नैहाटी। प्रेमचन्द के 147वें जन्मदिवस के उपलक्ष्य पर गरीफा मैत्रेय ग्रंथागार और हिन्दी साहित्य भारती, उत्तर चौबीस परगना इकाई के संयुक्त तत्वावधान में ”प्रेमचंद जयंती-2026″ का आयोजन किया गया। गरीफा मैत्रेय ग्रंथागार, नैहाटी के परिसर में ”सामाजिक समरसता और प्रेमचंद का साहित्य” विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकार, समाजसेवी डॉ. इंदु सिंह ने कीं।
अतिथि स्वरूप नैहाटी शिल्पांचल की सुप्रसिद्ध यात्रा-वृतांत लेखिका माला वर्मा उपस्थित थीं। परिचर्चा सत्र में विषय से संबंधित ऋषि बंकिमचंद्र कॉलेज (सांध्य) के डॉ. जयप्रकाश साव, पी.एन. दास कॉलेज के डॉ. अजय चौधरी एवं शिक्षिका सुमन सोनी ने अपने विचार रखें।
कार्यक्रम का आरंभ दीप प्रज्वलन व प्रेमचंद की छायाचित्र पर पुष्प अर्पित कर किया गया। कार्यक्रम के स्वागत वक्तव्य में हिन्दी साहित्य भारती की केंद्रीय मंत्री व प्रभारी एवं कॉचरापाड़ा कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुनिता मंडल ने उपस्थित सभी का स्वागत करते हुए कहा कि प्रेमचन्द का साहित्य वैश्विक स्तर का साहित्य है उनमें सामाजिक समरसता सहित वैश्विक एकता भी झलकती है।
ग्रंथालय की परंपरा के अंतर्गत विचार प्रस्तुति सत्र का आरंभ शोधार्थी व विद्यार्थियों के विचारों से किया गया। जिसमें कल्याणी विश्वविद्यालय के शोधकर्ता द्वय उपदेश दर्जी एवं सोनी कुमारी साव कॉंचरापाड़ा कॉलेज की स्नेहा साव ने प्रेमचंद पर अपने उद्गार प्रकट किए व प्रपत्र पढ़ा।
डॉ. अजय चौधरी ने प्रेमचंद के नामकरण के प्रकरणों की चर्चा करते हुए उनके जीवन के कई अनछुए पहलुओं की चर्चा की। प्रेमचंद के व्यक्तित्व व रचना प्रक्रिया पर अपनी बात करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का अति साधारण व्यक्तित्व ही उनकी रचना में प्रतिबिंबित होता है।
शिक्षिका सुमन सोनी ने प्रेमचंद के साहित्य को अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने का साहित्य मानते हुए उनके साहित्य की सामाजिक सद्भावना पर प्रकाश डाला।
डॉ. जयप्रकाश साव ने प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘घासवाली’ से अपने व्यक्तव्य का आरंभ करते हुए प्रेमचंद को समाज के सभी वर्गो के सामंजस्य कर्ता के रूप में देखने की बात कही। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य को हमें भाषा, धर्म, जाति, वर्ग आदि सभी दृष्टिकोण से समाज में समरसता लाने की कवायद के रूप में देखना चाहिए।
कार्यक्रम की अतिथि लेखिका माला वर्मा ने प्रेमचंद के आदर्श को जीवन में उतारने की बात कहीं। इस अवसर पर उन्होंने अपनी नवीनतम यात्रा-वृतांत ‘रूस मंगोलिया चीन” अध्यक्ष महोदया को भेंट कीं।
अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. इंदु सिंह ने प्रेमचंद को भक्तिकालीन समन्वयवादी भक्त कवि गोस्वामी तुलसीदास और समाजवादी व क्रांतिकारी कवि कबीर के साहित्यिक समरसता की पीढ़ी की अगली कड़ी मानते हुए कहा कि प्रेमचंद के साहित्य के समस्त पात्र समाज में समरसत्व का आचरण करते दिखाए गये हैं।
उनके द्वारा गढ़े गए पात्रों हामिद, गोपाल, हल्कू की बेटी, दो बैलों की कथा आदि की चर्चा करते हुए कहा कि प्रेमचंद के साहित्य के सभी पात्र समाज की चिंता से ग्रसित पाए जाते हैं। यह चिंता ही समाज को एक करने का सूत्रपात माना जा सकता है। खास करके उनके बालक पात्रों में समाज, परिवार, की चिंता अनिवार्य रूप से झलकता है।
प्रेमचन्द को अपनी अगली युवा पीढ़ी से बहुत आशाएं थीं। वो एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थें जो तुलसी और कबीर सरीखे समाज चिंतकों का स्वप्न था। जिसमें सभी में एकता, सामंजस्य और सद्भावना हो।
उपस्थित विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए अध्यक्षय महोदया ने कहा कि हमें आशा है कि आज की पीढ़ी प्रेमचंद की उस चिंता को अपनी चिंता बनाते हुए हामिद आदि की तरह परिवार और समाज का ख्याल रखेंगे।
कार्यक्रम में डॉ. कार्तिक कुमार साव, डॉ. बिक्रम कुमार साव, सुभाष साव, जोइता दास, सुमित दास, स्नेहा साव, नेहा साव, बिपाशा साव, दीया साव, स्नेहा माला, स्नेहा सिन्हा सहित विविध विद्यालयों और महाविद्यालयों के विद्यार्थी और शोधार्थी उपस्थित रहें। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुनिता मंडल ने दिया एवं कार्यक्रम का सफल संचालन रूद्रकांत ने किया।
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