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हिंदी आलोचना की धाराएं और उनका योगदान पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न, विद्वानों का हुआ सारस्वत सम्मान

उज्जैन। सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला द्वारा पीएम उषा योजना के अंतर्गत एमपी कॉन, भोपाल के सहयोग से छह दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। शनिवार को हिंदी आलोचना की धाराएं और उनका योगदान पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न हुई, जिसके मुख्य अतिथि पूर्व महाप्रबंधक राजभाषा, मुंबई डॉ शशांक दुबे थे। अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ शिव चौरसिया ने की।

सारस्वत अतिथि वरिष्ठ समालोचक प्रो. त्रिभुवननाथ शुक्ल, प्रयागराज, गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय गांधीनगर के पूर्व संकायाध्यक्ष प्रो. आलोक गुप्ता, पद्मश्री डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित, कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा, डॉ. तुलसीदास परोहा, प्रो. जगदीश चंद्र शर्मा आदि ने संगोष्ठी में प्रकाश डाला। इस अवसर पर अतिथियों को अंग वस्त्र, सूत की माला एवं साहित्य भेँट कर उनका सारस्वत सम्मान किया गया।

सारस्वत अतिथि डॉ. आलोक गुप्ता, गांधीनगर ने अपने उद्बोधन में कहा कि आलोचना पद्धतियां काव्य को देखने की हमें महत्वपूर्ण दृष्टि देती हैं। आदर्श आलोचना काव्य का समग्र मूल्यांकन करती है। आलोचक कवि और पाठक के बीच की कड़ी होता है।

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मुख्य अतिथि सिने समीक्षक डॉ. शशांक दुबे ने अपने व्याख्यान में फ़िल्म आलोचना पर बात करते हुए कहा कि सिनेमा की ताकत होती है कि उससे कई लोग प्रेरित हो जाते हैं। वर्तमान में हिंदी सिनेमा की समीक्षा के मानदंडों पर गहन विमर्श की आवश्यकता है। सिनेमा में नाटकीयता होती है। उसकी विषय वस्तु, गीत, प्रस्तुति इत्यादि की सहायता से हम सिनेमा की सम्यक आलोचना कर सकते हैं।

कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि श्रेष्ठ आलोचना भी रचना है, जिसमें आलोचक उपस्थित रहता है। कृति को परखने के लिए कोई एक आलोचना प्रणाली परिपूर्ण नहीं है। आलोचना की विविध धाराएं इस बात का संकेत देती हैं। वर्तमान में आलोचना के लोकतंत्र की आवश्यकता है। आलोचना के क्षेत्र में विविध वाद इसी बात की ओर इशारा करते हैं।

समालोचक डॉ. त्रिभुवननाथ शुक्ल, प्रयागराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि आलोचना का प्रस्थान बिंदु – अपरोक्षानुभूति है। आलोचना में विचारधारा से अधिक महत्वपूर्ण विचार होते हैं। काव्य का अपना धर्म होता है वह अपने प्रतिमान अलग बनाता है।

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पद्मश्री डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित ने काव्यशास्त्रीय आलोचना पर चर्चा करते हुए भारतीय मनीषियों के योगदान को रेखांकित किया। डॉ. शिव चौरसिया ने अपने वक्तव्य में बताया कि अज्ञेय के बिना नई कविता अधूरी है। हमें अगर कुछ नया लिखना हो तो हमें परम्परा को पढ़ना होगा, तभी नई कविता हो सकती है।

डॉ. तुलसीदास परोहा, महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन ने अपने उद्बोधन में संस्कृत काव्यशास्त्र के आलोक में आलोचना पर चर्चा करते हुए कहा कि काव्य किसी प्रयोजन के लिए किया जाता है। कवि की बात सुन कर सहृदय आनंदित होता है अन्य नहीं। हमें प्राचीन शास्त्रों का निरन्तर नए ढंग से अध्ययन करना चाहिए।

तकनीकी सत्र में प्रो. त्रिभुवननाथ शुक्ल, प्रो. आलोक गुप्ता, डॉ. शिव चौरसिया ने व्याख्यान दिए। शोध पत्र वाचन शोधकर्ता पूजा परमार, शिक्षा देवी, डॉ. श्वेता पंड्या, संगीता मिर्धा, पूजा शर्मा और डॉ. नेत्रा रावणकर ने किया।

महिला दिवस के उपलक्ष्य में कार्यक्रम में राजेश सक्सेना, श्यामलाल चौधरी, सीमा पंड्या आदि ने स्त्री केंद्रित कविताएँ प्रस्तुत कीं। मालवी गीतों की प्रस्तुति नारायणी माया बधेका और सुंदरलाल मालवीय ने दी। प्राध्यापक डॉ. प्रतिष्ठा शर्मा एवं संगीता मिर्धा, कन्नौद को शाल एवं साहित्य भेंट कर सम्मानित किया गया।

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कार्यक्रम में प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी, रंगकर्मी सतीश दवे, संतोष सुपेकर आदि सहित अनेक साहित्यकार एवं शोधकर्ता उपस्थित थे। संगोष्ठी में देश के विभिन्न राज्यों के विशेषज्ञ विद्वानों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रतिष्ठा शर्मा और डॉ. नेत्रा रावणकर ने किया। आभार प्रदर्शन पूजा परमार ने किया।

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