समग्रता से जीवनबोध का अनुभव कराती है भारतीय ज्ञान परंपरा – प्रो. दिलीप चारण
पश्चिम के मानवतावाद से आगे हुआ है भारतीय दर्शन एवं ज्ञान परंपरा का विकास – प्रो. शर्मा
डॉ. चिंतामणि राठौर की पुस्तक वैदेही का विमोचन हुआ
उज्जैन। सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन की दर्शनशास्त्र एवं योग अध्ययनशाला में भारतीय ज्ञान परम्परा और दर्शनशास्त्र पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के प्रमुख अतिथि गुजरात यूनिवर्सिटी अहमदाबाद के दर्शन विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. दिलीप चारण थे। अध्यक्षता कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने की।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि डॉ. आभा होलकर इंदौर एवं विभागाध्यक्ष प्रो. सत्येंद्र किशोर मिश्रा ने विचार व्यक्त किए। प्रारम्भ में अतिथियों द्वारा डॉ. चिंतामणि राठौर की पुस्तक वैदेही का विमोचन किया गया। इस अवसर पर डीलिट उपाधि के लिए डॉ. चिंतामणि राठौर द्वारा प्रस्तुत शोधग्रंथ सामाजिक समरसता के नायक श्रीराम की मौखिकी सम्पन्न हुई।

मुख्य अतिथि प्रो. डॉ. दिलीप चारण अहमदाबाद ने भारतीय ज्ञान परंपरा एवं दर्शन के सतत विकास पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि पश्चिम में दिव्य पुरुष की संकल्पना तथा विज्ञान का तार्किकतावाद निहित है। इसीलिए वहाँ मानवीय संबंध, संस्कृति एवं व्यवहार के साथ सौंदर्य सृष्टि और विवेचन क्षमता की कमी है।
वहीं भारतीय ज्ञान परंपरा इन कमियों को दूर करती हुई समग्रता से जीवनबोध का अनुभव कराती है। भारतीय ज्ञान परंपरा एवं दर्शन विचार एवं व्यवहार का संबंध प्रस्तुत करते हैं।
पश्चिम में दर्शन जहां एक प्रोफेशन है जबकि हमारे यहां दार्शनिक चिंतक, साधना पद्धति के मार्गदर्शक तथा समाज सुधारक का कार्य करते हैं। पश्चिम में आत्म साक्षात्कार की केवल दो ही विधियां है पहला साक्षात्कार करके दूसरा देवालय में प्रायश्चित करके।
इस दृष्टि से भारतीय ज्ञान परंपरा में आत्म साक्षात्कार की सौ से अधिक पद्धतियाँ हैं, जो भक्ति, ज्ञान, तंत्र इत्यादि अनेक शाखाओं में विभक्त है। भारतीय ज्ञान परंपरा तर्क एवं श्रद्धा का समन्वय है किंतु इसमें भी श्रद्धा का विशेष महत्व है। दर्शन का आधार मीमांसा पर आधारित है। याज्ञवल्क्य को दुनिया का प्रथम फिलॉसफर हैं।
कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा एवं दर्शन पर महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन में ज्ञान तत्व को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
भारतीय दर्शन एवं ज्ञान परंपरा का विकास पश्चिम के मानवतावाद से आगे हुआ है। दर्शन की पीठिका में लोक, वेद दोनों की अनिवार्य भूमिका है। लोक से ही दर्शन के गूढ़ रहस्यों के समाधान के लिए भारत के ऋषि आगे बढ़े। भारत में दर्शन का संबंध हमारे व्यवहार जगत से है।
भारतीय दर्शन परपंरा बोध और स्वानुभूति से सम्बद्ध है। भारतीय ज्ञान परंपरा एवं दर्शन को समाहित करने वाले दो महत्वपूर्ण ग्रंथ रामायण एवं महाभारत हैं। तुलसी का रामचरितमानस संपूर्ण वेदों, आगमों और दर्शन का सार है।
धर्म, अर्थ काम और मोक्ष के साथ भक्ति का प्रतिबिंबन भारतीय ज्ञान परंपरा में है। जगत कल्याण के साथ पर्यावरण संरक्षण और विश्वबंधुत्व की भावना भारतीय दर्शन के केंद्र में है जिसे विश्व व्यापी बनाने आवश्यकता है।
डॉ. आभा होलकर इंदौर ने भारतीय ज्ञान परंपरा एवं दर्शन के सम्बन्धों को रेखांकित करते हुए कहा कि ज्ञान और दर्शन एक दूसरे के पूरक हैं। दर्शन जहां जीवन का मेरुदंड है वहीं भारतीय दर्शन न केवल सोच अपितु व्यावहारिकता का परिचायक है। भारतीय मनीषियों ने जीवन की परम उपलब्धियां की ओर जाने के संदर्भ में दर्शन का उल्लेख किया है।
भारतीय ज्ञान परंपरा एवं दर्शन को चार कालों में विभक्त किया गया है प्राचीन काल में वैदिक धर्म का उदय होता है। तदुपरांत स्थापित धर्म के विरोध में विभिन्न धर्मों जैसे बौद्ध और जैन धर्म का उदय होता है।
तीसरा काल इस्लाम के उदय के साथ होता है तथा चौथा कल 19वीं शताब्दी के पुनर्जागरण से शुरू होता है। यह बंगाल से आरंभ होकर समकालीन भारतीय दर्शन का मार्गदर्शक बनता है।
समकालीन भारतीय दर्शन के संदर्भ में वैज्ञानिकता का समावेश है जिसमें दयानंद सरस्वती ने अस्पृश्यता निवारण पर जोर दिया। रामकृष्ण परमहंस ने भक्त रूप में अपने दर्शन को प्रस्तुत किया। स्वामी विवेकानंद ने नव्य वेदांत का प्रतिपादन कर अमूर्त दर्शन का वैशिष्ट्य प्रस्तुत किया और दरिद्र भगवान की पूजा तथा कर्मठता का उपदेश दिया।
टैगोर का दर्शन जीवन संगीत से प्रेरित है जिसमें ईश्वर को मानवता का ऋणी बताया गया है अर्थात ईश्वर को ईश्वर मनुष्य ने ही बनाया है। गांधी का दर्शन कर्ममय जीवन के प्रेरित करता है तथा यह संपूर्ण भारतीय दर्शन को जीवंत बना दिया है।
राधा कृष्णन तथा अरविंद के दर्शन ने लोगों में दर्शन तथा ज्ञान को सर्वसुलभ, समाज उपयोगी और व्यावहारिक बनाया है। उन्होंने कहा कि स्त्री को देवी या दुर्गा का रूप देने से काम नहीं चलेगा बल्कि समानता और स्वतंत्रता का अधिकार जरूरी है।
प्रारम्भ में अतिथि स्वागत और विषय प्रवर्तन विभागाध्यक्ष प्रो. एस.के. मिश्रा ने किया। इस अवसर पर प्रो. जगदीश चंद्र शर्मा, डॉ. बिंदु पंवार, रवींद्र राणावत, अंकित राठौर, जर्मनी, नगाड़ा सम्राट नरेंद्र सिंह कुशवाह, महेंद्र शर्मा पुजारी परिवार आदि सहित अनेक शोधार्थी उपस्थित थे।
दर्शन शास्त्र अध्ययनशाला, सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन के सभागार में आयोजित इस संगोष्ठी का संचालन डॉ. आलोक गोयल ने किया। अंत में इस संगोष्ठी का आभार प्रदर्शन डॉ. चिंतामणि राठौर ने किया।
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