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कैथी लिपि के संवर्धन की जरूरत- सुधीर श्रीवास्तव

सुधीर श्रीवास्तव, गोण्डा, उत्तर प्रदेश । कैथी लिपि, कैथी, कायथी या कायस्थी नाम से जानी जाने वाली मध्यकालीन उत्तर भारत की बेहद सरल, अत्यंत लोकप्रिय एवं द्रुत गति से लिखी जाने वाली ऐतिहासिक लिपि है।
कैथी एक प्रमुख स्वतंत्र लेखन प्रणाली है, जिसका उपयोग संपूर्ण उत्तर भारत में, विशेष तौर पर वर्तमान बिहार और उत्तर प्रदेश में किया जाता था। इस लिपि का उपयोग मॉरिशस, त्रिनिदाद, और उत्तर भारतीय प्रवासी समुदाय के लोगों द्वारा आबाद दुसरे क्षेत्रों में भी किया जाता था। कैथी का उपयोग भोजपुरी, मगही, हिंदी, उर्दू से सम्बंधित कई अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को लिखने के लिए भी किया जाता था।

लिपि — कैथी
अन्य नाम — कायथी, कायस्थी
प्रकार — आबुगिडा
भाषाएँ — अंगिका, अवधी, भोजपुरी, हिन्दुस्तानी, मगही, मैथिली, नागपुरी
काल — पाँचवी से बीसवीं शताब्दी के मध्य तक
पैतृक पद्धतियाँ — ब्राह्मी, गुप्ता, नागरी, कैथी
समकालींन पद्धतियाँ — देवनागरी, नंदनागरी, सिलहटी नागरी एवं गुजराती
लिखने की दिशा — बाएँ से दाएँ, ऊपर से नीचे

कैथी लिपि का महत्व : उत्तर भारतीय समाज में कैथी लिपि के महत्व को इस लिपि में नियोजित गतिविधियों और लिखी और छपी हुई सामग्रियों की वृहत संख्या से मापा जा सकता है। १८५४ में विद्यालयों में देवनागरी के मुकाबले में तीन गुना से भी ज्यादा कैथी लिपि में रचित प्रारंभिक पुस्तकें थीं। नियमित लेखन, साहित्यिक रचना, वाणिज्यिक लेनदेन, पत्राचार और व्यक्तिगत रिकॉर्ड रखने के लिए इस लिपि का उपयोग किया जाता था। प्रशासानिक गतिविधियों के लिए कैथी के उपयोग का प्रमाण सोलहवीं शताब्दी से बीसवीं शताब्दी के पहले दशक तक मिलता है। एक धर्मनिरपेक्ष लिपि होने के बावजूद कैथी का उपयोग साहित्यिक और धार्मिक पांडुलिपियों को लिखने के लिए किया जाता था। इसकी लोकप्रियता की एक बड़ी वजह इसकी सादगी थी।

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जन साधारण में काफी लोकप्रिय होने की वजह से क्रिश्चियन मिशनरीज़ ने अपने साहित्यिक रचनाओं का अनुवाद इसी लिपि से किया। कैथी को सिलेटी नागरी, महाजनी और कई अन्य लिपियों का पूर्वज भी माना जाता है। इसका इस्तेमाल देवनागरी, फ़ारसी और अन्य समकालीन लिपियों के साथ किया जाता था। बिहार में लोक गीत, सूफी गीत और तंत्र-मंत्र की पुस्तकें भी कैथी लिपि में लिखी जा चुकी हैं। कर्ण कायस्थ की पँज्जी व्यवस्था की मूल प्रति भी कैथी लिपि में ही दरभंगा महाराज के संग्रहालय में सुरक्षित है। पटना म्यूजियम में कैथी लिपि की एक स्टोन स्क्रिप्ट भी संरक्षित है।

स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपनी पत्नी को कैथी लिपि में ही चिट्ठियाँ लिखा करते थे। यदि आप भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले स्वर्गीय भिखारी ठाकुर के विषय में जानना चाहते हैं तो आपको कैथी जानने की आवश्यकता होगी। प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी एवं भोजपुरी गीतों पूर्वी धुन के रचयिता महेंद्र मिश्र के विषय में भी कई जानकारियाँ आपको कैथी लिपि में ही मिलेंगीं। चम्पारण आंदोलन के लिए महात्मा गाँधी को बिहार लाने वाले राजकुमार शुक्ल जी की डायरी भी कैथी लिपि में ही मिली है। महान स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय वीर कुंवर सिंह के हस्ताक्षर भी कैथी लिपि में मिले हैं।

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कैथी लिपि के संवर्धन के लिए राष्ट्रीय कायस्थ एकता मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय श्रीवास्तव (गोरखपुर) ने साप्ताहिक प्रशिक्षण सत्र “कैथी लिपि : सीखें और समझें” नाम से आनलाइन माध्यम से शुरू किया है।

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