कोलकाता। श्री शिक्षायतन कॉलेज एवं अपनी भाषा के संयुक्त तत्वावधान में 19 जुलाई को “राष्ट्रीय शिक्षा नीति : भाषा का सवाल” विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री शिक्षायतन कॉलेज की छात्राएं अन्वेषा और ऋचा ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर की। तत्पश्चात गणमान्य विद्वतजनों ने द्वीप प्रज्जवलन कर उद्घाटन किया।
कार्यक्रम में कॉलेज के सचिव प्रदीप कुमार शर्मा की गरिमामई उपस्थिति रही। कॉलेज की प्राचार्य डॉ. तानिया चक्रवर्ती ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संदर्भ में उच्च शिक्षा के बहुआयामी दृष्टि, स्थानीय ज्ञान एवं सांस्कृतिक जुड़ाव, विविधता एवं समावेशन, अनुसंधान के प्रोत्साहन पर अपनी बात रखी।
बीज वक्तव्य देते हुए प्रो. अरुण होता ने कहा कि भाषाई वैविध्य में सभी अपनी मातृभाषा पर जोर देते हैं। भाषा की अपनी अस्मिता और अपनी सामाजिक बुनावट होती है। भूमंडलीकरण आपकी जड़ को आपसे अलगा देती है। भाषा, महज शब्दों का खेल नहीं होती। भाषा को लेकर आजकल जो भाषा विवाद होता है, वह होता नहीं है, उसे करवाया जाता है।
ठीक उसी प्रकार जैसे प्रेमचंद ने कहा था कि सांप्रदायिकता होती नहीं है करवाई जाती है। NEP में नई की जगह राष्ट्र आया है। राष्ट्र में दूरदर्शिता, सोच, हमारे विचार सब आ जाते हैं। आगे उन्होंने कहा कि शिक्षा को जीविका वैल्यू एडेड से जोड़ना बहुत जरूरी है। साहित्य केवल साहित्यिक नहीं होता हमारी जीवन शैली का परिचायक होता है।
मातृभाषा के माध्यम से ही अच्छी शिक्षा दी जा सकती है क्योंकि वहां सृजनशीलता, मौलिकता और शैक्षिक दक्षता भी होती है। उन्होंने यह भी बताया कि सबसे अमीर देशों में वे देश आते हैं जिन्होंने अपनी मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया एवं सबसे गरीब देशों में वे देश हैं जिन्होंने शिक्षा का माध्यम पराये देश की भाषा को अपनाया। उद्घाटन सत्र का संचालन अल्पना नायक ने किया।
प्रथम सत्र में बतौर वक्ता उपस्थित हुए डॉ. विनय कुमार मिश्र ने त्रिभाषा सूत्र पर हो रहे विवाद की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इसकी शुरुआत आजादी के पहले से ही हो चुकी थी। NEP में विदेशी भाषा के समावेश के दौरान चीनी भाषा का समावेशन न करना उन्होंने शिक्षा नीति की बड़ी कमी बताई।
डॉ. चित्रिता बनर्जी ने अपने वक्तव्य के माध्यम से यह रेखांकित किया कि जिस भाषा में हम सोचते एवं सपने देखते हैं, अगर उसी भाषा में ही हमें शिक्षा ग्रहण करने का मौका मिले तो हम बहुत ही सहजता से ज्ञान विज्ञान के तमाम बिंदुओं को समझ पाएंगे। मातृभाषा को अपनाने के लिए हमें उसके लिए जगह भी बनानी होगी।
अगले वक्ता पटना के अधिवक्ता इंद्रदेव प्रसाद ने कहा कि हिंदी भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की भाषा रही है। अनुच्छेद 350 के तहत हम अपनी किसी भी समस्या के समाधान हेतु हाईकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में याचिका अपनी स्थानीय भाषा में दर्ज करवा सकते हैं। इस सत्र का अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए डॉ. चित्रा माली ने कहा कि हम भाषा के साथ अर्थों का भी निर्माण करते हैं।
भाषा के साथ हमारी प्राकृतिक संरचना का भी निर्माण होता है। उन्होंने हिंदी प्रदेश में ही हिंदी की चिंताजनक स्थिति पर भी सबकी दृष्टि आकर्षित की। भाषा की मानसिक गुलामी को भी चित्रा माली ने रेखांकित करते हुए यह स्पष्ट किया कि कैसे एक वर्ग अपने मन में अंग्रेजी के वर्चस्व को थोपे हुए है और वह दूसरों पर भी इसे थोपना चाहता है। इस सत्र का संचालन डॉ रचना पाण्डेय ने किया।
द्वितीय सत्र में डॉ. अजीत कुमार तिवारी ने अपना वक्तव्य रखते हुए कहा कि जब भी हिंदी का विरोध होता है तो सबसे पहले तमिल झंडा उठाता है। उन्होंने 1968 तथा 2020 की शिक्षा नीति की बुनियादी अंतर को स्पष्ट करते हुए यह बताया कि 1968 की नीति में हिंदी को लागू करने की अनिवार्यता कर दी गई पर 2020 में यह अनिवार्यता नहीं रखी गई।
साथ ही इन्होंने आधारभूत संरचना और संवाद को मजबूत करने पर जोर दिया। दूसरे वक्ता डॉ. कृष्ण कुमार श्रीवास्तव ने यह उम्मीद जताई कि संचार आवागमन के संकट समाप्ति के साथ ही आने वाले समय में भाषाई संकट भी समाप्त होगा।
तत्पश्चात शोध पत्र वाचन किया गया जिसमें डॉ. प्रियंका कुमारी सिंह, डॉ. पूजा मिश्रा, डॉ. श्वेता रस्तोगी, डॉ. शाहीन परवीन, देवोलीना गुहा इत्यादि ने पपत्र वाचन के दौरान नई शिक्षा नीति एवं भाषा से जुड़े प्रश्नों पर अपनी बात रखी।
द्वितीय सत्र की अध्यक्षता कर रहे डॉ. चतुरानन ओझा ने अपने अध्यक्षीय वक्तव में कहा कि नई शिक्षा नीति बगैर विस्तृत संवाद किए ही प्रयोग में लाई गई है। इस नीति के कारण गरीब के बच्चे और भी हाशिए पर चले गए हैं। इस सत्र का संचालन डॉ. विक्रम कुमार साव ने किया। राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सत्य प्रकाश तिवारी ने किया।
इस संगोष्ठी में श्री शिक्षायतन कॉलेज के साथ अन्य महाविद्यालयों व विश्विद्यालयों के प्रोफेसर, शोधार्थी और विद्यार्थी भी उपस्थित हुए थे जिनमें सिंधु मेहता, डॉ. प्रीति सिंघी, डॉ. हिमांशु कुमार, डॉ. विनोद कुमार, डॉ. स्नेहा सिंह, डॉ. अमरदीप साव, ज्योति कुमारी चौधरी, लिली साह, श्वेता शर्मा, डॉ. इबरार खान, रुद्रकांत झा, विशाल कुमार साव, शिवा राव, अरुण कुमार तिवारी इत्यादि उपस्थित थे।
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