवियों की कविताओं का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मातृभूमि के प्रति अनुराग के महत्व पर प्रकाश डाला।

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उन्होंने कहा कि – “हमें जातिवाद, भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं से लड़ना है और इससे ऊपर उठकर समाज को अग्रगामी बनाना है। तभी सच्चे अर्थों में हम राष्ट्र की सेवा कर पाएंगे।” भारतीय ज्ञान परंपरा का निर्वाह यह विश्वविद्यालय पीढ़ी-दर-पीढ़ी करती आ रही है, इसके लिए मन उत्साह और आनंद की अनुभूति कर रहा है।

द्वितीय सत्र

भोजनावकाश के बाद द्वितीय सत्र आरंभ हुआ। जिसमें वक्ता स्वरूप राष्ट्रीय होम्योपैथी संस्थान के हिंदी अधिकारी श्री अजयेंद्रनाथ त्रिपाठी ने हिमालय को भारतीय राष्ट्रीयता का प्रहरी बताते हुए और विभिन्न कवियों की कविताओं का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए विद्यार्थियों को राष्ट्रीयता के प्रति हिमालय की तरह दृढ़ और अडिग रहने का सुझाव दिया।

उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य में कवियों की विचारधाराएँ भले ही अलग-अलग रही हों परन्तु राष्ट्रीयता के मामले में सभी एक बिंदु पर खड़े दिखाई देते हैं। जितने कवियों ने राष्ट्रीयता के संदर्भ में कविताएँ लिखी हैं उनमें देशवासियों के अन्दर राष्ट्र के प्रति उर्वर चेतना जागृत करने का भाव है।

आधुनिक काल के विविध काव्य धाराओं की प्रवृत्तियों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए उन्होंने राष्ट्रीयता के स्रोतों को अपने वक्तव्य में शामिल किया और भगवतीचरण वर्मा, नागार्जुन, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ सरीखे महान राष्ट्रवादी साहित्यकारों को याद किया।

द्वितीय वक्ता डॉ. नमिता जायसवाल माखनलाल चतुर्वेदी, रामधारी सिंह दिनकर जैसे रचनाकारों की रचनाओं के आधार पर ‘भारतीयता’ और भारत के विश्व गुरु की अवधारणा को राष्ट्रीयता के संदर्भ में व्याख्यायित किया। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के विभिन्न पड़ावों से गुजरते हुए स्वाधीनता प्राप्ति और उसके बाद के समकालीन समय के विभिन्न संदर्भों को रेखांकित किया। भारतीय राष्ट्रवाद के ऐतिहासिक परिपेक्ष पर भी उन्होंने प्रकाश डाला।

राष्ट्रीयता के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विमर्शमूलक संदर्भों पर भी उन्होंने अपनी चिंताओं को व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि – “आधुनिक हिंदी कविता ने राष्ट्रीयता को निरंतर विविध स्तरों पर परिभाषित किया है। जहां आरंभ में राष्ट्रीय मातृभूमि और स्वाधीनता का प्रतीक बना था वहीं आज वह लोकतंत्र, समानता, अस्मिता और मानवीय अधिकारों से जुड़ा व्यापक विचारधारा है।”

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तृतीय वक्ता डॉ. विजय साव ने भारतीय राष्ट्रीयता के संपूर्ण ऐतिहासिक परिदृश्य को अपने वक्तव्य के माध्यम से प्रस्तुत किया। संस्कृत साहित्य से लेकर मध्यकालीन ऐतिहासिकता और वर्तमान संदर्भ में अपनी बात रखते हुए equality, Liberty, fraternity और democracy की व्याख्या करते हुए राष्ट्रीयता के अखिल भारतीय स्वरूप को सभा में उपस्थित किया।

द्वितीय सत्र की अध्यक्षता

दूसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रोफेसर राजश्री शुक्ला ने अपने विचार श्रोताओं के साथ साझा किया और कहा कि आज की संगोष्ठी में राष्ट्रीयता के संदर्भ में जो भी बातें वक्ताओं द्वारा प्रस्तुत की गईं उससे ‘भारतीय राष्ट्रीयता’ के एक व्यापक फलक से हम परिचित होते हैं। राष्ट्रीयता अपने बदलते स्वरूप और सरोकारों के साथ लगातार हिंदी कविता में अपना स्थान बनाए हुए है।

राष्ट्रीयता के संदर्भ में वक्ताओं ने जिन बिंदुओं को स्पर्श किया निश्चित तौर पर वह विद्यार्थियों और शोधार्थियों के अध्ययन के लिए लाभकारी सिद्ध होगा। राष्ट्रीयता के संदर्भ में अस्मितामूलक विमर्श वर्तमान समय में बहुत ही जरूरी है। वैदिक काल से लेकर वर्तमान समय तक राष्ट्र की परिकल्पना को साहित्य में स्थान मिलता रहा है।

औपनिवेशिक शक्ति से मुक्ति पाने के लिए राष्ट्रीयता के मंत्र का संचार हिंदी कविता ने भारतवासियों के अंदर किया है, जो कवियों के रचनात्मक दायित्वबोध को उजागर करती है। और जिनकी कविताओं को पढ़कर पाठक अपने अंदर राष्ट्र के प्रति दायित्वबोध का संचार करता है।

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य के साथ-साथ उन्होंने परिचर्चा में उपस्थित सभी वक्ताओं, श्रोताओं, पत्रवाचकों, विश्वविद्यालय के विविध विभाग के अध्यापकों एवं कर्मचारियों को धन्यवाद ज्ञापित किया एवं विभाग के विद्यार्थियों के सहयोग की सराहना की। कार्यक्रम में अर्चना सिंह, शुभांगी उपाध्याय, प्रीतम रजक और प्रियंका सिंह ने पत्रवाचन किया।

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